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जनजातीय लोक संस्कृति का अध्ययन एवं संरक्षण

संस्कृति मानव जीवन के कार्यों की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। इसके अन्तर्गत मानव जीवन की प्रत्येक छोटी-बड़ी बातों का समावेश होता है। संस्कृति मानव जीवन की एक ऐसी गतिशील प्रक्रिया है, जिसका निर्माण किसी एक व्यक्ति या संस्था द्वारा एक निश्चित समय में नहीं हुआ। अपितु अनेक शताब्दियों तक लोगों के खान-पान, चिंतन, धर्म, संगीत, नृत्य, उत्सव विचार आदि गतिविधियों से संस्कृति का निर्माण हुआ है। अतः संस्कृति एक ऐसी प्रक्रिया है जो हमारे संपूर्ण जीवन में व्याप्त है।

श्यामाचरण दुबे लिखते है -‘‘ संस्कृति सामाजिक आवश्यकताओं द्वारा जनित मानव आविष्कार है। मनुष्य संस्कृति में जन्म लेता है, संस्कृति सहित जन्म नहीं लेता। शारीरिक विशेषताओं की भांति संस्कृति का प्रजनन के माध्यम से व्यक्ति को नहीं मिलती, सामाजिक जीवन में अनिवार्य सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया से व्यक्ति को नहीं मिलती, सामाजिक जीवन में अनिवार्य सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया से व्यक्ति उसे ग्रहण करता है। समाज की परम्परा संस्कृति को जीवित रखती है। संस्कृति के अंतर्गत मानव के आविष्कार, निर्माण, कला, संस्थाएं, सामाजिक संगठन, कला, साहित्य, धर्म, विचार आदि विषय आते है।‘‘1

संस्कृति जीवन दर्शन का मुख्य आधार है। संस्कृति ही विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों और आचारों का समन्वय करती है। वास्तविक रूप में संस्कृति समाज के व्यक्तियों की अंतकरण की प्रवृत्ति है, जिसमें मनुष्य के धर्म, आस्था, विश्वास और मनोभावनाओं का समावेश होता है। ‘संस्कृति‘ के साथ ‘लोक‘ का अर्थ भी स्‍पष्‍ट होना आवश्यक है।

प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही लोक से जुड़ा रहता है। वह अपनी रीतियों, परम्पराओं और विश्वासों को लोक से ही ग्रहण करता है। मनुष्य की पुरी संस्कृति, समाज के सांस्कृतिक विकास का स्त्रोत वस्तुतः ‘लोक‘ ही है। लोक साधारण जन समाज है, जिसमें भू-भाग पर फैले हुए समस्त प्रकार के मानव सम्मिलित हैं। लोक गॉवों व नगरों में रहने वाली वह सम्पूर्ण जनता है जिनके ज्ञान का आधार पुस्तकें नहीं हैं। जिसने अपनी संस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी प्राणवान बनाए रखा है। किन्तु वर्तमान युग में लोक के अंतर्गत संसार के समस्त मानव सम्मिलित हैं। आज ‘लोक‘ के धरातल पर सम्पूर्ण मानव उनकी आशा-निराशा, प्रेम, घृणा सभी एक समान है। इसलिए सभी साहित्यों में लोक अपने सर्वांगीण रूप में विद्यमान है।

लोक एंव संस्कृति एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुडे़ हुए है। एक के बिना दूसरें का अस्तित्व संभव नहीं है। अर्थात् लोक जीवन को ही यदि लोक संस्कृति कहें तो गलत न होगा । विद्या चौहान के अनुसार :-‘‘ लोक का अर्थ सरल, स्वाभाविक मानव समाज है। जिसकी भावनाओं, विचारों, परम्पराओं, क्रियाओं एवं मान्यताओं में वास्तविक कल्याण के तत्व विद्यमान रहते है इसी को हम लोक संस्कृति भी कह सकते हैं। ‘‘ 2

किसी युग विशेष की संस्कृति वहाँ के लोक में विद्यमान रहती है। लोक जहॉंँ किसी भी देश की आन्तरिक सुन्दरता का प्रतिनिधित्व करता है वहीं संस्कृति उसके बाहरी सौन्दर्य का नाम है। परमपरागत रूप से सामान्य लोक जीवन में संचरित होने वाले जन्म से मृत्यु तक के विविध संस्कार, अनुष्ठान तथा अनुक्रम, पर्व -उत्सव, त्यौंहार, रीति-रिवाज, वेशभूषा, आमोद-प्रमोंद, खान-पान, संगीत आदि अनेक प्रकार के सामान्य लोक विश्वासों में संस्कृति अपना रूप संवारती है।

अब प्रश्न आता है कि आदिवासी कौन है। ‘आदि‘ शब्द का अर्थ है -आरम्भ का, पहला, शुरू का। ‘वासी‘ शब्द का अर्थ है रहनेवाला। अतः किसी स्थान पर रहने वाले वहाँ के मूल निवासी।

समाजशास्त्र विश्वकोष के अनुसार -‘‘ किसी देश -प्रदेश के वे लोग, जो आदिकाल से वहाँ निवास कर रहे है, उन्हें उस देश -प्रदेश का आदिवासी कहा जाता है। आदिवासी उस देश प्रदेश के मूल निवासी होते है ।‘‘3 भारत में आदिवासी को संवैधानिक शब्दावली में अनुसूचित जनजाति कहा गया है। अंग्रेजी में ‘ट्राइव‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है। आदिवासियों के लिए कुछ और भी शब्द प्रचलित है जैसे भूमिजन, गिरिजन, वनवासी आदि।

आदिवासी की कोई स्पष्ट सर्वमान्य व्याख्या देना कठिन है। सामान्य जनता की दृष्टि से आदिवासी का अर्थ है -वे भोलेभाले लोग जो जंगलों और पहाड़ों पर रहते है। मानवशास्त्री ऐसे लोगों को आदिवासी के रूप में पहचानते है, जिन्होंने अपना सदियों पुराना रहन-सहन, रीति -रिवाज तथा सामाजिक संगठन सुरक्षित उसी रूप में ही रखा है और जो सामाजशास्त्र के अभ्यास के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करता है।

मानवशास्त्र विश्वकोष के अनुसार :-‘‘ एक आदिवासी परिवार अथवा परिवार समूहों का ऐसा संकलन है जिसका एक सामान्य नाम (जैसे टोडा, उराँव, मुण्डा, भील, गोंण्ड) विशिष्ट भाग समाज व्यवस्था, संस्कृति और उत्पति सम्बन्धी एक मिथक (पुराकथा) होता है तथा जो एक निश्चित क्षेत्र में निवास करता है।‘‘4

आदिवासी संस्कृति की जब हम बात करते है तो आदिवासी संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है। इसके अन्तर्गत जाति समानता, लिंग समानता, सहभागिता, सहयोंगिता, सामूहिमता, भाईचारा एवं सबसे विशिष्ट प्रकृत से निकटस्थ सम्बन्ध एवं प्रकृति प्रेम है, जो अन्य सभी संस्कृतियों से आदिवासी संस्कृति को पृथक करती है। आदिवासी संस्कृति में मनुष्य का जीवन बिल्कुल सादा है। इनका दृष्टिकोण उपयोंगवादी है और विचारधारा ‘जियो और जीने दो‘ की है। उपयोगिता के साथ साथ इनकी कार्य योजना सामूहिक सहयोगिता एवं अनुशासन पर टिकी हुई है। आदिवासी चेतना के अन्तर्भाव मे प्रकृति के नियम के अन्तर्गत संग्रह की अपेक्षा त्याग, प्रतिशोध की अपेक्षा दया, क्षमा आदि का महत्वपूर्ण स्थान है।

आदिवासी समाज की लोक संस्कृति के अन्तर्गत हम आदिवासी जीवन के विभिन्न पहलूओं का अध्ययन करेंगे।

  1. आदिवासियों की जीवन शैली व परम्परा
  2. लोकगीत व लोकनृत्य
  3. उत्सव व पर्व
  4. लोककथाएं व मिथक
  5. लोक विश्वास व धार्मिक विश्वास
  6. आदिवासी समाज व प्रकृति का संबध

जनजातीय लोक संस्कृति के इन सभी बिन्दुओं का सूक्ष्म अध्ययन विश्लेषण करना ही इस विषय का ध्येय है। आदिवासी संस्कृति मुख्यतः वाचिक रही है, जो लोकगीतों, लोककथाओं के माध्यम से जानी जा सकती है। पिछले दो तीन दशकों से इसे लिखित रूप में भी व्यवस्थित किया जा रहा है। ‘ लोकगीत लोक संस्कृति की पहचान कराने में महत्वपूर्ण साधन होते है। लोकगीतों के माध्यम से समाज की भावनात्मक दृष्टि से पहचान की जा सकती है।

डॉ. रवीन्द्र भ्रमर लिखते है -‘‘ लोकगीत, लोकमानव के व्यक्तिगत और सामूहिक सुख-दुख की लयात्मक अभिव्यक्ति होते हैं। लोककथा की भाँति ये भी लोककण्ठ की मौखिक परम्परा की धरोंहर और लोकमानस की विविध चिंताधाराओंं के कोण माने गए है।‘‘ 5

लोकगीत परम्परागत रूप से जनसमाज से धनिष्ठता रखते है। इनकी प्रकृति मौखिक होती है। जिनमें मुख्यतः सामयिक सुख-दुख की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है। लोकगीत व लोक नृत्य लोकभावनाओं की अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम है। देश की संस्कृति, इतिहास और सामाजिक स्थितियों का प्रतिबिम्ब लोकगीतों, लोकनृत्यों एवं लोककथाओं में सहज ही देखा जा सकता है। लोक नृत्यों के विविध रूप आज भी हमारे जनजीवन मे स्पदंन उत्पन्न करके हमें उत्साहित और प्रभावित करते है। लोक नृत्यों के साथ गाए जाने वाले गीतों मे पुरूष और नारी के तेज करारे, कर्ण प्रिय सशक्त स्वर श्रोताओं और दर्शकों पर अपनी अलग ही अमिट छाप छोड़ते हैं। इन गीतों में यहाँ की आदिवासी संस्कृति आज तक सुरक्षित दिखाई देंती है।

प्रमीला केपी आदिवासी लोकनृत्य व लोकगीत के संदर्भ में लिखती है -‘‘ नृत्य और संगीत आदिवासी जीवन संस्कृति का सर्वोच्‍च सम्मान क्षेत्र है। ताल, लय संगीत, गीत-नृत-नृत्य का अपूर्व संगम इनमें है। प्रकृति सिद्ध वाद्योपकरण के साथ मनुष्य की आवाज ओर नृत-नृत्य का सामंजस्य अनोखा रहता है। खान -पान मिलन आदि में सामूहिकता एवं सहयोंग के लिए आदिवासी संगम का उत्तम उदाहरण है। मिट्टी आकाश और आग के उपयोग करते हुए उसमें नाचने वाले मनुष्य का झुण्ड सामूहिक नृत्त-नृत्य एवं प्रकृति का अपूर्व संगम स्थल सृजित करता है। संगीत के उपकरणों के उपयोंग में उनका विशेष कौशल है। बीज बोने, पोधे उगाने, फसल काटने और दूसरे मानवीय कार्यकलापों के विशेष अवसरों में सामूहिक नृत्य का अनुपेक्षीय स्थान है। ये सब संगठन, सामूहिकता तथा लोकदर्शन में आदिवासियों को सबसे अच्छे जीव वर्ग होने के प्रमाण देते हैं।‘‘ 6

उत्सव पर्व किसी भी समुदाय की जीवतंता के परिचायक है। उत्सव पारम्परिक रूप से कर्मकाण्ड रहित होते है। ये समुदाय की खुशहाली और लोगो की स्वतंत्रता के उल्लास की अभिव्यक्ति होते है। आदिवासी समाज के विभिन्न समुदायों के अलग-अलग पर्व -त्यौहार होते हैं जैसे सरहुल, करमा, सोंहराई, जतरा, फागु आदि। सरहुल त्यौंहार आदिवासी समुदायों का सबसे महत्वपूर्ण त्‍योहार है। जिसे लगभग सभी आदिवासी समुदायों (विशेषकर मध्य भारत) द्वारा मनाया जाता है। यह पर्व चैत माह (मार्च-अप्रैल) में मनाया जाता है। सामान्यतः आदिवासी समुदाय के सभी उत्सव पर्व कृषि कर्म, शिकार करने आदि से प्रारंभ या समाप्त करने से जुड़े होते हैं। सरहुल पर्व भी पहले वर्ष में होने वाली अच्छी फसल के लिए ईश्वर को धन्यवाद स्वरूप मनाया जाता है साथ ही नये वर्ष में अच्छी फसल के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है।‘‘7

आदिवासी समाज के अधिकांश उत्सव पर्व प्रकृति से जुड़े हुए है। प्रकृति की पूजा करना अपना कर्तव्‍य समझते हैं। अनेक पर्व त्‍योहारों पर पेड़े-पौधों की पूजा की जाती है। लोककथा लोक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोककथा के बारे में यदि कहा जाए कि लोककथा की व्यापकता लोकगीतों से अधिक है तो अनुचित नहीं होगा। भारतवर्ष में लोककथाओं का स्त्रोत प्राचीन है। लोक -साहित्य किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं होती है बल्कि उस भाषा के जनसमुदाय द्वारा निर्मित होती है। जनसमुदाय के जीवन की सच्चाई ही इसके सृजन की सबसे बड़ी ताकत है। लोककथाओं का संबंध जन जीवन से है। जनजीवन के परिवर्तन के साथ – साथ लोक कथाओं की भी विषय वस्तु बदलती रहती है। लोककथाएं मुख्य रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक भूमिका का निर्वाह करती है। इनके माध्यम से मुनष्य जीवन के आचार विचार, रहन-सहन ,सुख-दुख, सभ्यता -असभ्यता, अलंकरण, मंत्र-तंत्र, जादू-टोना, आहार, व्यवसाय, भाषा, बोली, भूगोल, इतिहास, राजनीति एवं शासन व्यवस्था आदि बातें हमें सहज रूप से प्राप्त होती है। आदिवासी समाज में प्रचलित ऐसी

अनगिनत लोक -कथाओं का वर्णन हुआ है। जो विषय की दृष्टि से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विस्तार लिए हुए है।

आदिवासी समाज अधिकतर अशिक्षित है। इस कारण रूढ़ियों और परम्पराओं का अधिक प्रचलन रहा हैं । उनके लोकविश्वास भी अन्य समाज से भिन्न है। आदिवासी समाज में भी संस्कारों को महत्व दिया गया है। विभिन्न आदिवासी समुदायों में इन्हें अलग-अलग पद्वतियों के आधार पर अपनाया गया है।

‘आदिवासी समाज की धर्म संबंधी अपनी एक अलग पहचान रही है। अधिकांश मानवशास्त्री जनजातीय समाज के धार्मिक स्वरूप को जीववाद कहते है। इस विचारधारा के अनुसार आदिवासी लोग अनेक पूर्वजों की जीवात्मा अथवा प्राणशक्ति की आतंक एवं श्रद्धा के कारण पूजन, वंदना एवं प्रार्थना करते हैं।‘‘8 आदिवासी समाज में प्राकृतिक वस्तुओं की भी पूजा होती है। जिसमें सूर्य, पूर्वजों की आत्मा, ग्राम देवता आदि शामिल हैं।

आदिवासी समाज हमेशा से प्रकृतिमूलक समाज रहा है। उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा धार्मिक सभी गतिविधियां प्रकृति के सान्निध्य में ही संचालित होती रही है। जल, जंगल, जमीन के चारों तरफ ही आदिवासी समाज की बनावट, विकास और अवसान की घटनाएं घटती है। सामुदायिकता और सामूहिकता आदिवासी संस्कृति की पहचान है। पर्व, त्‍योहार, नाच-गाना, गीत संगीत सभी का आनंद सामूहिकता मे लेते हैं। नृत्य गीत के आयोजन में सभी भागीदार होते हैं। आदिवासी मौके पर साथ में सुर-लय-ताल में नाचेंगे, गाएंगे। इनके आनंद, दुख सभी में प्रकृति शामिल रहती है। प्रकृति के अनुसार ही संचालित होती है आदिवासी संस्कृति।

अतः आदिवासी समाज में उत्सव, पर्व, लोकगीतों की परम्परा रही है। उनमें दारू, हण्डिया पीना आदिवासी संस्कृति का अनिवार्य तत्व है। जो एक ओर उन्हे पतन की ओर ले जाता है तो दूसरी तरफ उनके संघर्षमय जीवन के तनाव को कुछ पल के लिए कम करता हैं। आदिवासी समाज में अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं जो विषय की दृष्‍टि से सांस्कृतिक, सामाजिक, और ऐतिहासिक विस्तार लिए हुए हैं। कुछ लोककथाएं नैतिक शिक्षा देती हैं, तो कुछ अंधविश्वासों को बढ़ावा देती हैं। आदिवासी समाज में अनेक लोंक विश्वास, संस्कार अनेक देवी -देवताओं की पूजा एवं अनेक अधंविश्वासों का प्रचलन है। आदिवासी समाज के बारे में अनेक मिथ स्थापित किए जाते हैं। परन्तु वर्तमान में आदिवासी लोक संस्कृति लुप्त होने की कगार पर आ रही है। इसके अध्ययन की आवश्यकता है। जिससे इनके इतिहास को लिखित रूप दिया जा सके। इसके लिए आदिवासियों, गैर- आदिवासियों एवं सरकार सभी को सहयोग करने का प्रयास करना चाहिए। तभी आदिवासी लोक संस्कृति को भविष्य में सुरक्षित रखा जा सकता है।

संदर्भ सूची

  1. श्यामाचरण दुबे -मानव और संस्कृति – पृ. 17-18
  2. विद्या चौहान -लोकगीतों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि – पृ. 41
  3. समाजशास्त्र विश्वकोष -हरिकृष्ण रावत – पृ. 9
  4. मानवशास्त्र विश्वकोष -हरिकृष्ण रावत – पृ. 521
  5. रवीन्द्र भ्रमर -हिन्दी भक्ति साहित्य में लोकनृत्य – पृ. 6
  6. प्रमीला केपी -केरल के आदिवासी (लेख) सस्लोग पत्रिका – पृ. 34
  7. विजय शंकर उपाध्याय -भारतीय संस्कृति – पृ.217
  8. डॉ. शहाज्हान मणेर, सामाजिक यथार्थ और कथाकार संजीव – पृ. 112

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