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बचा रहेगा – सिर्फ एक अहसास!

आज की हवा में एक खुशबू मिली हुई थी। रात की बारिश ने जैसे इस महानगर के सारे प्रदूषण को मिटा दिया था और एक सोंधी-सोंधी खुशबू हवा में बिखर गई थी। हवाओं में भीतर तक घुला हुआ जहरीला धुंआ जैसे तेज बारिश की बूंदों में सिमटकर धरती के रोम छिद्रों में समाकर एक अनन्त यात्रा के लिए प्रस्थान कर चुका था। पिछले हफ्ते ही तेजस ने माली से दो फूलों के गमले लिए थे। उनकी खुशबू को उस दिन नलिनी ने फूलों के पास जाकर सूंघा था। हल्की मद्धिम-सी खुशबू थी। लेकिन आज वह उन फूलों की खुशबु अपने कमरे में बैठी-बैठी भी महसूस कर सकती है। इस बारिश ने कितना बदल दिया है सब कुछ। पिछले हफ्ते ही टी.वी. पर यह सर्वेक्षण था कि यह शहर सबसे प्रदूषित शहर बन चुका है। कुछ कुलबुलाया था उसके भीतर- यह समाचार सुनकर। यह शहर, यह शहर क्या अब रहने लायक नहीं? कब यह एक गैस चैम्बर में तब्दील हो गया? पता ही नहीं चला। उसके सपनों का शहर। उसका ही क्यों? सबके सपनों का शहर – दिल्ली………………. पर आज की सुबह कितनी खुशगवार है। रात की बारिश सब कुछ बहा ले गई। उसने इस खुशबू को जी भरकर अपने भीतर भर लेना चाहा समेट लेना चाहा उसे अपने भीतर। ये भीगी-भीगी, मिट्टी की सोंधी गंध से सराबोर सुबह जल्द ही समय के आगोश में सरक जाएगी और तीखी चिलचिलाती दोपहरी में बदल जाएगी। फिर उमस, पसीना………। उफ्फ छोड़ो दोपहर की, अभी तो इस सुबह को भरपूर जी लिया जाए। नलिनी ने दोपहर की चिपचिपाती गर्मी की सोच को झट से हटाकर इस खूबसूरत सुबह पर ध्यान लगाने की सोची और वह बालकनी में जाकर खड़ी हो गई।

तेजस नाश्ता करके ऑफिस जा चुके थे। माया भी घर के सारे काम निपटाकर जा चुकी थी। उसे भी तो निकलना है अपनी नौकरी पर। इस सुबह का क्या है – फिर आ जाएगी। पर पता नहीं अब कब आएगी? हमेशा जिम्मेदारियां इस मौसम पर हावी ही तो रहती हैं और इस खूबसूरत मौसम में रमे इस मन को मार कर निकल जाना पड़ता है- अपनी रोजी-रोटी कमाने। ये मन और इस मन की खुशफहमियां ज्यादा देर तक नहीं चल सकतीं। काम के बोझ तले दब जाने दो इस मौसम की रूमानियत को। ये शहर और इस शहर की भागदौड़…………….मौसम का लुत्फ भी नहीं लेने देते। चलो भई अपनी नौकरी पर………। एक छोटी-सी नौकरी अपनी भी है- नलिनी के हांठ अपने आप ही बोल पड़े।

घर का ताला लगा फ्लैट से नीचे उतरी तो रिक्शे वाला घंटी बजाता हुआ बोला – ध्यान से चढ़िए मैडम जी, आज। रात बरसा था, फिसलन है अभी भी। कहीं-कहीं तो पानी भी है अभी तक। बचता बचाता आया हूँ आज, पर देखना दिन तक सारा पानी सूख जाएगा। नलिनी रिक्शे वाले की बात काटते हुए बोली – ठीक है, ठीक है जरा जल्दी चलो। कहीं देर न हो जाए आज इस मौसम के चलते। मौसम ऐसा है कि घर से निकलने का मन ही नहीं किया। छुट्टी लेने की सोच रही थी पर क्या करूं बच्चों के पेपर होने वाले है अगले महीने से। सो चली आई – नलिनी ने रिक्शे पर बैठते हुए कहा।

मैडम जी ये नौकरी है ही ऐसी चीज। सर्दी, गर्मी, बरसात सब में टाइम से पहुंचो। हुकुम बजाओ। हमको देखों हम भी तो आए हैं टाइम से, अपनी नौकरी करने। हम भी मौसम देखते तो पड़े रहते अपनी खटिया पर, पर नौकरी है – रिक्शेवाला दार्शनिक अंदाज में बोला साथ ही उसने पीछे मुड़कर नलिनी के चेहरे के भाव भी पढ़ लेने चाहे पर असफल रहा।

नलिनी को आदत है रिक्शेवाले की बातें सुनने की। रोज ही कोई न कोई बात छेड़ देता है उसमें अपने बुजुर्गों के अनुभव के साथ-साथ वह अपना अनुभव भी जोड़ देता है और इस तरह नलिनी को समझाता है जैसे वह उसका टीचर हो। नलिनी सोचती टीचर तो वह है – स्कूल में। उम्र में उससे छोटा है पर बातें बड़ी-बडी़ करता  है। पढ़ा-लिखा है। बंगाल के किसी स्कूल से बारहवीं पास है पर दिल्ली में पिछले आठ साल से रिक्शा चला रहा है। दिल्ली में उसने पिछले आठ सालों में पैसा कम और अनुभव ज्यादा कमाया है। अपने अनुभवों की पोटली मे से ही रोज कोई न कोई बात नलिनी के सामने निकाल कर रख देता है। वह पिछले छह महीनों से उसके रिक्शे पर ही स्कूल जाती है। समय पर आ जाता है उसे लेने और स्कूल खत्म होने पर हमेशा उसका इंतजार करता हुआ मिलता है।

स्कूल पर रात की बरसात का कोई असर नहीं था। रोज की तरह ग्राउंड से बच्चों का शोर आ रहा था। असेम्बली के बाद सारे क्लासरूम फुल थे। नलिनी को याद आया कैसे उसके बचपन में छोटी- छोटी बात पर स्कूल से उसकी छुट्टी हो जाया करती थी। घर में बुआ या मौसी आती तो उसकी स्कूल की छुट्टी, पड़ोस में कोई शादी या समारोह होता जो उसकी छुट्टी और रात को बारिश हो जाए तो पक्का स्कूल से छुट्टी और वो सारा दिन अपनी सहेलियों के साथ बारिश के जमा हुए पानी पर कागज की नाव बनाकर चलाती। हाँ उसकी नाव कभी आगे नहीं जा पाती थी। रूपा की नाव सबसे आगे रहती। वह इस बात पर कभी-कभी रूपा से दिन भर नाराज भी रहती। अगली बारिश में उसकी नाव रूपा से आगे रहेगी वह उस दिन कसम खाती। उफ्फ वह भी कहां पहुंच जाती है। उन दिनों मौसम हमारी दिनचर्या तय करते थे पर यहां कुछ नहीं बदलता। सारे काम चलते रहते हैं साथ-साथ मौसम भी बदलते रहते हैं। बच्चे सुबह स्कूलों में और उनके माँ-बाप अपने-अपने ऑफिसां में तैनात मिलते हैं। शहरों में छुट्टी के बहाने बहुत कम मिलते हैं। जो माएं वर्किंग नहीं हैं वे भी बच्चों का घर पर रहना पसंद नहीं करती चाहे कारण गंभीर ही क्यों न हो। रात को चाहे दो बजे पूरा परिवार पार्टी से आया हो पर सुबह माएं बच्चों को तैयार कर स्कूल ठेल ही देती हैं। हद तो यहां तक हो जाती है जब मांए तपते बुखार में भी बुखार के सिरप पिलाकर अपने बच्चों को स्कूल भेज देती हैं। नलिनी को अपने विद्यार्थी अमन की याद आ गई जो पिछले साल उसकी क्लास में था उस दिन वह भी तो तपते बुखार में स्कूल आया था वह तो उसे तब पता चला जब कॉपी देते समय उसकी उंगलियां उसके हाथ से टकराईं तो उसे गर्मी का भभका सा लगा था। अमन के बताने पर उसकी माँ पर उसे बहुत गुस्सा आया था। पी.टी.एम. में जब उसकी माँ उससे मिली तो वह अपने गुस्से को काबू नहीं रख पाई थी। अमन की माँ झिझकते हुए बोलीं थीं -‘‘मैम अमन की ही जिद थी उस दिन बुखार में स्कूल आने की। उसे 100 परसेंट अटैन्डेन्स अवार्ड चाहिए न इस बार’’। जवाब सुनकर नलिनी का माथा ठनका था। लगभग चीखते हुए वह बोल उठी थी -‘‘ आप तो माँ हैं न उसकी? आपने क्यूं आने दिया उसे इस हालत में? आप अमन को समझा सकती थीं।’’ अमन की माँ इस बात पर चुप लगा गई थीं। नलिनी इस चुप्पी में कभी अमन और कभी अमन की माँ के जवाब ढूंढती रह गई थी।

स्कूल खत्म होने के बाद सचमुच उमस बहुत बढ़ चली थी। कमाल है रात भर बारिश होती रही फिर भी गर्मी पर कोई काबू नहीं। कितना ताप है इस शहर के भीतर! ये तपन मौसम की है या लोगों की आहें ही तपन बनकर छा जातीं हैं। महत्वाकांक्षा के पीछे भागते लोगों की उसांसें, दुख, ग्लानि, शोक, लोभ, ईर्ष्या, नीचता, असफलता, छल, क्रोध न जाने कितने-कितने भाव मिले जुले होते हैं इस शहर की हवा में। उसके मन के भाव भी शायद इन भावों में कहीं न कहीं बिखरे होंगें। ठीक ही कहा जाता है कि जैसा आपके मन के भीतर है वैसा ही बाहर भी तो होता है। भीतर का संघर्ष ही जैसे आस पास साकार हो उठता है और भीतर की शांति जैसे बाहर पसरी हुई मिलती है। आज से पंद्रह साल पहले जब वह इस शहर में पढ़ने के लिए आई थी तो लगता था जैसे ये शहर भी उसके साथ संघर्ष कर रहा है। बाहर के हर अणु-परमाणु में उसे अपना ही संघर्ष दिखाई देता था। उसका ये संघर्ष पहले पहल तो दिल्ली विश्वविदयालय की इमारत से शुरू होकर पटेल चैस्ट की कम्पोजिंग की दुकानों तक ही सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे इस संघर्ष का दायरा बढ़ता गया यह फैलता चला गया और इसके साथ ही फैलता चला गया उसकी जिंदगी में आने और जाने वालों का सिलसिला, कभी सहपाठियों  के रूप में और कभी दोस्तों के रूप में। हर आने वाला ढेरों कसमों की सौगातें लेकर आता और जाने वाला जिंदगी का एक नया पाठ पढ़ाकर जाता। ऐसे कितने ही पाठ उसे इस शहर ने सिखाएं हैं, ऐसे ही पाठ पढ़कर तो मजबूत हुई है वह। खड़ी है दम साधे अपने संसार को अपने कंधों पर उठाए, जहाँ आज वह तेजस के साथ अपनी गृहस्थी की गाड़ी पर सूकून से सवार है।

‘‘आज बालकनी में ही खड़ी रहोगी क्या? रात की बारिश कब की भाप बनकर उड़ गई और एक तुम हो कि उसे अब तक पकड़ कर बैठी हो।’’- तेजस ने आते ही एक प्यार की झिड़की दी थी।

‘‘बारिश को कौन पकड़ कर रख सका है आज तक भला। बस इसके जाने के बाद भी इसे बहुत देर तक महसूस तो किया ही जा सकता है न?- नलिनी ने ऐसे जवाब दिया जैसे किसी की चोरी पकड़े जाने पर वह जवाब देता है।

माया चाय रखकर किचन में वापिस जा चुकी थी, वह रात के खाने की तैयारियों में व्यस्त थी। दोनों पति-पत्नी की बातों में उसका मन कभी भी नहीं रमा था। उन की बातों में उसे वह मसाला नहीं मिलता था जो वह बाकी घरों में काम करते हुए पा जाती थी। मसाला मतलब- नोक-झोंक। यहां न नोक थी और न ही झांक। था तो बस एक गंभीर वैचारिक वार्तालाप, नलिनी के भावुकता से भरे लंबे-लंबे वाक्य और तेजस के व्यवहारिक पर प्रेम से भरे जवाब। माया के लिए यह पति-पत्नी का जोड़ा बहुत अजीब था। न बहस न तकरार। शायद ज्यादा पढ़े-लिखे लोग ऐसे ही अजीब होते हैं। भला ऐसे भी कोई पति-पत्नी होते हैं जो आपस में तकरार न करें। इसलिए वह उस घर के माहौल में वैसे ही स्वभाव से काम करती और कभी अपनी तरफ से कोई बात नहीं करती थी बस आकर मशीन की तरह काम निपटा कर वापिस चली जाती थी। बाकी घरों की कहानियां उसे ज्यादा लुभाती थीं।

परीक्षा के दौरान नलिनी के पास समय ही समय होता है। हाँ उसके पास उन दिनों काफी समय होता है जहाँ बाकी शिक्षक परीक्षाओं के दौरान अतिरिक्त जिम्मेदारी यानि निरीक्षक की भूमिका में भी होते हैं वहीं इस दौरान नलिनी अपने सारे छूटे हुए कामों को करती है, अपने संगीत के शौक को वह इस दौरान जी भर कर पूरा करती है, सारे नाते-रिश्तेदार उसे इस दौरान ही याद आते हैं। वह अलग बात है कि इस दौरान सभी के बच्चे परीक्षाओं में व्यस्त होते हैं और वे नहीं चाहते कि कोई बच्चों की परीक्षा के दौरान उनके घर आए न ही वे किसी के घर जाते हैं। ऐसे में नलिनी के पास समय ही समय होता है। उसकी आँखों में उसका बचपन और जवानी दोनों तिरने लगते हैं। उसकी आँखों ने उन पलों को कभी देखा नहीं था पर भीतर तक महसूस किया था। बिना देखे ही अपने ताऊ जी और ताई जी के चेहरे के भावों  को वह पढ़ पाती थी जिनमे लिखा था कि कितनी दीन-हीन है वह उनके लिए। ‘लड़की सुंदर है तो क्या हुआ, है तो अंधी न।’’ कितनी ही बार ये बात उसने अपनी ताई के मुंह से सुनी थी वह भी तब जब उसकी माँ आस-पास न होती और माँ सामने होती तो सारे लाड़-प्यार की हकदार अकेली वही होती।  पिता बहुत कम घर पर रहते थे अक्सर फौज की नौकरी के चलते बाहर ही रहते थे लेकिन जब आते थे तो उनके लिए वह उनकी सबसे सुंदर बेटी ही होती। ताई जी की तरह वह दूसरा वाक्य उसमें नहीं जोड़ते थे। अपनी बंद आँखों से उसने जितना भी इस दुनिया और इस दुनिया वालों को महसूस किया था उनमें वह सिर्फ अपनी माँ को ही देखना चाहती थी। उसकी माँ कैसी दिखती है? उसने अपनी बड़ी बहन, ताऊ जी की बेटी से पूछा था। वह यह कहकर भाग गई थी – ‘बहुत सुंदर-फिल्मी हीरोइन जैसी’। हीरोइन, उसने तो हीरोइन भी नहीं देखी। फिर कैसे पता लगाए कि कैसी दिखती है उसकी माँ? वह कई बार माँ के चेहरे पर अपनी छोटी-छोटी उंगलियां फिराती-बाल, माथा, आँखें, नाक, होंठ, ठोड़ी, सब कुछ उसके जैसे ही तो हैं। वह छूकर अपनी माँ की सुंदरता को नापना चाहती पर हर बार असफल रहती। जब तक छोटी थी तब तक भगवान से यही प्रार्थना करती कि बस माँ का चेहरा दिखा दे बाकी कुछ नहीं देखना। फिर धीरे-धीरे उसे यह बात समझ आ गई कि वह कभी अपनी माँ का चेहरा नहीं देख सकती चाहे भगवान के सामने कितना ही गिड़गिड़ा ले।

आज तेजस के कुलीग के घर में उसके नए घर लेने की पार्टी है। सभी महिलाओं से घिरी नलिनी सबके लिए एक साथ ही विशेष जिज्ञासा का केंद्र होती है। दोनों अगर साथ होते हैं तो सबकी नजरें नलिनी से हटकर जल्दी ही तेजस पर अटक जाती हैं। प्रशंसा मिश्रित भाव लिए सभी तेजस की सराहना करते हैं और नलिनी महसूस करती है उनकी बातों में अपने लिए एक दया…………….. ऐसी दया नलिनी ने अपने लिए कभी नहीं चाही। तेजस से शादी को लेकर भी उसने अपने निणर्य में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई थी। उसने पूरा मौका दिया था तेजस को बार बार सोचने का। पूरा जीवन एक नेत्रहीन के साथ …………कहीं उसके जीवन को अभिशाप तो नहीं बनाने जा रहीं है वह? पर तेजस अपने प्रेम पर दृढ़ था। अपने परिवार और रिश्तेदारों की बात को दरकिनार कर उसने नलिनी का हाथ थामा था। पर ऐसे मौकों पर लगता कि उसने तेजस के साथ कहीं ज्यादती तो नहीं की। अपने जैसी ही किसी संगिनी के साथ ही वह अपने जीवन की शुरूआत कर सकता था।

सारी महिलाएं खाने पर जाने की तैयारी कर रही थीं। नलिनी भी उठने को हुई तो तेजस झट से उपस्थित हो गया- ‘चलो नलिनी खाना खा लेते हैं।’

हर बार ऐसी स्थिति आने पर नलिनी मुस्कराकर एक ही जवाब देती है –तुम अपने दोस्तों के साथ रहो तेजस मैं खा लूंगीं’। पर नलिनी को भी पता है और तेजस को भी कि वह उसके बिना किसी भी नई जगह पर कम्फर्टेबल नहीं हो पाती है। इन दस सालों में कितनी आदत हो गई है उसे तेजस की। तेजस के उसके जीवन में आने से पहले वह एक मजबूत दीवार की तरह थी और तेजस के आने के बाद वह एक गीली मिट्टी की तरह अपने वजूद को समझने लगी है जो तेजस के साथ लगी हुई है और तेजस है कि उसके वजूद को अपने से चिपकाए एक मुस्कुराहट के साथ जीवन पथ पर अग्रसर है। कहीं तेजस उसे इस तरह अपने वजूद से चिपकाए थक तो नहीं जाएगा न। सोचकर ही नलिनी एक आह भरती पर उसकी आह उस समय कहीं खो जाती जब तेजस उसे बांहों में भरकर अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बताता।

आज की सुबह रोज की तरह ही थी, उमस से भरी हुई। पानी बरसे कई दिन गुजर चुके थे। नलिनी बालकनी में खड़ी अपनी हथेलियां को फैलाकर महसूस करना चाहती है उन बूंदों को जिन्हें आज बरसना ही नहीं था। उन बूंदों का अहसास आज भी अपनी हथेलियों पर वह महसूस करती है पर महसूस करना और वास्तव में होना कितना फर्क है इन दोनों में। सिर्फ महसूस होने से ही वास्तविकताएं नहीं बनती उन्हें तो एक ठोस आधार की दरकार होती है। तेजस अपने ऑफिस के लिए निकल चुका है और माया अभी किचन में काम निपटा ही रही है, नलिनी को भी निकलना है अपने स्कूल के लिए। एक नौकरी ही तो है जो उसे चलाए रखती है। रिक्शे वाला भी आधे घंटे में उसको लेने पंहुच ही जाएगा, अपनी नौकरी करते हुए। सब अपनी नौकरी ही तो कर रहे हैं। नलिनी घर का ताला लगा नीचे पहुंची तो रिक्शेवाला घंटी बजाता हुआ सामने आ खड़ा हुआ। ‘‘मैडमजी आराम से चढ़िए। आज बरसा नहीं है तो क्या हुआ सावधानी तो रखनी ही पड़ती है न। सावधानी न रखें तो कोई भी काम खराब हो सकता है न मैडमजी। काम चाहे छोटा हो या बड़ा, सावधानी मांगता है। अब मैं ही ध्यान न रखूं और जल्दबाजी में चला आऊं और कहीं टक्कर हो जाए तो आप की तो उस दिन की छुट्टी ही हो जाएगी न मैडम जी……………’’ रिक्शे वाला बोलता जा रहा था और नलिनी मुस्कुराती हुई एक चुप्पी लगा उसकी बात को सुन रही थी।

1 Comment

  1. डा.सारिका कालरा जी सुन्दर रचना के लिये बहुत बहुत बधाई..शादाब ज़फ़र शादाब

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