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घिसते शब्‍द

कुछ शब्‍द घिसते हैं
कुएँ के पाट पर लगे पत्‍थर से
रोज ही
फिर भी बोलते हैं हम
आदतन
जैसे पाट पर रखते ही
रस्‍सी ढूँढ़ लेती है
रगड़ी गई जगह
जहाँ से सुविधा हो उसे
तल तक जाने की
वैसे ही
कुछ शब्‍द, घिसे होते हैं
रगड़ खाए भी
मगर बोलते हैं हम
संबंधों की सहूलियत के लिए
जहाँ
असत्‍य सही, ध्‍वनित हो
एक अनुराग
और हम रिश्‍ते की बाल्‍टी में
भर लाएँ, कुछ बूँद पानी के।

प्रेम निष्‍काषित माना जाएगा

प्रेम, धीरे-धीरे सूखता जाएगा
चाहेगा मन, फिर से सब एक बार
मगर जरूरत नहीं होगी
साथ-साथ रहते, साथ-साथ चलते
सारे सवाल भोथरे हो जाएँगे
जवाब की प्रतीक्षा अपनी उत्‍सुकतता खो बैठेगी
पाने की आकांक्षा, खोने का दर्द
एकमएक लगने लगेंगे
धूप- छाँव सा मन
एक ही मौसम को सारी ईमानदारी सौंपेगा
मन रेगिस्‍तान
या किसी हिल स्‍टेशन की
ठंढ़ी सड़क सा बन जाएगा
आत्‍मा निर्विकार
भावनाओं का गला घोंटकर
सबको परास्‍त करने में लग जाएगी
नहीं सोचेगा कोई भी
किसी की पीड़ा, किसी की चाहत
सब दौड़ते नजर आएँगे
एक-दूसरे को कुचलते-धकियाते
वक्‍त किसी के लिए नहीं रूकेगा
क्रोध के दिल से निकलते ही
सबसे पहले अधिकार झरेगा
फिर प्‍यार
हम साथ-साथ जीते हुए
अनदेखे फ़ास्‍ले तय करते जाएँगे
बहुत बड़ी हो जाएगी अपनी-अपनी दुनिया
हम दिखा देंगे खुद को खुशहाल , मगर
हमारी आत्‍मा में बसी खुश्‍बू
हमसे ही दूर होगी
वक्‍त थमेगा नहीं, लोग आक्रामक और
असहनशील होंगे
ह्दय से करुणा विलुप्‍त होगी
शर्म महसूस होगी
अपनी तकलीफों और आँसुओ को दर्शाने में
मन क्रूर और वाणी विनम्र होगी
चेहरा दर्पण से जीत जाएगा
और बचा प्रेम
धीरे-धीरे बंद मुट्ठियों से निकल जाएगा
दिल
किस्‍मत को कोसता पत्‍थर हो जाएगा
सीने पर नहीं ठहरेगा फिर
हरेक इंसान के हाथों में अस्‍त्र की तरह पाया जाएगा
इस तरह प्रेम
समूची पृथ्‍वी से निष्काषित माना जाएगा।

दौड़ती-भागती जिंदगी

पढ़ी हुई क़िताब का
तुम वो सफ़ा हो
जो बेहद पसंद है मुझे
मगर मैं बार-बार पढ़ना नहीं चाहती
इसलिए बंद रखती हूँ
यादों की वो किताब
जिससे तुम्‍हारी रुपहली मुस्‍कान
झाँका करती है गाहे-बगाहे
और तुम
अरसे बाद बीच-बीच में
बाहें पसारे चले आते हो
जैसे मेरी खातिर
वक्‍त को थाम रखा है
ज़िन्दगी दौड़ती-भागती फिर रही है
कुछ लम्‍हों को
ऐसी शाख पर रख छोड़ा है
जो पतझड़ में भी मुरझाती नहीं….।

झील का किनारा

व्‍याकुल चाँद
आकर ठहरा ही था आकाश में
कि उतरना है अभी
उसी झील में
जिसका पानी
हर रोज ढलती शाम को
हरे रंग में बदल जाता है।

एक चाँद चेहरा
उदासी के साए से
निकलने को बेताब
उसी झील किनारे बैठ
पत्‍थरों पर
पायल की छमछम संग
दर्द भरा कोई गीत गुनगुना रहा था ।

चाँद
आसमाँ से उतर
बैठ गया
झील की सतह पर चुपचाप
देखता रहा
डूबे हुए दो पावों के महावर को
झील के पानी में घुलते हुए

चाँद
पानी की तरह
चूमना चाहता था
पाँवों से लिपटी पायलों को
जिसकी छमछम से
निकलता था एक नाम
जो सूरज-सा दमकता था
लड़की के खूबसूरत माथे पर कभी

अब चाँद
छुप गया घने पेड़ों के अक्‍स तले
देखता रहा
आँसुओं की लुकाछिपी से घबरा
बह निकले
आँखों के काजल को
इस कदर उदास लगने लगी थी
वो कत्‍थई आँखें
जैसे तारों भरे आसमाँ से
किसी ने चाँद चुराया हो

रात उतरने लगी
पीले टिकोमा के फूल
चाँदनी में और भी
खूबसूरत लगने लगे
चाँद चलकर झील के मुहाने आ ठहरा
लरज उठे दो बेपरवाह से पाँव
ये गुस्‍ताख चाँद
कहीं चूम न ले उन पाँवों को
जिन्‍हें छाती पर धरकर
सोया करता था उसका सूरज

आज
डूब चुका है सूरज
कल इसी झील के पूरब से नि‍कलेगा
तब हरा पानी
यकायक सफेद हो जाएगा
उदास आँखों ने
पत्‍थरों को सौंप दी अपनी अमानत
चट्टान पर रखा है
किसी की
आँखों का काजल, होंठों की सिसकी
और एक जोड़ी पायल

भोर जब सूरज की
आँख खुलेगी
छटपटाता सा ढूंढेगा
छमछम करते पैरों का अक्‍स
तीखी धूप में कुछ नजर नहीं आएगा
एक बार फिर
झील के पानी में पेड़ों का घना साया
उतर आएगा
चाँदनी मुस्‍कराएगी

चाँद
छुपकर करेगा पीपल की ओट तले
कत्‍थई आँखों वाली परी का
इंतजार
आज तो वो जरूर आएगी
पायल, बिछिया कंगना पहन
रात से बतियाएगी

मगर
ढलती रात ने
उदास, सूनी आँखों में अंधि‍यारे का काजल
लगा दिया
रोते पत्‍थरों ने कहा चाँद से
खो गई किसी की अमानत

झील उदास है, पेड़ खामोश हैं
अब किसी शाम
पानी का रंग हरा नहीं होता
रोज रात कोई
सिसकियाँ भरता है
पानी में किसी के पैरों का
महावर धुलता है
झील का लाल पानी देख
चाँद अब छुप-छुप कर रोता है।

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