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बचा रहेगा सब कुछ

यशस्विनी पांडेय

कोई भी रचनाकार प्रेम, समय, समाज और प्रकृति के रूपों को उनकी वास्तविकता व सम्पूर्णता में व्यक्त नहीं कर पाताl तथ्यों, समस्याओं और भावों को उठाते हुए, रचते हुए कुछ न कुछ उससे छूटता चला जाता हैl जितना वो लिख पाता है उसके कई गुना नहीं लिख पाताl आने वाला रचनाकार यदि उस छूटे हुए को उठाता है तो निश्चय ही उस नए के लिए वह समादृत होता हैl यदि इस दृष्टि से राकेश रेणु के काव्य संकलन ‘इसी से बचा जीवन’ के बारे में बात की जाये तो इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो कविता के क्षेत्र में बचा हुआ थाl बचा अभी भी बहुत कुछ है जो इस काव्य संकलन में नहीं है जैसे स्त्री और प्रेम के बारे में लिखते हुए भी ‘पत्नी’ या ‘पुत्री’ के लिए कोई अलग से कविता का ना होना खलता हैl कहीं न कहीं स्त्री के आधुनिक विमर्श की बात न करना भी खलता हैl खैर, किसी भी कवि से पूर्णता की आशा करना तार्किक या उचित नहीं हैl लम्बे समय तक चुपचाप बैठा कवि अचानक से जाग उठता है और कहता है ‘इसी से बचा है जीवन’l कुछ तो बात होगी ही कि अचानक से भावनाओं का सैलाब बह पड़ा और वो कह उठा कि इन्ही भावों से बचा है जीवन, जो इस संकलन में छोटी-छोटी झलकियों में देखे जा सकते हैंl देखते हैं ये छोटी-छोटी झलकियाँ क्या हैं ? कैसी हैं? संग्रह में कुल 74 कविताएँ हैं – आत्म-राग से भरी, रिश्तों की आंच में महकती, आत्म प्रश्नाकुलता व जीवन संघर्ष में विजयी होती कविताएँl

कवि ने अपनी पहली कविता  की शुरुआत ‘स्त्री’ शीर्षक से की है और स्त्री नाम से लगातार छह कविताएँ हैं अलग-अलग रंगों कीl ‘लेडीज फर्स्ट’ की उनकी इस भावना का सम्मान करना चाहिएl कविता की शुरुआत धरती की विशेषताएं बताते हुए नये ढंग के प्रकृतिवादी कवि की तरह हुई हैl जीवन के तत्व अर्थात जिनसे जीवन की निर्मिति होती है – वायु, जल, अग्नि, आकाश, धरती से उन्होंने स्त्री की तुलना की हैl हालाँकि उन्होंने सीधे-सीधे स्पष्ट नही किया है पर स्त्री की तुलना वो पृथ्वी से करते हुए कहते हैं; जैसे पृथ्वी अन्न का एक दाना लेकर पूरा वृक्ष खड़ा कर देती है वैसे ही स्त्री में भी ये सामर्थ्य है की उसे जरा सा प्रेम की धूप, जरा सा सम्मान की नमी, विश्वास की धरती दे दी जाये तो कई गुना लौटाएगीl कविता के अंत में प्रश्नवाचक चिन्ह से लगता है कि कवि अभी भी कन्फ्यूजन में है या फिर स्त्री की विराट सत्ता स्वीकारने में उसे भ्रम और संशय की स्थिति पैदा हो रही हैl

‘स्त्री’ शीर्षक कविताओं को पढ़कर लगता है कि केवल स्त्री पर ही कविताएँ लिख कर वे स्वतंत्र रूप से एक काव्य संग्रह और ला सकते हैं और लाना चाहिएl इससे ये नहीं साबित होता कि बाकि विषयों पर उन्होंने सशक्त कविताएँ नहीं लिखीं पर एक पुरुष द्वारा स्त्री के बारे में समझ कर लिखना उसके दर्द, अपमान, प्रतारणा को महसूस करना निश्चित रूप से अपने आप में एक संवेदी प्रयोग व अभिव्यक्ति हैl दूसरी कविता में जल को प्रेम का अजस्र स्त्रोत बताते हुए वे इंगित करते हैं कि जो भी इनके सम्पर्क में आया है उनको रचा है जल नेl ‘अकास’ ‘बतास’ जैसे देशज शब्दों से कविता में देसीपन की खुशबू की छौंक भी लगती है जो कहीं न कहीं गांव की स्मृतियों को ताज़ा कर देती है। अभी हम इन स्मृतियों से लौट कर आ ही रहे होते हैं उतने में कवि ने इतनी बड़ी बात कह दी – ‘क्या पृथ्वी जल अकास-बतास ने सीखा सिरजना स्त्री से /याकि स्त्री ने सीखा इनसे’l कवि की ये स्थिति पन्त की तरह ही है अलग-अलग समय में वो कभी प्रकृति को सुख और सौन्दर्य के रूप में वरीयता देते हैं तो कभी मनुष्य को पर कवि यहाँ एक ही कविता में भ्रमित स्थिति में है कि प्रकृति के ये तत्व अधिक महत्वपूर्ण हैं या स्त्री?

तीसरी कविता में स्त्री को विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलापों (फूल बीनते हुए, गोबर पाथते हुए, रोटी सेंकते हुए) में लीन बताते हुए अंत में ये कहा गया है कि स्त्रियों ने जो भी किया प्रेम में निमग्न होकर कियाl पृथ्वी पर जो भी प्रेममय है वो स्त्रियों द्वारा रचा गया और उन्ही के कारण प्रेम बचा हैl ये कहते हुए कवि को कोई दुविधा नहीं हैl अगली कविता में स्त्रियों की तुलना चींटियों से करते हुए कवि पुनः स्त्री को प्रेम और रचना, सर्जना का उत्स स्वीकारता हैl इस श्रृंखला की पांचवी कविता अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए हैl इसमें कवि ने स्त्रियों के जीवन के कार्य-कलाप से उनकी वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए उनके जीवन की त्रासदी, विडंबना और खालीपन पर प्रकाश डाला है – ‘व्यंजन की तरह सजाये जाने से पहले / जिसने सजाया खुद को / … साग टूंगते हुए वे बना लेती थीं खुद को झोली /… लेकिन उनका खालीपन सूना कोना-आंतरl’

स्त्री श्रृंखला की अंतिम कविता में कवि स्वयं स्त्री होना चाहता है बावजूद इसके कि उसे पता है स्त्री होने का क्या अर्थ है और कितनी बड़ी कीमत चुकानी होती हैl कवि की इस आकांक्षा में कितना सच है? कितनी पीड़ा? कितनी लाचारी? या संवेदनशील होने का शाब्दिक दावा? ये कवि का ह्रदय ही जानता हैl कविता का ये भाव स्तर उसे स्त्री से भी ऊँचे दर्जे पर पहुंचा देता हैl कवि स्त्री जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रतारणा और अपमान काहलाहल पीना चाहता हैl ‘उनकी सतत मुस्कुराहट / पनीली ऑंखें / कोमल तंतुओं का रचाव / और उत्स समझना चाहता हूँ / मरते हुए जीना / और जीते हुए मरना चाहता हूँ / मै स्त्री होना चाहता हूँ’l

उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने वाले बाज़ार में लालच, छल, आवेग और सनसनी का कारोबार होता हैl वहां विचार, विवेक, चिंतन की जगह नहीं होतीl मनुष्यता को पशुता में बदलने वाले ऐसे बाज़ार और व्यापार सिर्फ ताकतवर लोगों के लिए होते हैं तथा कमज़ोर, गरीब के लिए संकट भरे होते हैंl लोगों के लालच, लिप्सा भोगवाद को तीव्र गति से बढ़ावा देने वाले विश्व बाजार के तीव्र फैलाव से क्षरित हो रही संस्कृति से कवि चिंतित होता हैl ‘टेलीविजन स्क्रीन पर’ शीर्षक कविता कल्पना यथार्थ, फैंटेसी, बिम्ब, प्रतीक, यथार्थ का अद्भुत मेल है जिसमे कवि प्रतीकात्मक रूप से जीवन, परिवार, पूंजीवाद के भयावह सच को बड़े सरल शब्दों में बता कर वैचारिक मंथन की हालत में छोड़ जाता हैl इस कविता का शिल्प भी अपने समकालीनों से जुदा और अधिक इन्द्रिय-चेतस दीखता है, बिम्ब और प्रतीक की एक बानगी देखिये – ‘समुद्र के भीतर अचानक उग आता है एक पार्क / हरी घास और फूलों के साथ’। कविता मौजूदा अपसंस्कृति के विरुद्ध दुःख का आलाप हैl

राकेशरेणु की कविता में मेहनतकश आम आदमी की दुनिया में खलल डालने वाले तानाशाहों, पूंजीपतियों तथा इनके भूमंडलीय छल-छद्मों, षड्यंत्रों की पोलपट्टी खोलते हुए उन्होंने आम आदमी की पक्षधरता में कविता लिखी हैl ऐसे ही भाव को व्यक्त करती कविता ‘दशरथ मांझी’ हैl इस जीवट को लोग कम ही जानते थे मगर बीते सालों में इन पर बायोपिक फिल्म बनने के कारण दशरथ मांझी की कर्मठता आम जन तक पहुंच गयीl कवि की भी संवेदनशील दृष्टि इस कर्मठ एकाग्रचित्त मांझी पर पड़ी – ‘हमारे वक्त में वह नीलकंठ था / बाहें उसकी इस्पात की थीं / और वैसा ही संकल्प’l इस कविता के बहाने कवि का इशारा है कि हर बड़े कार्य के लिए संघर्ष करना ही पड़ता हैl संघर्ष के बाद प्राप्त फल को चखने के लिए प्रतिदान में अपना समय, श्रम, सम्मान सब दांव पर लगाना होता हैl

कवि मानवता की बात करते हैं और कविता को जनविरोधी-व्यवस्था के प्रतिपक्ष में खड़ा करते हैंl उनका संकेत है की सत्ता धर्म की आड़ में मनुष्यता और अपनी जगह से काट देती हैl इस बात को ‘रमजान चचा’ शीर्षक कविता बखूबी बयान करती है।

कवि की कविताओं को पढ़ते हुए एक और बात जो आकृष्ट करती है वह है उनका जीवन के प्रति सर्वाधिक आशावादी नजरियाl एक संघर्षशील कवि की यह खासियत हमेशा बची रहनी चाहिए कि ज़िन्दगी से जूझते हुए ज़िन्दगी के सफ़र को खुद तय करे और अपनी कविताओं के जरिये व्यक्ति और समाज को जीना सिखायेl ‘बचा रहेगा जीवन’ कविता उसी उम्मीद और ऊष्मा की कविता हैl ’बचा रहे अपनापन / बचा रहेगा जीवन / अपनी पूरी गर्माहट के साथ’l

कवि की काव्यधारा और शिल्प विन्यास पर निगाह डालते हुए यह लगता है वे काव्यवस्तु को पूरी सजगता के साथ सहज भाषा में व्यक्त करने की पूरी कोशिश करते हैंl उनका मुक्त छंद पानी की उस अविरल धारा की तरह बहता है जिसे रास्ता नही पता पर उसका बहाव ही उसकी खूबसूरती हैl उसका ये नहीं पता होना ही भाषा की रोचकता को बनाये रखता हैl ‘स्मार्ट’ कविता इसी सहजता और समय के प्रति सजगता को प्रकट करती हैl राकेशरेणु की कविता में लोक चेतना और इतिहास चेतना निरंतर सक्रिय रहती हैl देश-काल का अंकन करते हुए उनकी दृष्टि ग्लोबल और लोकल पर निगाह रखती है तो एक साथ भूत, वर्तमान और भविष्य पर भी त्रिआयामी नज़र डालती हैl ‘उत्तर सत्य’ शीर्षक दो कविताएँ घायल इतिहास का पोस्टमार्टम हैl कवि की राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ मनुष्य की विवश परिस्थितियों से जुड़ जाती हैं और सपाट कथन होने से बच जाती हैंl

घरेलू जीवन में उन्होंने सबसे ज्यादा अहमियत स्त्री को दी हैl काव्य संग्रह में स्त्री को ‘माँ’ के रूप में सर्वोपरि स्थान दिया गया हैl माँ जितनी घर के लिए जरुरी है, उतनी ही समाज के लिए और उतनी ही इस अखिल सृष्टि के लिएl इस संग्रह में माँ के लिए दो कविताएँ हैं एक में माँ के चले जाने के बाद जीवन में पसरे एकाकीपन की बात की गयी है तो दूसरे में माँ के अकेलेपन कीl ये कविताएँ भाव की दृष्टि से उतनी सशक्त नहीं जितनी होनी चाहिएl

राकेशरेणु जीवन-जगत के प्रति गहरे अनुरागी और कवि कर्म के प्रचलित औजारों से परे जाकर सच्चे अर्थों सम्पूर्ण जीवन बोध के कवि हैंl ‘अँधेरा’ शीर्षक की कविताएँ जीवन के प्रति उनके इस अनुराग को अभिव्यक्त करती हैं – ‘जहाँ कंधे पर है दोस्त का हाथ / और आँखों में प्रियतम की ऑंखें / जहाँ विश्वास और प्रेम जीवित है अभी / अँधेरा कैसे व्यापेगा वहां ?’l

रेणु की कविताएँ जीवन के प्रति उनकी दृष्टि और उत्कट आवेश के प्रस्थान-बिंदु से चलकर आज के इस अँधेरे समय में रौशनी बांटती हैंl ‘सपने में’ कविता के माध्यम से अपने रामराज्य की कल्पनाओं के बारे में बताते हैंl ‘पिता के लिए’ कविता एक पुत्र के रूप में पिता की स्मृति को इस तरह अनुभूत करना विह्वल करता हैl हिंदी साहित्य में पिता पर बहुत कम कविताएँ लिखी गयी हैंl यदि लिखी भी गयी हैं तो वे अनुभूति के स्तर पर पिता के व्यक्तित्व से घना रिश्ता नहीं बना पातींl मगर कवि ने पिता-पुत्र संबंधों में निहित अतीत और वर्तमान एक साथ साकार हो उठता है जब कवि कहता है ‘मरने बुझने नहीं दूंगा उसे / मेरे साथ-साथ जियेगा वहl

कवि का ह्रदय उदार है और करुणा से आर्द्र उसकी चेतना मानवता पर जुल्म ढाती ताकतों के प्रति क्षुब्ध हैl हर तरफ चीखों-चीत्कारों के बीच कवि का आर्तमन डूबता है और आँखों में दुनिया के सताए लोग और जगहें खिंच आते हैंl कवि अपनी आँखों के माध्यम से कविता का भाव-विस्तार कर दुनियाभर में फैली यातना के दृश्यों को खोलती हुई कविता है ‘अँधेरे समय की कविता’l

राकेशरेणु जितनी शिद्दत से अंतरराष्ट्रीय जगत से जुड़ते हैं उतने ही गहरे वे स्थानीय पुर-प्रान्तों-जगहों से भी जुड़े हैंl इसके साथ ही उन्हें उन लोगों की भी चिंता है जो आज भी उपेक्षित हैं, सताये जा रहे हैं और जिन्हें तिनके का भी सहारा नहींl उन्होंने सिर्फ स्थानीयता और सार्वदेशीयता के भूगोल को रचने की कोशिश भर नहीं की है बल्कि मानवीय जीवन की विषमता के रूपों को राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर समझने की कोशिश की हैl कविता के धरातल पर जीवन यथार्थ से जूझते हुए वे बहुत बार आक्रामक भी होते हैंl वैसे आक्रामक होना उनका कवि स्वभाव नही पर व्यंग्य और चोट की अपनी काव्य-युक्ति के साथ जब भी वे किसी विषय को उठाते हैं तो आक्रामकता सहज ही उनकी कविता में आ जाती है जो एक हद तक जरुरी भी हैl ‘विध्वंस’ कविता उनके व्यंग्य प्रतीक बिम्ब का अच्छा कॉम्बिनेशन हैl

ऐसे समय में जब प्रेम करना कठिन है और प्रेम की इंटेंसिटी से भरी कविताएँ लिखना और कठिन, कवि की कविताएँ मानवीयता और प्रेम की तलाश करती हैं और प्रेम को सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताती हैं – ‘कुछ भी इतना महत्वपूर्ण नही, जितनी प्रतीक्षा / प्रियतम के संवाद की संस्पर्श की, मुस्कान की प्रतीक्षा’l ऐसा लगता है कवि की रगों में प्रेम रक्त की तरह प्रवाहित होता है और यह कवि प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए कभी-कभी शब्दों की मितव्ययिता से काम चला लेता है, पर एक-एक शब्द सैकड़ों भावबोध छुपाये हुए – ‘प्रेम में संभव सब कुछ / प्रेम में संभव, असम्भव’l

प्रेम में वो अड़ियल बैल की तरह प्रेयसी से चिपक जाना चाहते हैं ये जानते हुए भी की प्रेयसी को उनका इस तरह चिपके रहना पसंद नहींl इस ज़िद-मिजाजी के साथ उन्हें ये भी एहसास है कि प्रेम ही वह एहसास है जो अपने अन्तर सहित हमें बदल डालता हैl जाहिर है उनका ये अड़ियलपना भी बदल जायेगा, ‘अहं’ का भाव ‘हम’ में बदल जायेगाl उन्होंने प्रेम की गहन स्थितियों को अंकित कर उसकी व्याप्ति को जीवन के सुखद क्षणों में देखा है और महसूस किया है कि उसकी अनुभूति जीवन को नया अर्थ देते हुए एक बड़े परिवर्तन को संभव कर डालती है – ‘तुम्हारे चेहरे में / किस अथाह प्रेम में उसने / रची मनुष्यता / संस्कृति पृथ्वी कीl ‘तुम्हे प्यार करता हूँ’ कविता में प्रेम की विराट परिकल्पना है और उसे प्रकृति के आलंबन में विन्यस्त करने की कुशलता; इसलिए प्रेम कविताओं का यह संसार सर्वथा नए आस्वाद में ढल गया हैl ये छोटी-छोटी प्रेम कविताएँ बार-बार पढ़ी जा सकती हैं और प्रेम के एहसास में डूबा भी जा सकता हैl यहाँ स्त्री एक देह मात्र नहीं है। है तो वह प्रेम की अनुपम छवि, जो कवि की अनुभूति में बसी है और जो समूची प्रकृति में विद्यमान हैl

स्त्री की अस्मिता उनके लिए सर्वोपरि है स्त्री के बारे मे कवि का नजरिया मैत्री का हैl स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के बीच मैत्री ही वह तत्व है जो दोनों को घर व समाज में बराबरी का दर्जा देता हैl बराबरी के इस दर्जे को हासिल करने में कवि की कविताएँ संघर्ष करती दिखाई देती हैं – ‘मेरी हर दौड़ में शामिल हो तुम / तुम्हारे साथ होऊंगा मै भी सदा सर्वदा / तुम्हारी प्रतिछाया साl रूपकों के माध्यम से कवि कविता में प्रेम को वृहद्तर परिप्रेक्ष्य देते हुए उसे नए ढंग से आंकते हैं। बिम्बों के रचाव से लेकर प्रेमानुभूति की अभिव्यक्ति कवि की निजी रचनात्मकता हैl

ऐसी सघन ऐन्द्रियता से सम्पन्न प्रेम कविताओं की पूंजी हिंदी में, खासकर आधुनिक हिंदी कविता में कम हैl विकलता और अधीरता से परे प्रेम को एक परम मानवीय भाव के रूप में, प्रकृति और जीवन के सातत्य में देखते कवि की प्रेम कवितायों का कोई टाइप नहीl

राकेशरेणु की कविताएँ उनकी जीवन-पद्धति की प्रतिलिपियाँ हैंl अनचीन्हे भूगोल, नई-नई धरती के हिस्से, गांव, कस्बे और आदिवासी, अंचल के लोग, नेता, मिथक पात्र, स्त्री, किसान, मजदूर उनकी कविता के नागरिक हैंl उनकी कविताएं विविधता से भरी हैं, वे सजीव जिंदगी को और सजीव कर रही हैंl वे उन कवियों में शामिल हैं जो बिना किसी शोर के अपने कवि-कर्म में चुपचाप संलग्न हैं पर उनकी कविता चुपचाप नहीं हैं। वे प्रेम, सामाजिक जीवन, पारिवारिक जीवन में गहरे जांच पड़ताल करती हैंl एक गंभीर संभावनाशील कवि की पहचान होती है कि उसकी कविता का रेंज कितना व्यापक है और उसकी जीवन-जड़ें कितनी गहरी हैंl ये कविताएँ काव्यानुभूति के स्तर पर ज़िन्दगी समाज और राजनीति के अंतर्द्वंदों और सामाजिक विषमताओं की पीड़ा से गहरे स्तर पर तादातम्य स्थापित करती हैंl

आज के समय के साथ चलने, मानवीय मूल्यों को बचाए रखने, धरती को हरा भरा रखने, बच्चों के चेहरों पर मुस्कान देखने, स्वयं और आने वाली पीढ़ी पर भरोसा रखने वाले आत्मीय और प्रेरक कवि राकेशरेणु की रचनात्मकता और सक्रियता की जरुरत है, साहित्य को व समाज कोl

समीक्षित कृति – इसी से बचा जीवन

कवि – राकेशरेणु

प्रथम संस्करण – 2019

पृष्ठ संख्या – 128

मूल्य – 200 रुपये

प्रकाशक – लोकमित्र,

1/6588, पूर्वी रोहतास नगर

शाहदरा, दिल्ली-32

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