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निर्बन्धित सत्य

1)

निर्बन्धित सत्य

सत्य,
जल रूप में वहीं बह रहा था
जहाँ उसे चख छोड़ा था..
सम्भवतः अंधकार में पुतलियाँ विस्तार पा गयी थीं
जो गीले तलुओं से..जल को खोजने में व्यस्त रहीं।

अनुभवी मल्लाह को भी कहाँ ज्ञात था
कि पदार्थ बहा ले जाने के विचार से;
किसी बिंदु पर जल-धारा भी तीव्र न हुई थी
वह तो बस स्वयं के भीतर कहीं सध रही थी!

आह!
क्या क्षण रहा था वह..
जब जल-धारा को ज्ञात हुआ कि
विभिन्न बिंदुओं पर
उसकी देह ही यात्रा करती रही…वह नहीं!
वह तो हमेशा वहीं उपस्थित रही थी
जहाँ उसे होना था!

विभावरी तले
चाँद व सूरज ने.. जब अपनी दिशा बदली थी
एक स्वप्न..जब पलकों से अनायास छूट गया था
तब भी सत्य…जल-धारा सा निर्बन्धित था!
वहीं था…वहीं तो था!!
जहाँ उसे चख छोड़ा था…

सत्य को पाकर देह अनायास जड़वत यूँ हुई
जैसे तितली के दो कोमल पंख रह जाते हैं
अनायास अधखुले….
अंतिम श्वास छोड़ते हुए!

2)

अपूर्ण-प्रतिक्षाएँ

बीता वर्ष अवसान हेतु उद्दत है
वर्ष नही जानते हैं….पूरी तरह वापस लौटने की कला!

लेक़िन मुझे तो लौट जाना था..
हृदय के उस अति संकरे मार्ग पर
जहाँ प्रार्थनाओं के अंतिम मन्दम स्वर में डूबा जा सकता था।

मुझे उस विश्रान्ति की सूक्ष्मता भी थामनी थी..
जो संगीत सभागार की अनुगूँज के बाद
दर्शक व श्रोता के बीच भेद बता रहा था।

मुझे नदी की प्यास के निशान खोजने थे..
जिसके बारे में मुझे यक़ीन था कि
उसने बहने से पहले रेत में कहीं गहरे दबा दिया था।

मुझे गोधूलि में खूंटी के पास खड़े पशुओं से पूछना था..
कि वे खुले मैदानों से लौटकर
हर बार बंधने के लिए क्यों आ जाते हैं।

मुझे पहाड़ से ‘संन्यास’ का भावार्थ समझना था..
जो कंकड़ में बदलते हुए भी
अंतिम सांस तक द्वंद्व में रहकर भी निर्द्वंद्व रह पाता है।

मुझे उस भूमिहीन मजदूर से मुस्कान उधार लेनी थी..
जो बिन मौसम बरसात होने पर
किसी खेत में लावारिस बीज दबे होने की प्रार्थना करता है।

मुझे तितली के साथ कोकून की उम्र जी लेनी थी..
जो अल्पजीवी होने के बावजूद
संसार के हर उपवन तक शीघ्रातिशीघ्र पहुंचना चाहती है।

लेक़िन
वर्ष नही जानते हैं….वापस लौटना!
वे जानते हैं…
अवसान पर कुछ छूट जाने की कसक छोड़ जाना।
वे देवताओं से माँग लाते हैं
नववर्ष की हर अलसुबह कुछ पा लेने की सम्भावनाएं ;
सम्भावना हेतु कुछ प्रतिक्षाएँ भी

और..
प्रतिक्षाएँ तो सृष्टि की सबसे खूबसुरत जीवट आशाएं हैं!

3)

परछाई का अनुवाद

भरी-दुपहरी में परछाई की भाषा
इसलिये न कम समझी गयी कि
क्योंकि धूप के पास उसका अस्तित्त्व रेहन पर रखा है;
बल्कि..इसीलिये कि धूप को पीठ दिखाकर
हम यह समझ लेते है कि
इससे पीड़ाएँ कुछ कम की जा सकती हैं।

जबकि परछाई को भी अकेला समझे जाने से परहेज़ था।

रोशनी की उपस्थिति में
परछाई का अनुवाद उतना ही रह जाता है
जितना वह देखी व समझी जाती है।

4)

अकेली स्त्री की आवाज़

भीड़ चिंतित नही
संकुचित व भयभीत हो उठी थी…
उस तीव्र कम्पन से
जो,किसी अकेली स्त्री के कंठ से गूँज रही थी।

स्त्री के मौनिक-इतिहास के स्वरूप के बिगडने से,
भीड़ व्यक्तिगत तौर पर बेहद डरपोक है।

वह स्त्री को
तितलियों के जीवाश्मों तक खींच ले गयी
जिनके कंठ की उम्र नदारद थी।

बस…टूटे रंगीन पँखों की अधूरी उड़ानें थी
जो या तो …बेहद कम उम्र की थी
या पत्थरों पर हल्का दाग तक नही लगा पाये थे।

भीड़ में
अपनी आवाज़ को खोजती अकेली स्त्री,
विलुप्त हो चुकी किसी भाषा की तरह है!

5)

बारिश..चुम्बनों की गीली स्मृतियाँ

बारिश की भारी बूंदों से
भयभीत झोपड़ी भीतर भागती है ;
एक मात्र तिरपाल के छेदों को ढकना
उसकी आपातकालीन व्यवस्था है।

महल झरोखों से मुख निकाल
आँखें मूँदकर,बूंद-बूंद चूसता है
यह उसका क्षणिक मौसमी-सुरापान है।

एक माली है,जिसकी हथेलियों में
गिरते फलों की आवाज़ को थामने की प्रार्थनाएँ हैं।
कुछ छिपे हुए नन्हें भी हैं,जिनकी
मिट्टी की उसी गीली आवाज़ की ओर बेतहाशा दौड़ है।

अम्मा को डंगरों तक पहुंचने के लिये
आधी सूखी धोती को फ़िर से सिकुड़ते हुए लपेटना है।
बाबा को धान के फूटते मुलजों में भारी बोरियाँ दिखती हैं।
नवयौवना की घमौरियों को पहली बरसात में नहाना है।

वही पुरानी बारिश है;
जो,हर बार नए तरीक़े से बरसती है।

झोपड़ी की छत से टपकती धीमी-बूँदें,
ईश्वर की भेजी चुम्बनों की गीली-स्मृतियाँ हैं।

*
डंगर–जानवर
मुलजा–जड़

6)

निशक्त प्रार्थनाएँ

वेश्या से ज़्यादा किस स्त्री ने
अपने रूप की लम्बी उम्र के लिये कातर प्रार्थनाएँ की होगी!

लेक़िन प्रार्थनाओं के बाद वह अधिक निशक्त है
कि मात्र रूप…उसकी दैहिक-सत्ता की सीमांत रेखा है
जहाँ से उसकी मिल्कियत आंकी जाती है।

वावजूद इसके कि
प्रार्थनाएँ …
सृष्टि की सभी भाषाओं के असहाय होने की व्यवस्थाएँ है।

उसे अपने रूप को अक्षुण्ण रखने की कुछ विधाएं
सड़क पर प्रेमी संग गुजरती एक स्त्री से उधार मांगनी है!

लेक़िन उस स्त्री की चुप्पी से
डयोढ़ी की ओर लौटती वेश्या अवाक है!
स्त्री का प्रेमी भी कुछ असमंजस में है!!

डयोढ़ी पर ग्राहक हेतु प्रतीक्षारत …
वह वेश्या यह जानकर भयभीत है कि
प्रेम में पड़ती हुई स्त्रियाँ अभी भी रुक नहीं रही हैं
उन्हें अभी भी अपने प्रेमियों पर कुछ ज़्यादा विश्वास है

अभी भी धरती से प्रेम पूर्ण-सम्पन्न घोषित नहीं हुआ है!

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