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साहित्‍यिकी ब्‍यूरो

हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचक औैर बुद्धिजीवी

पाण्डेय शशिभूषण ‘शीतांशु’ हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचकों ने पिछले पचास वर्षों में साहित्य की भावनक्षमता और पाठकीय संवेदनशीलता को कुंठित-अवरोधित…

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डॉ. अल्पना सिंह

भाषा पर हावी क्षेत्रीयता का ऐतिहासिक सच

भारत एक बहु भाषा-भाषी देश है जहाँ चार सौ से भी अधिक भाषाएँ बोली जाती है लेकिन सबसे ज्यादा बोली…

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डॉ. सर्वेश सिंह

साहित्य की आत्म-सत्ता

साहित्य को लेकर चिंताएं फिर बढ़ने लगीं हैं। भूमंडलीकरण और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के कुहरीले घटाटोप में उसके स्वरूप के दबने,…

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डॉ. विवेकानन्‍द उपाध्‍याय

भारतीय राष्ट्र के बोध का स्वरूप

राष्ट्र – राज्य की अवधारणा में मुख्य बात है भूमि की पवित्रता का भाव और वहां पर रहने वाली जनता…

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प्रो. संजय द्विवेदी

प्रौद्योगिकी ने दी है हिंदी लेखन को शक्ति

साहित्य और मीडिया की दुनिया में जिस तरह की बेचैनी इन दिनों देखी जा रही है। वैसी पहले कभी नहीं…

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पीयूष द्विवेदी

हिंदी कविता की दुर्दशा के दोषी हैं वामपंथी साहित्यकार

आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक अपनी विकास-यात्रा की सहस्त्राब्दी पूरी कर चुकी हिंदी कविता के भाव, भाषा और शिल्प…

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