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अंतर्विरोध ने बनाया कथाकार : चित्रा मुद्गल

हिंदी की जानी-मानी कथाकार चित्रा मुद्गल से जब आप पहली बार मिलेंगे, तो माथे पर बड़ी-सी गोल लाल बिंदी पर सहज ही आपकी नजर टिक जाएगी। चित्रा लोगों से बड़ी गर्मजोशी से मिलती हैं, जैसे वर्षों पुरानी पहचान हो। उन्हें देखकर यह कतई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि वे सोशल एक्टिविस्ट और राइटर हैं। जब भी किसी सामाजिक समस्या ने उनके दिलो-दिमाग को आहत किया, तो उन्होंने कलम उठाई और एक उपन्यास रच दिया। तभी तो उनके लिखे उपन्यासों ‘एक जमीन अपनी’, ‘आवां’, ‘गिलिगड्डू’ ने न सिर्फ आम पाठकों को सोचने के लिए मजबूर किया, बल्कि साहित्यिक गलियारों में भी खूब प्रशंसा बटोरी। ‘आवां’ के लिए उन्हें व्यास सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। अब तक उनके तेरह कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और तीन बाल उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्‍तुति :स्‍मिता

असंतोष ने बनाया लेखिका

चित्रा मुद्गल का जन्म उत्तर प्रदेश के एक सामंती परिवार में हुआ था। उनके पिता नेवी में एक अफसर थे। रुढि़वादी विचारधारा और एक सैनिक की ठसक – दोनों ने मिलकर उन्हें कठोर बना दिया था। स्त्रियां उनके आगे अपना मुंह खोलें, उनके लिए यह असहनीय बात थी। यहां तक कि चित्रा की मां भी उनसे कोई बात नहीं कह पाती थीं। चित्रा उनके सामने विरोध प्रकट करने के लिए चिठ्ठियों का सहारा लेती थीं। वे कहती हैं, ‘मैं चिठ्ठियां लिखकर बप्पा के तकिए के नीचे रख देती थी। वे उन्हें पढ़ते, लेकिन उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके फेंक भी देते। इतना ही नहीं, उन टुकड़ों को वे अपने जूतों से रौंदकर बाहर चले जाते। मेरे लिखने की शुरुआत यहीं से हुई। मेरी पहली कहानी ‘डोमिन काकी’ स्कूल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका में छपी थी। ‘सफेद सेनारा’ मेरी पहली कहानी है, जो नवभारत टाइम्स में छपी थी। इस कहानी को खूब सराहा गया और यह पुरस्कृत भी हुई।’

चित्रा मुद्गल

सच्ची घटनाएं करती हैं उद्वेलित

समाज की समस्याएं चित्रा को उद्वेलित करती रहती हैं। यही वजह है कि जब वे मुंबई में कॉलेज की पढ़ाई कर रही थीं, तो अपने पिता के विरोध के बावजूद ट्रेड यूनियन लीडर दत्ता सावंत की अगुआई में ट्रेड यूनियन ज्वाइन कर लिया। इसके तहत उन्होंने मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाई और अपनी बात सरकार तक पहुंचाई। वे कहती हैं, ‘विज्ञापन जगत का जबसे प्रचार-प्रसार बढ़ा है, स्त्री देह को उपभोग की वस्तु बना दिया गया। इसके लिए क्या स्त्रियां खुद भी जिम्मेदार हैं?’ इसी सवाल पर आधारित है उनका पहला उपन्यास ‘एक जमीन अपनी’। एक ट्रेड यूनियन लीडर शंकर गुहा नियोगी की हत्या ने उन्हें अंदर तक हिला दिया और उन्होंने दूसरा उपन्यास लिखा ‘आवां’। ठीक इसी तरह तन्हा हो रही बुजुर्ग पीढ़ी पर आधारित है ‘गिलिगड्डू। उनका एक उपन्यास ‘पोस्ट बॉक्स नं-203 नाला सोपारा’ एक किन्नर बच्चे की मनोदशा और उसकी चाहत पर आधारित है। ‘भीतर का आयतन (लेख संकलन)’, ‘समय के दस्तक (निबंध)’, ‘आंगन की चिडिय़ा (कथा-संकलन)’ भी इसी वर्ष प्रकाशित होने वाले हैं। हालांकि वे कहानियां 1964 से ही लिख रही हैं, लेकिन उनका पहला उपन्यास आया 1990 में। वे मानती हैं कि कहानी साधने के बाद ही उपन्यास लिखा जा सकता है, क्योंकि कहानी में एक कथाकार को कुछ पात्रों और घटनाओं को समेटना होता है, जबकि उपन्यास में कई पात्रों और कई घटनाओं को एक सूत्र में बांधना पड़ता है।

टुकड़ों-टुकड़ों में लेखन

चित्रा मुद्गल खुद को पहले गृहिणी मानती हैं। सामाजिक कार्यों को वे दूसरे नंबर पर रखती हैं। उनके लिए लेखन कार्य सबसे बाद में आता है। वे कहती हैं, ‘मेरे पति अवध मुद्गल लंबे समय से बीमार चल रहे हैं। उनकी सेवा-सुश्रूषा के बाद जो समय मिलता है, उनका उपयोग सामाजिक कार्यों और लेखन के लिए करती हूं। टुकड़ों-टुकड़ों में लिखती हूं मैं। सुबह 3-4बजे का अलार्म लगाती हूं। अगर नींद खुल गई, तो लिखने बैठ गई। दिन में अगर मुझे मौका मिला, तो कहानी या उपन्यास के नोट्स बना लेती हूं।’ चित्रा मुद्गल किताबों को जीवन का दर्शन मानती हैं। उनको सहजने के बारे में पूछने पर वे पुराने दिनों को याद करने लगती हैं। कहती हैं, ‘शादी के बाद मैं और अवध मुंबई में रह रहे थे। सोने का कमरा, रसोई सब एक ही कमरे में थे। उस समय आप जिधर भी नजर दौड़ाते किताबें ही किताबें नजर आतीं। किताबों से इतना लगाव था कि अनुवाद से मिले पैसों से अपनी पसंद की किताबें खरीदती। किताबें जमा होती गईं, लेकिन उन्हें रखने के लिए मुकम्मल जगह का इंतजाम नहीं हो पाया।’ जब उनकी कुछ आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, तो किताबों को रखने के लिए अलग व्यवस्था कर पाई। हालांकि आज भी दिल्ली में उनके आवास में बेडरूम, ड्रॉइंग रूम, स्टडी रूम, जहां भी आप नजर दौड़ाएंगे, उनके मनपसंद लेखकों की किताबें ही नजर आएंगी। (दै. जागरण से साभार)

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