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छोटी सी एक छत…

जिस तरह तीन अधूरे क़िस्से मिलकर एक पूरी कहानी रच सकते हैं, ठीक उसी तरह घर    बनाने के लिए ज़रूरी नहीं कि हमेशा चारदीवारों की दरकार हो। तीन सिरे मिलकर भी एक घर  की मुकम्मल तसवीर बना सकते हैं। कैसे? आइए सुनते हैं कहानी छोटी सी एक छत… 

‘ज़िंदगी…. भले इस हर्फ़ में गज़ल जैसी तरन्नुम हो, लेकिन इससे बड़ा किस्सागो कोई नहीं। अंखुआते हर दिन के साथ हर रोज ये एक नई कहानी लिखती है और रात को जैसे ही चांद सितारों की रखवाली के लिए आसमान में आता है, ये झप से लोरीयों के बगल में कहानियां रख देती हैं कि कहा करे कोई और सुना करे कोई…’ नीले आसमान के तले बिखरी पीली रेत और हरे दरख्तों के दरम्यान बहती यमुना की सावली धार पर नज़रें टिकाए हुए काका ने कहा, तो विनयदास गुप्त उर्फ बिन्नूबाबू का सुर न चाहते हुए भी थोड़ा तीखा हो गया।

‘छोड़ो काका ये चांद-सितारों की किताबी बातें… ये बातें हम जैसे मिडिल क्लास लोगों की ज़िंदगी में फिट नहीं होतीं। हमारे लिए तो ज़िंदगी एक कभी न ख़त्म होने वाला इम्तिहान है। जो रिजल्ट, पर्सेंटेज, इंटरव्यू, नौकरी, प्रमोशन, इ.एम.आई के आगे न कुछ सोचने की इजाजत देती है। न कुछ समझने की।’

‘ओफ्फो विनय! नया खून होकर भी तुम इतनी रूखी, बेजान बातें क्यों करते हो? मुझे देखो मैं तुमसे आधी उम्र का हूं लेकिन आज भी ज़िंदगी का स्केच बनाना शुरू करूं, तो शर्त लगा लो उसके रंग तुम्हारी तसवीर से गहरे होगें।’ काका ने अपने झुर्रीदार हाथ से विनय के कंधे पर धौल जमाई, लेकिन उसने जवाब देने के बजाय नज़रें घाट किनारे बने घरों पर टिका दीं। ये कच्चे, पक्के, छोटे, बड़े, आलीशान, पशेमान घर… ये गैरतों और हिरकतों से भरे घर… ये बुज़दिल, कमज़ोर, खुदगर्ज़ और कमजर्फ घर… ये एक ही कतार में खड़े अलग-अलग शक्ल और साइज़ के नए-पुराने घर… ये टूटे, बिखरे, कहकहे लगते घर… विनय सोचने लगा कि ज़िंदगी की कहानियों में घरों का किरदार शायद इसीलिए अहम होता है, क्योंकि इंसान भले घर को छोड़ दे लेकिन घरों के साए कभी उसे नहीं छोड़ते। यादों में, सपनों मे, पलकों के नीचे-आंखों के किनारे, यहां तक कि कानों की दहलीज़ पर, ज़िंदगी के तमाम सही-गलत के बीच भी एक छांव हमेशा उसके साथ चलती है। जो हमेशा उसे पनाह देती है और हमेशा महफूज़ रखती है अपने भीतर उसका वजूद…

‘क्या सोचने लगे बरखुरदार? मैंने केवल शर्त लगाने को कहा था, कोई तुम्हारा घर अपने नाम नहीं लिखवा लिया….हा हा हा…’ काका हंसने लगे। हंसते काका के साथ उनका पूरा शरीर हंस रहा था। डूबते सूरज के रंग पकड़ती यमुना हंस रही थी। यमुना की लहरों को छूकर गुजरती हवा भी हंस रही थी। विनय ने भी हंसना चाहा, लेकिन होठ बहुत मुश्किल से मुस्कुराने को राजी हुए।

‘इतनी कंजूसी? शर्त लगा लो अभी तुम्हारी जगह नंदनी होती तो पूरा घाट उसकी हंसी से दोहरा हो रहा होता।’

‘नंदिनी.. अब ये नंदिनी कौन है?’

‘अरे! विनयSS तुम नंदिनी को नहीं जानते?’ काका ने ऐसे हैरानी दिखाई जैसे नंदिनी कहीं की पी. एम. हो और उसे न जानना दुनिया का दसवां आश्चर्य..

‘काका यहां आए मुझे वक़्त ही कितना हुआ है और फिर क्या मैं गली-मुहल्लों में जा-जाकर लड़कियों के बायोडेटा इकट्ठा किया करता हूं? जान-पहचान के नाम पर जोड़-जमा एक आप ही तो हो।’

‘हाँ तो मेरा कौन सा कुनबा भरा पड़ा है नातेदारियों से? मैं भी तो ज़िंदगी के बाज़ार में रिश्तों का उतना ही मोहताज हूं, जितने कि तुम या नंदिनी…’

‘समझा नहीं?’

‘क्यों इसमें न समझने जैसा क्या है? अभी कुछ देर पहले तुम मुझे समझा रहे थे न कि ये जिंदगी हम जैसे लोगों के लिए कितनी बेरहम है?’

‘हां…तो?’

‘तो यह बरखुरदार कि बेशक तुम शर्त लगा लो लेकिन उस दर्द को कभी नहीं समझ पाओगे, जो नंदिनी की बेलौस हंसी, चमकती आंखों और बड़ी-बड़ी बातों के पीछे छिपा रहता है।’

‘मतलब?’

‘मतलब यह कि क्या तुम समझ सकते हो कि एक ऐसी लड़की का दर्द जिसकी माँ न हो? उस लड़की का दर्द जिसके कंधे अपनी ही जिम्मेदारियाँ उठाने लायक न हों और उसे पूरे घर को संभालना पड़े? उस लड़की का दर्द, जिसका बाप हद दर्जे का शराबी बन जाए और न सिर्फ खुद पिए बल्कि अपने पियक्क्ड दोस्तों के साथ घर पर ही जुआ खेले, नशा करे, बच्चों के साथ मार-पीट करे? नहीं विनय ऐसे तुम कभी नहीं समझ पाओगे, क्योंकि तुम हमेशा अपने दर्द के बारे में सोचते हो। लेकिन मेरे कहने से एक बार ज़रूर उससे मिलना, शायद तब तुम्हें अहसास हो कि गाढ़े अंधेरों के बीच से भी रोशनी का फूटना किसे कहते हैं… शर्त लगाकर कहता हूं विनय मुझे केवल इस लड़की की चिंता ने बांध रखा है, वरना…’

आज पहली बार विनय को न उठकर जाने की जल्दी दिखाई और न काका की बात काटकर उन्हें गलत साबित करने की। वो चुपचाप काका कि बातें सुन रहा था और आसमान में टिमटिमाते सितारों को देख रहा था। दूर कहीं से आती जोगी तान, हवा में घुलती धुएँ की गंध और पास के जंगलों से सियारों के रोने की आवाज़े… सब कुछ रोज जैसा ही था, लेकिन न जाने क्यों उसे लग रहा था कि जैसे ज़िंदगी यकायक थोड़ी और बेरहम हो गई है और उसके आसपास स्याह जंगलीपन पसरता जा रहा है, जिससे कोई घर, कोई दामन महफूज़ नहीं.. उसने चुपके से अपने भीतर झांककर देखा, वहां एक बेघर अकेलापन गूंज रहा था। वो अचकचा कर उठ खड़ा हुआ।

‘अरे बरखुरदार इतनी जल्दी? ख़ैर… तुम्हारी मर्ज़ी लेकिन कल शाम की सैर के लिए थोड़ा जल्दी आना।

‘क्यों?’

‘वो तुम्हें कल पता चलेगा… मैं बस शर्त लगाकर इतना कह सकता हूँ कि तुमको अच्छा ही लगेगा। खराब नहीं…’

अगले दिन काका के कहे मुताबिक विनय शाम की सैर के लिए वक़्त से थोड़ा पहले निकला। आखिर उसके मन में भी उत्सुकता जाग रही थी कि काका ने उसे जल्दी क्यों बुलाया। कहीं नंदिनी…. उसका दिल बेभाव धड़कने लगे और पांव में गजब की तेज़ी आ गई। लेकिन रास्ते में भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि पहुंचते-पहुंचते रोज का ही वक़्त हो गया।

‘कहीं काका चले तो नहीं गए?’ उसने बेचैन नज़रें चारों ओर घुमाईं ही थीं कि सामने बेदाग, कलफदार धोती- कुर्ता पहने, पुराने बाज़ार के इत्र से महकते काका खड़े थे।   

‘क्या बात है काका आज आप बहुत जंच रहे हो?’

‘शर्त लगा लो बेटा आज भी तैयार हो जाऊँ, तो तुमसे बीस लगूंगा।’

‘हां क्यों नहीं… लेकिन बाक़ी बातें बाद में, पहले बताइए आपने आज मुझे जल्दी क्यों बुलाया?’ विनय ने बच्चों की तरह ज़िद की।

‘खीर खिलाने के लिए।’

‘खीर खिलाने के लिए?’ विनय ने काका के शब्द ही सवालिया अंदाज़ में दोहराए, लेकिन अगले ही पल जैसे उसे कुछ याद आया, ‘कहीं आज आपका….?’

‘हूं सही पकड़ा…’ वे हंसने लगे, ‘मां अक्सर कहती थी, जिस दिन मैं पैदा हुआ, उस दिन बहुत बारिश आई थी। लगा था सब कुछ बह जाएगा उसमें…लेकिन आज देखो आसमान में बादल का एक टुकड़ा तक नहीं… वाक़ई जीवन हमेशा एक सा नहीं रहता…’

‘अच्छा है, वरना मुझे बारिश में भीगते हुए खीर खाने आना पड़ता।’ विनय ने काका के सुर में सुर मिलाते हुए कहा, ‘लाइए अब जल्दी से खीर दीजिए। देखूँ तो कैसी बनी है?’ 

‘शर्त लगा लो अच्छी ही बनी होगी, आख़िर नंदिनी बिटिया ने जो बनाई है।’ काका ने विनय की ओर टिफिन बॉक्स बढ़ाया, तो अनजाने ही उसके मन में हज़ार मर्तबा देखा गया ख्वाब नए सिरे से आकार लेने लगा और वो अपने ऊपर लगी वर्जनों को तोड़कर काका को अपने गुस्से, अपने डर, अपनी खीझ और अपने सपनों के बारे में बताता चला गया। बताना तो नदिनी से जुड़े सवालों के बारे में भी था, लेकिन काका ने उसकी बात बीच में काट दी,

‘मैं समझ सकता हूं विनय… लेकिन ये कमजोरियाँ अकेले तुम्हारी नहीं हम सबकी सच्चाई है। इसीलिए हम सब अमरबेल की तरह सीधा खड़े होने के लिए कोई सहारा तलाशते हैं। फ़र्क बस इतना है कि कोई उस सहारे को तुम्हारी तरह चारदीवारों मे ढूंढता है। कोई नंदिनी की तरह इंसानों में और कोई मेरी तरह गुजरे हुए कल में…’ बात का आखिरी हिस्सा कहते-कहते काका की आवाज़ थरथरा गई। चेहरे का रंग बदल गया और आंखों में यमुना हरहारने लगी। काका का ये रूप देखकर विनय सोच में पड़ गया कि आखिर काका के अतीत में ऐसा क्या है, जो वे इस कदर परेशान हो गए….  

‘काका…’ विनय ने एकाएक झुक गए काका के कंधो पर हाथ रखा। वो इस कदर कांप रहे थे, जैसे तूफान में फंसे घर की नींव कांपती है। चेहरे पर खींची लकीरें उसे पुरानी इमारतों में वक़्त के साथ उभर आई दरारों जैसी लगीं और आंखों का खालीपन किसी उजड़े मकान के ख़ामोश दरीचों जैसा… वो सोचने लगा कि ‘सचमुच एक उम्र बीत जाने के बाद इंसान ख़ुद एक ऐसे घर में तब्दील हो जाता है। जहां का पता केवल यादों को मालूम होता है या सपनों को…’

‘काका आपका घर?’ जाने क्या सोचकर उसने पूछा।

‘मेरा घर… हां कभी था मेरा भी एक घर! जिसमें माँ थी। एक छोटा भाई था और… नहीं और कोई नहीं। बस इतना ही, लेकिन बेरहम वक़्त से इतना भी नहीं देखा गया और वो मेरी आंखों के सामने एक-एक करके सब छीनता चला गया। सबसे पहले बीमारी माँ को ले गई। फिर बाढ़ भाई को… बस एक घर बचा था, मगर जंगली आग की तरह फैले साम्प्रदायिक दंगों ने उसे भी धुएँ और राख में तब्दील कर दिया… अब तो वहां उस पुराने घर की राख भी नहीं बची विनय… लेकिन आज भी रातों को उसकी खिड़कियां, दरवाज़े और आंगन ख्वाब में सामने आ जाते हैं और मेरे नए घर का पता पूछते हैं। मैं उन दस्तकों को क्या जवाब दूं विनय? कौन सा मरहम लगाऊँ, उस बेघर दर्द से निजात पाने के लिए? बताओ विनय बताओ??’ काका किसी ठोकर खाए बच्ची की तरह बिलखने लगे।

विनय ने आज पहली बार काका को इस अंदाज़ में बात करते, इस कदर उदास होते और इस तरह बिलखते देखा था। उसे डर लग रहा था कि दर्द की ये बाढ़ कहीं उसके काका को बहाकर न ले जाए। लेकिन फिर भी वो अपने और काका के दरमियाँ अचानक आकर बैठ गई चुप को तोड़ना नहीं चाहता था। क्योंकि जानता था कि कई बार रीत जाना ही बेहतर होता है। बह जाना में ही भलाई होती है… यमुना की लहरों में हिलती घरों की परछाइयों को देख वो सोचने लगा कि कभी-कभी बातों का कोई सिरा ऐसी जगह जाकर फंस जाता है, जहां बाहर भले कितनी ही चुप हो लेकिन अंदर सब कुछ वैसे ही हिलता रहता है जैसे ये परछाइयाँ…

‘लगता है यमुना आरती शुरू हो गई।’ पीछे से घण्टों-घड़ियालों की आवाज़ों को सुन उसने काका की ओर मुंह घुमाया, लेकिन वहां काका नहीं पुश्त से झड़ी रेत किसी अधूरे किस्से की तरह बिखरी पड़ी थी।  

‘लगता है काका चले गए! लेकिन इस तरह? बात अधूरी छोड़कर?’ विनय के लिए काका का ये रवैया बिल्कुल नया था। थोड़ी देर तक वो यूं ही नासमझों की तरह बैठा रहा। फिर उठकर हॉस्टल रूम की ओर चल दिया, लेकिन उसका मन बेतरह घबरा रहा था। न जाने क्यों??  

घाट से निकलकर डीग गेट तक का रास्ता विनय ने जैसे नीम बेहोशी की हालत में तय किया। लोगों की भीड़, गाड़ियों के हॉर्न और बसों का धुआं… ये तमाम चीजें जो कल तक उसकी लानतें झेलती थीं। गालियां खाती थीं। आज जैसे होकर भी नहीं थीं। उसकी आंखों में आंसुओं से भीगा काका का चेहरा था, जुबान पर डर के साए में जीती नंदिनी की खीर का स्वाद और मन में दूसरों के घरों में गुजरे बचपन की कड़वी यादें… इस पल उसे न जाने कितनी बातें याद आ रही थीं, लेकिन सब आधी-अधूरी… उसने तड़पकर पूछना चाहा कि क्यों घर हम सबकी ज़िंदगी में एक सवाल बनकर टंग गया है? क्यों काका को अपने घर से भागना पड़ा? क्यों नंदिनी अपना घर होते हुए भी वहां से लौटना नहीं चाहती? और क्यों मुझे, जिसने हमेशा एक छोटी सी छत चाही, उसे घर के नाम पर चारदीवारें तो मिलीं लेकिन अपनाइयत की छत कभी नहीं….?

सवाल तो और भी थे लेकिन जवाब देने के लिए आसपास कोई नहीं था… कोई भी नहीं… कमरे में केवल घर्र्घर्र करता पंखे की आवाज़ गूंज रही थी। अकेलेपन में डूबे इस गाढ़े सन्नाटों भरे वक्त में विनय को ये आवाज़ सुकून दे रही थी। काफी देर तक वो चुपचाप उस आवाज़ को सुनता रहा और कब नींद की चादर में लिपटकर सो गया। उसे पता ही न चला।

अगली सुबह दूध वाले की घण्टी से नींद खुली, तब गहरी नींद में जागता शहर विनय को किसी उमस भरे लिफ़ाफ़े में बंद मालूम हुआ।

‘ये मौसम, ये मिजाज़, ये मन… कौन जाने अगले पल क्या होने वाला है!’ विनय के दिल पर आज भी कल तारी था। मन भी टूट रहा था, लेकिन तभी जेहन में काका की कही बात गूंज उठी, ‘क्या बरखुरदार… तुम हमेशा ऐसे आहें क्यों भरते रहते हो? अगर सवाल हैं, तो जवाब ढूंढो। अगर सपने हैं, तो उन्हें पूरा करो। आख़िर इंसान के बच्चे हो…’ और वो मुस्कुरा दिया।   

‘चलो ठीक है काका, ये भी तय रहा। अब मैं ख़ुद को साबित करके ही दिखाऊंगा और सबसे पहले शाम को आपकी ख़बर लेनी है। आखिर कल इस तरह आप उठकर गए क्यों?’ विनय ने सोचा, लेकिन शाम को जैसा सोचा था वैसा हो न सका। क्योंकि काका घाट पर आए ही नहीं… कितनी देर… कितनी देर तक वो केवल काका इंतज़ार में सामने घरों में हो रही हलचल को देखता रहा। आते-जाते लोगों की बातें सुनता रहा। नाव वालों की एक-एक सवारी के लिए हो रही लड़ाइयों का हिसाब लगता रहा। लेकिन काका नहीं आए। न उस दिन और न उसके अगले कई दिन… हमेशा की तरह विनय एकबार फिर उलझ गया था कि एकाएक काका आखिर कहां चले गए?  

इस सवाल की सलीब पर टंगी उस शाम के बाद धरती सूरज के गिर्द चक्कर काटती रही और वक़्त के तमाम नियम ताक पर रखकर इंतज़ार की घड़ियां लंबी होती गईं। आसपास के लोग, पास का पुलिस स्टेशन, चाय वाला, नुक्कड़ का सब्ज़ी वाला… जितने भी विकल्प हो सकते थे, विनय ने सब आजमा लिए लेकिन न काका मिले। न उनकी ख़बर… धीरे-धीरे वक़्त बढ़ता गया और आस पुरानी होती गई, आख़िर उसने भी घाट  किनारे जाना बहुत कम कर दिया। क्योंकि वहां जाते ही उसे ख़ुद पर गुस्सा आता कि क्यों वो मुलाक़ातों को मुकम्मल मानकर बैठा रहा? क्यों उसने काका से नहीं पूछा कि वे कहां रहते हैं? क्यों नहीं मांग लिया उनसे नंदिनी का पता, कोई फोन नंबर…? लेकिन फिर भी एक अनजान आस चार-छह दिन में विनय को घाट किनारे खींच ही लाती।

उस रोज भी जब दिन के दामन से निकलकर बस्ती पीले धुंधलके में डूबने की तैयारी कर रही थी, विनय घाट किनारे खड़ा दुनिया का व्यापार देखने आ गया। अचानक कानों से काका की आवाज़ टकराई,

‘अरे विनय…. कहां गायब थे बरखुरदार?’ 

वो झटके से पलटा, सामने चमकती आंखों वाली एक पतली-दुबली लड़की के साथ काका खड़े थे। वही हंसता चेहरा, वही ज़िंदादिल अंदाज़ और वही दर्द से लिपटी रोशन नज़र… हां सौ प्रतिशत वो काका ही थे। विनय सबकुछ भूल उनसे लिपट गया।

‘कहां चले गए थे आप? कितना ढूंढा आपको मालूम है?’

‘अमा यार इतना घबरा क्यों रहे हो। तुमने कोई भूत नहीं देख लिया। मैं अभी जिंदा हूं और भगवान की दुआ से हज़ार साल ज़िंदा रहूंगा… लेकिन देखा नंदिनी मैंने शर्त लगाई थी न कि विनय मिलते ही सवालों की बमबारी करने लगेगा… हुई न शर्त पूरी। अब चुपचाप खीर खिला देना! हा हा हा…’ काका ने हंसते हुए कहा तो नंदिनी मुस्कुराने लगी और वो झेंपकर आसपास ताकने लगा।

यमुना किनारा सांझ की नीली रोशनी में पूरी तरह लिपट चुका था। दरख्तों की पत्तियों भी हरियाली छोड़ स्याहियों में डुबकी लगती महसूस हो रही थीं। बस थोड़ी देर और… फिर जहां सांझ है, वहां रात होगी। लेकिन वो नहीं चाहता था कि ये शाम इस तरह चुपचाप अधूरी बीत जाए। बल्कि वो ज़िंदगी के लिखे इन अधूरे किस्सों को एक मुकम्मल कहानी में नहीं बदल देना चाहता था। वह उठा और रेत का घरौदा बनाने लगा। थोड़ी देर में काका और नंदिनी भी उसके साथ घरोंदे की छत बना रहे थे।

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