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गीत और गजल

हम जवां

कच्‍ची उड़ान के नतीजों से हमें क्‍या डरना,

हम तो हर ज़ख़्म को सीने में जगह देते हैं;

वक़्त की मार को कह दो कि हमें ना परखें,

हम तो तूफ़ाँ को भी तिनके से मुड़ा देते हैं।

सोच पर पहरे लगाने से भला क्या हांसिल,

मंज़िल की महक इरादों को हवा देती है;

जो ना समझो हमें तो दूर ही रहो हमसे,

हम तो टूटे हुए शीशों को जुड़ा देते हैं।

दर्द के साए से ना हमको हिला पाओगे,

जूझना हमने भी सीखा है आंधियों से ही;

उम्र की ज़ात पर तक़रीर हमें क्‍या दोगे,

फिक्र-ए-हालात हम बेपरवाह उड़ा देते हैं।

                    दीवानगी

हरकतों में तेरे जज़्बात की रवानी है,

मेरे इस दिल में तेरे प्‍यार की कहानी है;

तुझे जो चाहा तो दुनिया भी मैं भूला बैठा,

तेरी चाहत मेरी चाहत की ही निशानी है…

पलकों ने तेरी मुझको कुछ छुआ ऐसे,

मेरे हर जन्‍म की मांगी हुई दुआ जैसे;

तेरे कदमों तले मैं जान यूं गंवा बैठा,

मानो खुदा की हर खुदाई भी बेमानी है;

तेरी चाहत मेरी चाहत की ही निशानी है…

फ़ज़ल-ए-करम जो इश्क़ ने किया मुझ पर,

तुझे पाकर चले अब बस नहीं मेरा खुद पर;

तेरे मेरे बीच हर दीवार मैं गिरा बैठा,

इस क़दर प्‍यार की तासीर तक दीवानी है;

तेरी चाहत मेरी चाहत की ही निशानी है…

                           पनाह   

लकीरों की तमन्‍नाओं को लहरों में गुमां देंगे,

इन तैरते ख्‍वाबों को हर वक़्त पनाह देंगे।

वजूद-ए-इंतेहां जब चेहरे को बदल जाती है,

हसरतों के दामन में  बस मुफ़लिसी आती है;

चाहत के परिंदों को उड़ने की हवा देंगे,

इन तैरते ख़्वाबों को हर वक़्त पनाह देंगे।

इस ज़िंदगी के मेले में ख़ामोशी है जो छाई,

गूंगे मेरे बोलों में कुछ जान सी है आई; 

आज़ाद है जो बंदिश हम उसको हटा देंगे,

इन तैरते ख़्वाबों को हर वक़्त पनाह देंगे।

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