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दीप्ति अंगरीश

…बस अंतिम बार

मानो कल की बात होटेबल पर नया कैलेंडर सज गयादिन बीतते गएपर यादों का काफिला सदाबहारजानते हुई भी बेसुध रहीपीर…

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सुभाष चन्‍द्र

मेरी तो सौतन रही धर्मयुग : पुष्पा भारती

धर्मयुग यानी हिंदी पत्रकारीय जगत का एक मानक। जिसमें छपना और उसे पढना दोनों ही उस कालखण्ड के लिए खास…

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पंखुरी सिन्‍हा

डेटिंग ऑनलाइन

कागज़ होता तो वो चूमती उसे लेकर शायद उसका नाम भी लेकिन सबकुछ मायावी था तारों में, जालों में मशीन…

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कीर्ति दीक्षित

जनक की पाती उर्मिला के नाम

मेरी प्राणजा, मैथिली, जनकदुलारी, वैदेही, जानकी प्रिय उर्मिले, ये पत्र तो सीता जीजी के लिए है! मेरे इन संबोधनों को…

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डॉ. यशस्‍विनी पांडेय

दुनिया जैसी है उससे बेहतर चाहिए

हर व्यक्ति अपने जीवन में कई किरदारों को जीता हैं उसके व्यक्तित्व की पहचान इस बात से होती है कि…

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शिवांगी पुरोहित

गिरकर उठना सीख गई

हंसती खेलती मेरी दुनिया, एक दिन बेरंग हो गई।कुछ समझ ही न पाई मैं , उसके चले जाने के बाद।पहले…

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डॉ. वेद मित्र शुक्ल

हिंदी लोकतांत्रिक एवं समन्वयकारी भाषा: रामदरश मिश्र

पुस्तक ‘जारी अपना सफ़र रहा’ का लोकार्पण हुआ अप्रैल 7, 2019. वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र के आवास पर हिंदी अकादमी…

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रवि शर्मा

साहित्य में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और हिमांशु जोशी

भारत में सभ्यता और संस्कृति शब्द जनसामान्य में प्रायः एक ही उद्देश्य से प्रयुक्त किए जाते हैं परन्तु इन दोनों…

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डॉ. अर्चना सिंह

धारणा और गुलाम

[1]         ‘धारणा’          काले, बड़ी-बड़ी जालियों वाले मोज़े           पहनने वाले को           भ्रम है …..           पैर नंगे नहीं…

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अंशु प्रियदर्शिनी

उस रात…

आंखों में खामोशी थी, सांसों में मदहोशी थी घुंघरुओं की खनखनाहट थी, दिल में अजीब सरसराहट थी, ख्‍वाबों में बेचैनी…

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