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गिलिगडु : वृद्धावस्था का दर्द और प्रश्न

बहुत पहले की एक कहानी है कि- ‘‘एक बुजुर्ग अपने संदूक पर एक ताला लगाकर रखता था। उसके बच्चे और बहुएँ ये सोचते थे कि बुजुर्ग के पास संदूक में कुछ बहुत कीमती रखा है। इसी लालच  में वे सभी बुजुर्ग की सेवा करते रहे। परन्तु जब उसकी मृत्यु हो गई तो संदूक के ताले को तोड़ने पर सभी ने ऐसा महसूस किया कि उनके साथ छल किया गया, क्योंकि संदूक  में रद्दी के अलावा कुछ नहीं था। सभी ने बूढ़े को भला-बुरा कहा, कोसा।’’ कहानी यही समाप्त हो जाती है।

परन्तु क्या यह कहानी यही समाप्त होनी चाहिए या फिर इस कहानी में जितनी बातें कही गयी हैं सिर्फ उतनी ही बातें है? ध्यान देने वाली बात यह है कि क्यों एक वृद्ध को अपने ही बेटे-बहुओं को गफलत में रखना पड़ा। बुढ़ापे की बेचारगी का वह दर्द, दो जून का भोजन और निशक्त होते शरीर की जरूरतों को भी यह कहानी अपने अंदर छिपाए है। क्या मात्र धन ही वह एक मात्र साधन है जिसके सामने सभी रिश्ते लाचार है। यदि ऐसा ही है तो हमें मूल्यांकन करना होगा कि हम कैसा समाज बना रहे हैं। अगर ऐसा है तो हर व्यक्ति को जीवन भर सिर्फ संपत्ति एकत्रित करनी चाहिए। पिता, भाई, बेटे के दायित्व से मुक्त होकर धन एकत्रित करके हम बढ़ापे में सबको अपना गुलाम बना सकते हैं। लाभ-हानि की संस्कृति ने जिस प्रकार हमें पंगु बनाकर हमारी भावनाओं, स्नेह, प्रेम को सिक्कों में तौला है वह मानवता के लिए खतरा है।

इन्हीं मूल्यों के पतन की कहानी कहता है- ‘गिलिगडु’ उपन्यास। जिसके माध्यम से चित्रा मुद्गल जी ने वृद्ध जीवन की कोमलता और संघर्ष को हमारे सामने रखा है। आज वृद्ध हर परिवार में वैसे हो गए है जैसे केदारनाथ सिंह के कविता का ‘कुदाल’, जिससे घर को बराबर तो किया जाएगा परन्तु उसके लिए घर में जगह नहीं है-

                   ‘‘काम था

                   सो हो चुका

                   मिट्टी थी

                   सो खुद चुकी है जड़ो तक

                   और अब कुदाल है कि चुपचाप चुनौती की तरह

                   खड़ी है दरवाजे पर।’’[1]

यह कुदाल हमारे बुजुर्ग ही है जिन्हें हम ‘यूज’ तो करते हैं परंतु अपने जीवन में ‘स्पेस’ नहीं देना चाहते-

                   ‘‘पर नहीं मेरे मन ने कहा

                   कुदाल नहीं रह सकती ड्राइंग रूप में

                   इससे घर का संतुलन बिगड़ सकता है।’’[2]

इसी बिगड़े हुए संतुलन को चित्रा मुद्गल ने अपने उपन्यास में चित्रित किया है। जिसमें बुजुर्गों के जीवन की महत्वाकांक्षा, स्वाभिमान, पीढ़ी की टकराहट से उपजा मानसिक संघर्ष, परिवार में लगाव-तनाव के नए समीकरण सबकुछ यहाँ विद्यमान है। उपन्यास में दो बुजुर्ग पात्र है, जसवंत सिंह, जिनकी दो सन्तानें है बेटी-बेटा, बहु, पोते हैं। दूसरे है रिटायर कर्नल स्वामी जो अपने परिवार से संतुष्ट है, खुश है, भरा-पूरा परिवार है। कहानी के प्रारंभ से ही जसवंत सिंह की बेचारगी दिखती है जब वे अपना पुश्तैनी घर छोड़ बेटे-बहू के पास दिल्ली में आकर रहने लगे हैं। उन्हें यहाँ अपनी निरर्थकता का बोध हमेशा होता रहता- ‘‘चलो बेटे-बहू ने टॉमी की जिम्मेदारी सौंपकर उन्हें अपने गृहस्थी के किसी जिम्मेदारी के काबिल तो समझा।’’[3]

यह स्थिति कितनी पीड़ादायक है कि जीवन भर के अनुभवों की खान हमारे बुजुर्ग हमारे लिए गैर जरूरी होते चले जा रहे। यहाँ तक कि टेलीविजन पर आने वाले कार्यक्रमों में टॉमी को जसवंत बाबू से अधिक वरीयता दी जाती है। जीवन के उन मूल्यवान अर्थों को आज के बूढ़े और उस जमाने के युवा ने जो अनुभवों से अर्जित किया है अब से सब अर्थहीन होते चले जा रहे हैं।

‘पितृ देवो भव’ का जाप करने वाली संस्कृति पर पाश्चात्य ‘डे’ पर्व जिस तरह हावी हो गए हैं वैसे ही उनके मन पर पाश्चात्य ममता हीनता का जादू भी हावी हो गया है। अपने ही घरों में बाहरी जैसी स्थिति होने पर ही ऐसे उद्गार निकलते है- ‘‘वे अनिच्छा प्रकट करने की औकात नहीं रखते। इच्छा-अनिच्छा घरवालों की होती है। घर में आकर रहने वालों की नहीं।’’[4] जननी और जनक के प्रति संतान के जो अनिवार्य कर्तव्य बताए गए थे उन कर्तव्यों को भौतिकवाद ने लील लिया। उम्र के चौथेपन में न ही शरीर उतना मजबूत होता है और न ही मानसिक दशा। ऐसे में हमें बुजुर्गो के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता बरतने की जरूरत होती है। परन्तु स्थितियाँ जिस गति से बदल रही है कि हमें अपने परिवार में उन्हीं बुजुर्गों की खुराक अधिक लगती है जिन्होंने अभी तक कमाकर हमें खिलाया है। उनकी पसंद, नापसंद को नजर अंदाज करना उनके अस्तित्व को नकारने जैसा है- ‘अक्सर उन्हें वही खाना पड़ता है या खिलाया जाता है जो उनके ढीले और खोखले हो गए दाँतों को मंजूर नहीं होता’’[5]  उनके स्वास्थ और सम्मान के प्रति हम जो गैर जिम्मेदारी बतरेंगे, वही कल हमारे साथ होगा।

वृद्ध हमारे समाज के बहुमूल्य धरोहर है, हमारे समाज की एक जरूरत हैं। अगर वह न होते तो हम होत ही नहीं- यह बात हमारी चेतना से बाहर कैसे हो सकती है? बुजुर्ग हमसे उम्र में जितने अधिक होते हैं वह उसी अनुपात में अनुभवों के खान होते हैं। ऐसा हो सकता है वे अनुभवों, मान्यताओं को लेकर रूढ़िवादी हो, हठी हो किंतु इस कारण बुरे तो नहीं हो सकते। प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर उसके वातावरण का विशेष प्रभाव रहता है। इसलिए उनकी सीमाओं के साथ उन्हें स्वीकार करने में ही समाज का भला है। उन्हें किसी दोष के लिए हम तुरंत अपराधी घोषित कर स्वयं को न्यायधीश की अवस्था में यदि रखेंगे तो समाज का संतुलन बिगड़ जाएगा। बाबू जसंवत सिंह पर जब अभद्रता का आरोप एक महिला लगाती है तो उनकी बहु जिस लहजे में उन्हें फटकार लगाती है वह एक बुजुर्ग के लिए ही नहीं किसी भी व्यक्ति के लिए मृत्यु जैसी पीड़ा को उत्पन्न करने वाला है- ‘‘आखिर बाबूजी इस संभ्रात सोसायटी में उनकी इज्जत खाक में मिलाने पर क्यों उतारू है? अपनी उम्र का लिहाज किया होता। अभी भी जवानी का जोश बाकी हो तो दिक्कत कैसी? चले जाया करें रेडलाइट एरिया। कौन पेंशन कम मिलती है उन्हें जो उनकी मौज मस्ती में हाथ बधें हो? कम से कम अडोस-पड़ोस की किशोरियों पर तो नजर न डालें। मुँह दिखाने लायक रखें उन्हें सोसायटी में।’’ [6]

बिना खोजबीन किए किसी पर ऐसा घिनौना आरोप लगा देना उसके मान-सम्मान के चिथड़े उड़ाने जैसा है। मानवीय गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार को बुजुर्गों से सिर्फ उनकी विवशता के कारण नहीं छीना जाना चाहिए। प्राकृतिक न्याय की अवधारणा के भी यह विरुद्ध है कि उन्हें स्वयं सफाई का अवसर ही न मिले। जब तक परिवार में उन्हें सम्मान व अवसर नहीं मिलेगा तब तक उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं हो सकती- ‘‘बाबू जसवंत सिंह को समझ नहीं आया कि वह भला किसे सफाई दें? बिना अपराध के अपराधी करार दे दिए गए। विचित्र विडंबना है। अपने ही सुनने को तैयार नहीं?’’[7] कर्नल साहब की भी स्थिति यही है परन्तु वह अपने को समय से मुठभेड़ के लिए तैयार रखे हैं। वे भी परिवार से तिरस्कृत है परन्तु हमेशा अपने परिवार की खूबियाँ बताते रहते हैं। एक तरह से उन्होंने अपने अलग-बगल कल्पना का इतना सुनहरा संसार निर्मित कर रखा है कि उसे भेदना बहुत ही मुश्किल है। वे भी अकेले जीवन जीने को अभिशप्त है परंतु हमेशा ऐसी बाते करते हैं जैसे परिवार ने उन्हें पलकों पर बैठा रखा है। जसवंत सिंह उनके भाग्य से ईर्ष्या करने लगते हैं कि कितना स्नेही परिवार है। एक उनका परिवार है- जिनके बारे में सोचते है- ‘‘उनका मानना है कि घर में एक नहीं दो कुत्ते हैं- एक टॉमी, दूसरा अवकाश प्राप्त सिविल इंजीनियर जसवंत सिंह! टॉमी की स्थिति निस्संदेह उनकी बनिसबत मजबूत है। … टॉमी अच्छी नस्ल का कुत्ता है। सोसायटी में उनके घर का रूतबा बढ़ता है। उनके चलते उनका रुतबा कलंकित हुआ है।’’[8]

अततः बाबू जसवंत सिंह को अपमान की उस घृणित दशा का दर्शन करा दिया जाता है। जिसके दर्शन से पहले कोई भी व्यक्ति ‘मृत्यु’ का सामना करना उचित समझेगा। जब जसवंत सिंह की बेटी कहती है- ‘‘भैया तो यहाँ तक सोच रहे हैं कि जहाँ बाबू जी का मन लगे, वे प्रसन्नचित रहे, उन्हें वहीं रखा जाए। उन्होंने पता लगाया कि नोएडा के सेक्टर पचपन में कोई आनंद निकेतन वृद्धाश्रम है क्यों न उनके रहने की व्यवस्था वहीं कर दी जाए… बाबू जसवंत सिंह के हाथ से टेलीफोन का रिसीवर छूट गया।’’[9]

आज की पीढ़ी किस अनुभव के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लेती है कि वृद्धाश्रम में उनके माँ-पिता खुश रहेंगे घर से बेघर होकर आश्रमों तक पहुँचने वाले बेवश वृद्धों के मजबूरी भरे सफर की यह दास्तान हमारे अपसंस्कृति के मारे अपाहिज होते हमारे समाज के कटु यथार्थ को झलते, कराहते, नित-नित टूटते जीवों की जो कड़वी दास्तान है, उन्हें उनके बीच रहकर ही समझा जा सकता है।

वृद्धाश्रम का यह विकल्प तो आरंभ में बहुत सराहा गया। युवाओं के लिए तो इसका विशेष अर्थ था कि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। माता-पिता का भार भी उनके जिम्मे नहीं रहा। उन्हें निर्ममता के ताने भी नहीं सुनने पड़े। लोकलाज बनी रही। उनको माँ-बाप की बेचारगी के हालत में भी घर से दूर करने का एक ऐसा साधन मिल गया था, जिसमें उन्हें आत्मरक्षा में तर्क देने का अवसर भी सहज ही मिल जाता था- अब वे अपने माँ-बाप की आजादी का ध्यान रखते हुए, उनके खान-पान और स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त सुविधाओं के साथ एक सहज जीवन की इससे अच्छी व्यवस्था कैसे कर सकते हैं। संवेदनहीनता में जी रहे पीढ़ी को यह नहीं भूलना चाहिए कि माँ-बाप की जरूरतें मात्र खाने-पीने और रात को सोने भर तक सीमित नहीं होती। इस व्यवस्था से कही ज्यादा उनका हृदय परिवार के लगाव, अपनों के स्नेह व अपने कर्मो के परिणाम के रूप में अगले पीढ़ी को सफल होते देख खुश होता है। एकाकीपन जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है। इस त्रासद स्थिति में उन्हें छोड़ देना उनसे उनका होना छीन लेने जैसा है। कर्नल स्वामी को उनके बेटों ने अकेले रहने को छोड़ दिया है। वे पेंशनधारी है परन्तु अपने परिवार, अपने पोतियों से दूर रहना बहुत ही अखरता है उन्हें। वह सब कुछ अपने अंदर समेटते हुए मलिन बस्ती के बच्चों में वह प्यार खोजते है जो उन्हें अपने नहीं दे सके। मिसेज श्रीवास्तव का यह कथन- ‘‘ऐसी कसाई औलादों से तो आदमी निपूता भला। हमें इस बात का कोई गम नहीं कि हमारी कोई अपनी औलाद नहीं।’’[10]  समाज में तिरस्कार और एकाकीपन को जी रहे वृ़द्वों को देखकर कोई भी संवेदनशील मनुष्य यही कहेगा। वह कहती हैं- ‘‘पिछले आठ वर्षों से हमने भाई साहब को अकेले ही रहते देखा है।’’[11]

हम कभी-भी किसी जीवित प्राणी को उसके संबंधों से अलग करके तथा उसकी प्रतिपूर्ति भौतिक संसाधन उपलब्ध कराके तृप्ति नहीं दे सकते। इस एकाकीपन से निकालकर ही हम किसी व्यक्ति को उसका जीवन दे सकते हैं। जहाँ सुविधाओं से ज्यादा साहचर्य आवश्यक है।

इस प्रकार एकाकीपन, उपेक्षा, तिरस्कार के साथ जीवन जीने को अभिशप्त आज की वृद्ध पीढ़ी के मान-सम्मान और अस्तित्व को संभालना हमारी जिम्मेदारी है। प्रत्येक को गरिमापूर्ण व सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है परन्तु उन अधिकारों को सिर्फ कानूनी तौर पर लागू नहीं किया जा सकता। हमें हमारी पीढ़ियों के लिए संवेदनशील होना होगा। तभी हम मानवीयता के साथ अपने संस्कारों व संस्कृति के साथ न्याय कर सकेंगे तथा स्वयं के हृदय को विस्तृत कर अपनों को सुखी करने में ही जिस दिन हम सुख महसूस करने लगेंगे उसी क्षण हम पूर्ण मनुष्यत्व को प्राप्त होंगे ।


[1] प्रतिनिधि कविताएँ, केदारनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 44

[2] प्रतिनिधि कविताएँ, केदारनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 45

[3] गिलिगडू, चित्रा मुद्गल, सामयिक पेपर बुक्स, 2017, पृष्ठ 10

[4] गिलिगडु, चित्रा मुद्गल, सामयिक पेपर बुक्स, 2017, पृष्ठ 39

[5] वही, पृष्ठ 38

[6] वही, पृष्ठ 59

[7] वही, पृष्ठ 60

[8] वही, पृष्ठ 96

[9] वही, पृष्ठ 97

[10] वही, पृष्ठ 138

[11] वही, पृष्ठ 136

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