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कुकुरमुत्ता : भारतीय समाज व्यवस्था का क्रांतिदर्शी प्रतिरूप

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला एक ऐसे कवि हैं जिन्हें किसी एक विशेष वाद से जोड़ना बहुत कठिन है। वे यदि एक ओर छायावादी काव्य रचना करते हैं तो वहीं दूसरी और उन्हें प्रगतिवाद का भी उन्नायक माना जाता है। इसलिए उनका व्यक्तित्व किसी विशेष वाद में नहीं अंटता। उन्होंने प्रयोगवाद, नवगीत और गजल आदि का भी प्रारंभिक स्वरूप गढ़ा है। निराला ने ही सबसे पहले कविता को सभी बंधनों से मुक्त करके उसे एक विस्तृत आयाम प्रदान किया। उनका युग सामाजिक विकृतियों का  युग था। समाज में आर्थिक सामाजिक विषमताओं का कलेश चरम सीमा पर था और निराला ऐसी सभी स्थितियों से जूझते रहते थे। सामंतवाद, जातिवाद, छुआछूत आदि के कोढ़ ने उस समय  के समाज को ग्रस रखा था। राजनीतिज्ञों की मुखौटेबाजी, साहित्य क्षेत्र की गुटबंदी, संपादकों के अन्याय एवं पैंतरेबाजी से निराला क्षुब्ध हो उठे थे। उनका कवि मन विद्रोही हो उठा। उनका यह विद्रोही भाव किसी एक के प्रति नहीं है। उन्होंने साहित्य, समाज, राष्ट्र, परंपरा की विसंगतियों, अर्थ विषमता, अविश्वास, नारी दुर्दशा, शोषितों की दुर्दशा, किसानों की दुर्दशा, मिल मालिकों एवं पूजीपतियों की क्रूरता तथा आज के कटु यथार्थ भी उनकी कविताओं में चित्रित हैं। ऐसे ही यथार्थ पर परंपरा के विद्रोह का मूर्तिमंत रूप उनकी कविता “कुकुरमुत्ता” है जो भारतीय समाज व्यवस्था के क्रांतिदर्शी स्वरूप को सामने लाता है।

निराला का काव्य उनके विकासशील व्यक्तित्व का परिणाम ही नहीं उन का प्रतिबिंब भी है; जिसमें व्यापकता और सामाजिकता का विकास बहुत प्रबल  रहा है। उनकी इस कविता में समाज की विषम अवस्था का चित्रण किया गया है। निराला ने यहां विभिन्न प्रकार के मतभेदों, छोटे-बड़े की भावनाओं, अंधविश्वासों, छल कपट, स्वार्थ, आर्थिक कष्ट, दरिद्रता, भुखमरी जैसी आज की स्थितियों को भी दिखाने का प्रयास किया है। वे कहते हैं कि मेरे मन में वह नक्शा है जिससे सामाजिक विषमता दूर हो सकती है और देश उन्नति के मार्ग पर चल सकता है। यदि मिलों में लगी हुई पूँजीपतियों की पूंजी देश को मिल जाए और पूँजी का राष्ट्रीयकरण हो जाए तो देश का नक्शा ही बदल सकता है।

“कुकुरमुत्ता” कविता में निराला का क्रांतिकारी और विद्रोही रूप मुखर हुआ है। इस कविता में निराला पूँजीपतियों का तीव्र विरोध करते हुए दीन हीन और शोषित व्यक्ति का पक्ष लेते हैं। यहां कुकुरमुत्ता शोषित अर्थात दीन हीन का तथा गुलाब शोषक और पूंजीपति वर्ग का प्रतीक है। प्रतीकात्मकता और व्यंग्यात्मकता कुकुरमुत्ता की प्रमुख विशेषता है। निराला ने कुकुरमुत्ता के मुख से तीक्ष्ण व्यंग्य कराया है–

अबे, सुन, बे गुलाब,

भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,

खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,

डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट!

कितनों को तू ने बनाया है गुलाम,

माली कर रक्खा, सहाया जाड़ा घाम,

हाथ जिसके तू लगा, पैर सर रख कर व पीछे को भगा                      

(कुकुरमुत्ता, पृष्ठ -49)

प्रो. महेंद्र रायजादा इस कविता में कुकुरमुत्ता की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं – “कुकुरमुत्ता असंस्कृत सामान्य दीन-हीन, शोषित जन का प्रतीक है, जो अपने चारों ओर के स्वाभाविक वातावरण से बल प्राप्त कर पोषण एवं विकास प्राप्त करता है।” अपने बारे में स्वयं कुकुरमुत्ता गुलाब से कहता है–

देख मुझको, मैं बढ़ा,

डेढ़ बालिश्त और ऊंचे पर चढ़ा

और अपने से उगा मैं

बिना दाने का चूगा मैं

कलम मेरा नहीं लगता

मेरा जीवन आप जगता।                     

(कुकुरमुत्ता, पृष्ठ- 50- 51)


अर्थात कुकुरमुत्ता का जीवन सामान्य है और गुलाब का कृत्रिम क्योंकि उसे काट छांट कर माली लगाता है जबकि कुकुरमुत्ता स्वयं उग आता है। कुकुरमुत्ता बार-बार गुलाब से अपनी तुलना करता हुआ स्वयं को श्रेष्ठ और गुलाब को निकृष्ट बताता है क्योंकि कुकुरमुत्ता बरसात में जगह-जगह अपने आप उग जाता है जबकि गुलाब को विशेष खाद,स्थान और माली की आवश्यकता होती है। कुकुरमुत्ता गुलाब से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए तमाम पौराणिक आख्यानों सहारा लेता है। जैसे भारत का छत्र, विश्व का सुदर्शन चक्र, जसोदा की मथानी आदि वहीं आधुनिक समय मैं छाता के रूप में जिसे चीन ने नकल करके बनाया वह कहता है —

सुबह का सूरज हूं मैं ही चांद में ही शाम का। कलयुगी मैं ढाल

नाव का में ताला नीचे और ऊपर पाल।                             

(कुकुरमुत्ता, पृष्ठ- 52 )

कुकुरमुत्ता गुलाब से अपनी तुलना करके स्वयं को उससे श्रेष्ठ सिद्ध करता है। पूँजीपति और शोषित वर्ग के प्रतीकों के रूप में यह कविता आपने व्यंग्यात्मकता और लाक्षणिकता के लिए पर्याप्त प्रसिद्ध है। डॉ कुंवर बेचैन प्रस्तुत कविता के विषय में लिखते हैं — “कुकुरमुत्ता कविता में गुलाब के चले आते हुए सुंदर और सुकोमल प्रतीक को एक पूँजीपति का रूप दे दिया। किसी परंपरागत प्रतीक में नया अर्थ भरना वरन् उसमें विपरीत अर्थ का संयोग बिठाना सचमुच बड़ा कठिन कार्य था, जो निराला ने कर दिखाया।” कुकुरमुत्ता स्वाभाविक व्यंग्य विनोद की शैली में सभी को अपने योगदान से अवगत कराता है। वह कहता है —

दुनिया में सब ने मुझे से रस चुराया,

रस में मैं डूबा उतराया।

मुझी में गोते लगाए बाल्मीकि-व्यास ने

मुझी से पोथे निकाले भास-कालिदास ने।

टुकुर-टुकुर देखा किए मेरे ही किनारे खड़े।

हाफिज-रवीद्र जैसे विश्वकवि बड़े-बड़े।                             

(कुकुरमुत्ता, पृष्ठ 56)

‘कुकुरमुत्ता’ कविता में निराला ने अपने समय की अनेक मान्यताओं को प्रश्नांकित किया है। उनका क्षोभ तो यहां इतना बढ़ गया है कि वह गाली-गलौज की सीमा तक पहुंच गया है। कुकुरमुत्ता श्रमिक अर्थात सर्वहारा वर्ग का प्रतीक है। फ़ारस से आया गुलाब अनुकूल मौसम पाकर फूलों से लदा उठता है जिसमें उसका प्रभाव पूरे बाग पर फैल गया। उसकी प्रभा से अन्य सभी पुष्पों की शोभा मंद पड़ गयी। लेकिन वहीं पास की पहाड़ी की गंदगी में उगा हुआ कुकुरमुत्ता गुलाब को फटकार लगाते हुए कहता है कि- अरे गुलाब! तू मेरी बात सुन? तूने मोहक रंग-सुगंध और शोभा तो प्राप्त कर लिया है किंतु फिर भी अपनी वास्तविकता को ना भूल। अरे असभ्य! गुलाब तू याद रख के तूने पूंजीपति की ही तरह खाद का खून चूस कर ही यह चमक प्राप्त की है और आब अपनी इस चमक और सुंदरता पर इतरा रहा है। तूने अपनी देखभाल और सुविधा के लिए ना जाने कितने व्यक्तियों को लगा रखा है जो बिना अपना ख्याल रखें तुम्हें सुविधा देने के लिए विवश हैं। तेरी देखभाल के लिए माली लगे हुए हैं;जो बेचारे गर्मी सर्दी सब कुछ सह कर तुम्हें आकर्षित बनाते हैं, लेकिन तू तो उन्हीं पूँजीपतियों के समान है जो अपने कर्मचारियों का खून चूस कर अमीर बनते हैं। पूँजीपति खून चूसता है और तू अपने कांटो से व्यक्तियों को दुःख पहुंचाता है। कुकुरमुत्ता गुलाब से कहता है कि मुझे तुम्हारी तरह पाल पोसकर नहीं उगाया जाता है बल्कि मैं जमीन के सीने से चीर कर स्वयं आता हूं। मेरा जीवन और अस्तित्व मैं अपने तय करता हूँ। मैं तुम्हारी तरह बनावटीपन नहीं दिखाता। तू तो धोखेबाज है लेकिन मैं असली और अपनी बात पर कायम रहने वाला व्यक्ति हूं। मैं पानी की तरह स्थाई एवं सबके काम आने वाला हूं, लेकिन तुम तो केवल देखने भर की वस्तु हो। किसी के काम नहीं आ सकते। तूने मेहनतकशों की रोटी छीन ली है लेकिन मैंने अपने परिश्रम के बूते लोगों को पेट भर भोजन दिया है। अर्थात यहाँ कुकुरमुत्ता पूंजीपति वर्ग की ओर संकेत करते हुए कहता है कि पूँजीपति के हाथ मजदूरों के खून से रंगे हुए हैं जबकि मजदूर वर्ग अपने पसीने की कमाई से अपना जीवन यापन करता है जिससे वहां समर्थ निष्कलंक है।

विविध प्रकार की वेदनाओं की अनुभूति निराला की इस कविता में दिखाई पड़ती है। समग्रता और व्यापकता में यह कविता अभिजात्य से मुक्ति का है प्रयास है। निराला सामाजिक विषमताओं को समाप्त करने का एकमात्र हल साम्यवाद को मानते हैं। निराला यहां शोषकों के ठाठ बाट को इस तरह दिखाते हैं –रोज ढोया आ रहा है माल-असबाब बन रहे हैं गाने-जेवर पकता है कलिया-कबाब।   (कुकुरमुत्ता, पृष्ठ- 63)

इस तरह इस कविता में स्वाभाविक संघर्षशीलता की अनुगूँज सुनायी पड़ती है। साम्राज्यवादी, संग्रहवादी प्रवित्तियों पर चोट करती यह कविता अभिजात्य को नकारती है। व्यक्तिगत हित साधनों की पूर्ति के लिए पूँजीपतियों की धृष्टता, उनका अनैतिक आचरण समाज को पथभ्रष्ट करता है। प्रत्यक्ष और प्रतीति दोनों स्तरों पर निराला की यह कविता अपना व्यापक प्रभाव छोड़ती है।

शिल्प के स्तर पर भी निराला की कविता बेजोड़ है। निराला भावानुरूप भाषा के सिद्धांत-मर्म को जानने वाले कवि हैं। वे हास्य-व्यंग्य विनोद शैली में अपनी बात कहते हैं। उनके मन में नूतन निर्माण की आकांक्षा है। उन्होंने काव्यगत परंपराओं, रूढ़ियों पर कठोर प्रहार किए हैं। स्वच्छंदता,भावों की तीव्रता, संक्षिप्तता, कलात्मकमकताआदि उनकी कविताओं की विशेषता है। “कुकुरमुत्ता” कविता की भाषा बहुत ही सरल और  सहज है। निष्कर्षतः निराला की यह कविता पीड़ितों की पक्षधरता को स्पष्ट करती है। श्रमिकों की दीन दशा हमारे सामाजिक व्यवस्था की देन है। वह सर्वहारा वर्ग जीवन की मूलभूत सारी सुविधाओं से दूर और अपने अधिकारों से  अनजान है। समाज का अभिजात्य वर्ग इन्हीं श्रमिकों के श्रम से मलाई चाटता है। कुकुरमुत्ता को पता है कि गुलाब की सारी सुंदरता और उसका वैभव शोषण का परिणाम है; इसलिए वह गुलाब से घृणा और व्यंग्य मिश्रित तिरस्कार से बात करता है।

कुल मिलाकर निराला की यह कविता पूंजीवादी और सामंती व्यवस्था को ही चुनौती नहीं देती बल्कि उनसे जुड़े चाटुकारों और मठाधीशों की पोल-पट्टी भी खोलती है। यहां कुकुरमुत्ता अपने ललकार से अभिजात्य वर्ग को खुली चुनौती देता है।

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