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जो मन पर थी गुजरी

जो मन पर थी गुजरी
जो मन से ना उतरी
कुछ किस्से पुराने
सब जीने के बहाने
रस्तों की आवारगी
बेबाक़ सी वो दिल्लगी
सब कुछ कह देता हूं!

वो सुनती है सब, चुप
उनींदी सी आंखों से
कुछ आस लिए मन में
और थामती सांसों को
कि दूरियों को पार कर
ज़िक्र उसका आएगा
अनकहे किस्सों में
रातों के हिस्से ही
शायद अनजाने में
नाम कभी आएगा।

मैं जानता हूं!
मैं जानता हूं लेकिन
जो कहना है वही छोड़
सबकुछ कह देता हूं!

जगभर की शिकायतें
पल-पल की हिदायतें
दिनभर की थकावटें
अनुभव की बातें सब
पूछता बताता हूं
कुछ सुनकर कुछ कहकर
कुछ लिखकर जताता हूं!

वह सुनती है सबकुछ
फिर सब्र से सवालों के
हल निकाल लाती है
शब्द-शब्द तोलकर
उम्मीद नयी गढ़ती है
वह सुनती है फिर से
एक आस लिए मन में

मैं जानता हूं लेकिन
जो कहना है वही छोड़
सबकुछ कह देता हूं!

7 Comments

  1. अच्छी कविता छन्दवद्ध। ऐसे ही लिखते रहिये। यही तो शब्दों के माध्यम से सृजन है

  2. आपकी रचनाओं को पढ़ना हमेशा ही सुखद अनुभव होता है।

  3. मैं जानता हूं!
    मैं जानता हूं लेकिन
    जो कहना है वही छोड़
    सबकुछ कह देता हूं!
    Waah ……

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