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कविताएँ

नेह – कण

बेहद सर्द हैं आज हवाएँ

चाँद सितारे ठिठुर रहे

सहमे सहमे परिंदे चरिंदे

जम रहीं सागर में तरंगे

ओस के बिंदु

ग्लेशियर बनाने पे तुले हैं

बची है बस एक ही आस

उष्म निगाहों से उतरे

भाप की बदली

छा जाए अणु अणु

भर जाए तन मन 

गल जाए पिघल जाए 

कुलिश कलुष ज़िद्दीपन

मांग रही तुझसे नेह कण

मोम सा घुल जाए

बह जाए मेरा अहम्

मिट जाए

मेरा भरम !


धृति

अकुलाता है पौधा यूँ ही

गर्भ में हर बीज के

थपथपा के जब भी बोया है उसे

मिटटी के नीचे

एक संशय, एक भय 

और इक विकलता

भोगता है हू ब हू

तेरे ह्रदय सी

कसमसाहट और विचलता

का क्षणिक कालांश है

त्याग दे धूसर वसन

सन्ताप औ नैराश्य का

फूटेगी कोपल नई

नवध्येय के उल्लास की

वेदना तज तब तलक 

बन अंकशायी आस की

प्रेम को मुक्त करो 

कैसे उठाऊँ वो फंदे 

जो गिर गए है

कई सलाइयों नीचे

उधड़ता जा रहा है वक़्त का नीला स्वेटर

कैसे भरूँ

उन झिर्रियों को

जिनसे बह गयी

समूची तरावट

कैसे तेरा मन सिक्त करूँ

मिल सके जो मुझे भी

चिन्दी चिन्दी नमी

 

मैं तलाशती थी पहले भी

प्रेम की उद्दाम धारा

तेरे अव्यक्त मन के बियाबान में 

अब तो लगता है

तुम बन्द कर आये हो उसे

पाताल की किसी गुफा के

सात तालों में

दे दो मुझे

वो चाबी

बहाने दो रसधार

मुझे भय है

कहीं लुप्त न हो जाए

सरस्वती की तरह

मेरे प्रेम की गंगा जमुनी धार

हथेली के घाव

चाहत के रेशमी धागे

कब जड़ पकड़ लेते हैं

गहरे बहुत गहरे

मन की मिट्टी में

पता ही नहीं चलता

हल्की सी तपन से 

चुभन से

मुरझा जाते 

नाज़ुक बेल की तरह

बार बार के खिंचाव से

दिखते खस्ताहाल

हुआ था भरम 

कि बेहतर है

गिरह खोल देना

रिश्ते की

बरसों से बैठे हम

जिसे मुट्ठी में दबाए

पर इल्म हुआ

न टूटती है न खुलती है

वो रेशमी डोर

फ़ैल चुकी जो शिराओं में

योगी की जटा सी

मज़बूत रूखी खुरदरी

चुभती है गड़ती है

मुट्ठी खोलकर देखा आज

टीस उठे हैं घाव

निगाहों की झील से 

कुछ नमकीन बूंदें 

गिरी हैं अभी अभी

हथेलियों पर


हिमाचल

गड़ती थी रस्सी 

बादाम के पेड़ पर के झूले की

बचपन की जाँघों में

फिर भी लिए झोंटे

आकाश की उँगलियाँ छूने को

अखरोट की टहनी की 

दतुअन बनाकर

थोड़ा और चमकाया

उजली मुस्कान को

सपनों की पतली सी डंडी थामे

किन्नौरी बेलवाला पट्टू* पहनकर

थिरके थे पूलों* में बंद पाँव

कई एक बार

उबड़ खाबड़ पगडंडियों पर

कैसे उड़ाई थी चूल्हे की राख

फूँकनी में हवा भरकर

बुझते अंगारों में सिंकेे आलू

जिन पर बिछी थी घी की धार

और चुटकी भर नमक मन्घोलू* का

बेढब पत्थरों वाला 

घर का ओसारा

और वो काली स्लेटों वाली 

सहमी खुरदरी छतें

जहां भर की सबसे नायाब पेंटिंग

उसी आँगन में बिछी

मांजरी* पर

पसरी रहती

जवां होती कल्पना

सीखती स्वेटर बुनना

पश्मीने ख्वाबों से

उतारती पैटर्न

दूर तक फैले 

केलोकायली* के जंगल से

हर साँझ छोड़ देती

एक चमकती तृष्णा 

आसमान में

और जोड़ देती उसकी आब

चाँद के पास के शुक्रतारे में

हिमाचल के आगोश में 

हरी दूब सी यादें

और रेशम से लम्हे

गोया लहरों पे तिरती

सुनहरी मछलियाँ

बार बार फिसल जातीं

पकड़ने की कोशिश में

छोड़ जातीं कुछ लकीरें

महीन और गहरी

मेरी हथेलियों पर

*पट्टू — पहाड़ी परिधान,पुलें — जूट से बनी पहाड़ी जूतियाँ, मन्घोलू– तिलहन का प्रकार, मांजरी — हल्दी के पत्तो की चटाई, केलोकायली — देवदार के पेड़

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