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कविताएं

१. उपला
छत्तीस साल शादी के,
इश्क़ तो नहीं था।
जरूरत
जो थोपी गयी,
जैसे उपला दीवार पर।

२. जरा-सी खुंट बाँध लूँ
जरा-सी खुंट बाँध लूँ फिर चलती हूँ,
दिन भर की थकान और वो – पूरी धूपI
चौथाई भर रागी की रोटी , मत कह इसको,
चौथाई चाँद है –
जठर ताप को ठंडा करतीI
पाँच कूरी मूंग कमाया, एक ही कूरी पायाI
जो पाप का करना लेखा जोखा –
पाँच को गिनना एक गोसाईंI
सौ रूपये की दाल गोसाईंI
दो सौ रूपये मिले मिठाईI
पीला पड़ा पति पियक्कड़,
पाँच सौ में हुई दवाईI

खुंट में बाँध रही क्या? पूछे मुझसे बूढ़ी तरुणाईI
एसनो पाउडर लगी मेम नहीं, न मैं घर बैठी ठकुराइनI
मैं हूँ हड्डी वाली पटरी, उस पर नित्य निज
सूखी माँस की रेल चलातीI
रेल भी मैं पटरी भी मैंI
वेग भी मैं विराम भी मैंI
तथ्य और प्रमाण भी मैंI
विपन्न, व्यवधान, विवश व्यथा का अविचल विधान हूँ मैं I

३. आपका जाना
एक सड़क नीचे जाती है
सघन हरी छतरी ओढ़े
पर कल आपके जाने के बाद
बहुत भींगी थी सड़क
वो सात दिनों वाली बारिश
सबकुछ गीला कर गया।
जो तर नहीं हुई थी अबतक
वह भी भींग गयी
यह नया था हुआ
आपके आकर चले जाने से

४. जाते वक़्त
सफर में जाते वक्त
भींगी पगडंडियों पर शब्द छींटती जाती हूं
लौटते वक्त लहलहाती कविता होती है
पाठक के आंखों में एक हरियाली होती है
एक बिजूका भी होती है कविता के बीच में जो
भगाती रहती है
कविता के बीज चुगने आयी उड़ती परिस्थितियों को ,
लहलहाने दो कवि और उसकी कविता को।

५. पचाना अब नहीं आसान
मैं बोलती हूं तो गीदड़, लोमड़ी और गिद्धों को
परेशानी होती है
उल्लू और चमगादड़ों की नींद हराम होती है
मेरे तन के गोश्त पर जिनकी दावतें चलती है
उन्हें कराहने चिल्लाने से खलल पड़ती है
ये ढ़को, ये खोलो, इसे काटो, ये चीरों
ऐसे परोसे जाओ, ऐसे खत्म हो जाओ

नहीं चलेगा तेरी हिदायतों का पंचनामा
पेट में जाकर भी मेरी बोटी चीखेगी, चिल्लाऐगी
कोई पाचक, वोडका, रसम या इंजीकरी* इसे पचा नहीं पाएगी

जिंदा या मरकर भी, ये हलक से बाहर आएंगी
उंगलियां बन तुम्हारे दोनों पंजों को जकड़ लेंगी।

६. पथ का पाथेय
पिता प्रदेय प्रपाठ लिए पुकारते हैं
प्ररूढ़ पद प्रवाचक, रूका पथ पर –
सुना सजग सचकित सगरा सुवचन
पथ का पाथेय ले लो फिर चले जाना
पल का पाखंड खड़ा है
पल की पौरूषता खत्म हुई
ऐसे में खाली हाथ न जाने दूंगा
पथ का पाथेय ले लो, फिर चले जाना
कादम्बिनी का कोलाहल
कौतुक कादर दृगों से देख रहे
नहीं सहज है आकाश पथ भी
फिर भू पथ यूं क्यों छोड़ चले?
भख के भंवरे भग्नमना का भग्न भट सुन
क्यों भटक रहा भट के भेंट को?
भूमि में हरा भट उगता है यहीं कहीं,
नभ पर तो बस तारों का भग्नावशेष ही रहता है।
चुप क्यों है पुत्र, बोल तू क्या कहता है?
भू के भंवर से भयाक्रांत पुत्र अछोर अनंत
आकाश में न उड़ा कर,
भू के भगोड़े के लिए अज़मत नहीं आकाश में उड़ना।
अजेय पुत्र! तुझे भू पथ पर ही है चलना
ऐसे में,
भजना भग्वंत- भगवत को भटधर्मा क्यों छोड़ दिया,
भव भग्गी में भगवती को ऐसे क्यों तू भूल गया,
पीड़ा, पापी, पाबंद से पदाक्रांत पुत्र इतनी जल्दी हार गया।
तू पापघ्न है पुत्र पिते का,तेरी पादाहति में पराक्रम है,
लगा ठोकर तू ध्वस्त करेगा पानागार में डूबे
पावक के पापमय पापिष्ठ प्राण को।
हृदय पोटली खोल पुत्र अब,
भर ले ये सारे सारतत्व सब,
मंगलेच्छु माँ का मंजुल, मंद्रमंत, माया, ममत्व,
परिव्यक्त पिता का परिशुद्ध परामर्श, प्रेमत्व,
भगिनी का व्यवहार, भाई का मनोहार,
परिवैष्ठिक प्रभु प्रणव का आशीष अपार,
परिमुग्ध धूर्त्त दुष्ट मित्रों का परिभ्रष्ट व्यवहार,
परमप्रिय मित्रों का प्रेमागार,
प्रहृष्ट पिता के प्रयत पथ पर सजग,
जा तूझे पथ सह व्यवधान मिले,
सहज नहीं जो लक्ष्य
ऐसी पद, प्रतिष्ठा और सम्मान मिले।
ताकि लौटते वक़्त पुन: पथ का पाथेय साथ रहे,
नये अनुभव के भख से हृदय खलिहान भरा रहे,
मन, लग्न और चाह यूं ही हरा रहे।

७. माँ
पापा नहीं रहे
माँ का अकेली हो जाना तय है
वह पहली प्राथमिकता नहीं रहेगी।
फुर्सत या सबसे नज़दीक के किसी संतान
का दायित्व बन कर रह जाएगी।
अगर समायोजित होती आयी है,
तो फिर नये समायोजन के लिए
उसे विवश किया जाएगा,
जो अंत तक बच्चे के साथ बने रहने के लिए अनिवार्य है।

अगर प्रशासिका रही है,
तो अब कोई नहीं सुनेगा,
पिता सुनते थें तो सब सुनते थे।
पिता रहे नहीं,
और माँ का प्रशासन भी अब नहीं रहने दिया जाएगा।
माँ अंतिम समायोजन और टूटा प्रशासन होती है
जब पिता नहीं होते हैं!

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