आपका हार्दिक स्वागत है

समीक्षा- रस्सी पर चलती लड़की (काव्य संग्रह)

‘रस्सी पर चलती लड़की काव्य संग्रह 2017 में प्रकाशित हुआ है। यह भगवान वैद्य प्रखर द्वारा लिखित दूसरा काव्य संग्रह है तथा बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित है। उनके पहले काव्य संग्रह और इस काव्य संग्रह के बीच लगभग छह वर्ष का अंतराल है और जैसा कि सहज स्वाभाविक है पहले काव्य संग्रह से दूसरे की यात्रा के बीच कवि ने अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति के लिए अपने शब्दों में और अधिक तीखापन पैदा किया है वह भी बिना जल्दीबाजी के। उन्होंने इस तथ्य को इस काव्य संग्रह की भूमिका में भी स्वीकार किया है कि ‘‘छह वर्षों में घटित परिवर्तन, नये परिचय, नये अनुभव, नई अनुभूतियां, नई किरचें अर्थात्……नये अहसास! मैंने अपनी ओर से जल्दीबाजी नहीं की। आसमान में उड़ने वाले पंछियों से कौन कहे कि जमीन पर उतरो। जब जैसा बना, शब्दों में व्यक्त कर दिया’’ संग्रह की भूमिका में ही कवि का इतना उदार स्पष्टीकरण आकर्षित करता है। कवि के लिए कविता लिखना एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है। जैसे पृथ्वी पर उपस्थित सभी प्राणी सहज स्वाभाविक प्रक्रिया द्वारा चलायमान हैं वैसे ही कवि के लिए कोंपलों या अंखुओं की भांति मन में खिली नवीनतम भावनाओं की सहज, सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम कविता है। कवि भगवान वैद्य प्रखर ने व्यंग्य, कहानी, लघुकथा, लेख, यात्रा-वृतांत आदि भी लिखे हैं लेकिन ये सारी विधाएं कवि के लिए वैसी ही हैं जैसे दूध से छाछ, दही, मक्खन, मावा, पनीर, रबड़ी आदि दूध से बने पदार्थ निकलते हैं लेकिन कविता मूल है अर्थात कविता दूध की भांति मूल है। कवि ने अपने आसपास जो देखा, जो महसूस किया उसे शब्दों में बिना लाग-लपेट के इस संग्रह में व्यक्त कर दिया।

इस संग्रह में निन्यानवे कविताएं हैं। संग्रह की दूसरी ही कविता ‘प्रिंट आउट’  इस तकनीकी युग की सहूलियत को तो व्यक्त करती ही है लेकिन साथ ही हमारे संबंधों में इस तकनीक के कारण आई संवेदनहीनता को भी व्यक्त करती है। स्मृतियों को ‘पेन ड्राइव’ में सहज कर नहीं रखा जा सकता, न ही वे एक गलत क्लिक से डिलीट हो पाती हैं। कोई वायरस भी इन स्मृतियों को चौपट नहीं कर सकता। ‘प्रिंट आउट’ भी उनके स्थायित्व की गांरटी नहीं देता। स्मृतियां तो वे जीवंत अहसास होती हैं जिनके बलबूते हम अपना समस्त जीवन निभा जाते हैं। फिर आज के तमाम उपकरण चाहे मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए इजाद कर लिए लेकिन ये उपकरण वास्तव में मनुष्य के ‘स्मृतिभंग’ का ही कारण बन रहीं हैं। अहसासों का, गंध का, स्पर्श का कोई प्र्रिट आउट कभी निकल ही नहीं सकता-

काश,

स्पर्श, गंध, अहसास का भी

प्रिंट आउट निकल पाता

तो संबंधों के नाम पर

तुम्हारे-मेरे बीच केवल कोरा स्क्रीन न होता

‘बचपन’ कविता ‘प्रिंटआउट’ कविता का ही विस्तार है। इस कविता में परिवार का सबसे छोटा सदस्य मेधावी है। वह ग्रह, तारों, का अस्तित्व आंक चुका है। ब्रह्ंमांड के कई रहस्यों को जान चुका है लेकिन इस दुनिया के बल्कि अपने परिवार के भीतर संबंधों में समा चुकी संवेदनहीनता की तह तक पंहुच पाने में वह असमर्थ है। उसके मम्मी-पापा, मम्मी-दादी और दादाजी और पापा के बीच वे कौन से ग्रह हैं जो इनको एक दूसरे के करीब नहीं आने देते। इन प्रश्नों के उत्तरों को वह गूगल याहू पर भी खंगाल चुका है। पर क्या इनके उत्तर उसे कभी मिल पाएंगें ? यह कवि की वास्तविक चिंता है। वर्तमान समय में ज्ञान-विज्ञान पर तो हम अिधपत्य जमा चुके हैं लेकिन क्या अपने आस-पास फैले रिश्तों में समाई- रिक्तता, अजनबीपन, ऊब, संत्रास का कोई विज्ञान कभी जान पाएंगे हम? भविष्य में आने वाली पीढ़ियां शायद इस अपनेपन का पाठ कभी पढ़ ही न पाएं। मोबाइन, इंटरनेट का ये कृत्रिम युग हमें अपनी जड़ों से दूर कर रहा है। सहजता, स्वाभाविकता जैसे अब दूर की चीजें लगती हैं सब कुछ को एक उपकरण में संजो कर रख लेने के इस युग से पुरानी पीढ़ी आक्रांत हैं। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पंहुचे पिता की पीड़ा ‘जड़े’ नामक कविता में स्पष्ट है जो अपनी मृत्यु से पूर्व अपनी सारी संपत्ति का बंटवारा अपने बेटों में करने के बाद चाहता है कि उसका चश्मा, टोपी, लठिया, किताबें उसकी चिता पर ही रख दिए जाएं क्योंकि आज के समय में इन व्यर्थ की चीजों का कोई दावेदार नहीं होता। यह कविता एक व्यंग्य है आज की इंटरनेट संस्कृति पर और कवि ने बखूबी इसे इस कविता में व्यक्त किया है-

बैंक बैलेंस, फर्नीचर,टी0वी,फ्रीज

सबके बंटवारे की सूची बन गई

बस नामुराद ये किताबें रह गईं

****************

जिनका कोई लेवाल नहीं।

व्यंग्य किसी भी रचनाकार का एक सशक्त हथियार है। कवि ने इस व्यंग्य का बखूबी इस्तेमाल अपने इस काव्य संग्रह में किया है। संग्रह में कविताओं की विविधता देखते ही बनती है। इतिहास, वर्तमान, राजनीति, अर्थशास्त्र, पारिवारिक संवेदनाएं आदि कोई ऐसा विषय नहीं है जहाँ कवि की दृष्टि न गई हो। इन बहुविध संवेदनाओं से पटी हुई काव्यकृति की काव्यभाषा में भाषा के सारे अस्त्रों का ही कवि ने प्रयोग किया है। व्यंग्य का मारक प्रयोग कई कविताओं में देखते ही बनता है। ‘सोने की चिड़िया’, ‘नदी’, ‘पिता, लैप-टॉप, पुत्र’ ‘उम्रदराज’ आदि ऐसी अनेक कविताएं हैं। समृद्ध इतिहास की तुलना कवि आज के समय से करते हुए व्यंगयमयी शब्दावली में ‘सोने की चिड़िया’ में करते हुए कहता है-

कहते हैं, भारत कभी

सोने की चिड़िया था

मैं कहता हूँ, वह आज भी है


****************

अरबों की लागतवाली शादी में मिल जाती है

शराब के गिलास में अलमस्त डूबी हुई

चुनाव के दौरान

कठपुतली-सी नाचती हुई

पर कटी, कुछ हाथों में बंदिस्त,

हमारी प्यारी सोने की चिड़िया।

कवि को अपने गौरवशाली और समृद्ध अतीत का गुमान तो है ही लेकिन साथ ही जब वह आज के संदर्भ में अपने अतीत को देखता है तो वह एक तीखी पीड़ा से गुजरता है। वास्तव में यह सिर्फ कवि के भीतर उमड़ता हुआ प्रश्न ही नहीं है अपितु यह समस्त जनसाधारण का प्रश्न है कि आखिर हमारा समस्त देश सोने की चिड़िया से बदलकर चंद लोगों के लिए ही सोने की चिड़िया बनकर रह गया है। उन तथाकथित लोगों को कवि अपनी इस कविता में निर्भीकता से इंगित भी करता है। इसी तरह से ‘छवि’ नामक कविता एक शोचनीय स्थिति पैदा करती है साथ ही मीडिया की भूमिका पर भी प्रश्नचिंन्ह लगाती है। ‘पूरे भारत का चित्र यहां उपस्थित है, कहाँ था पूरा भारत?’ कहकर कवि अपनी बेचैनी को प्रकट करता है। मीडिया द्वारा कुछ चंद जुमलों को उछाल भर देने से एक वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती। कविता में कवि उल्लेख करता है कि नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में यह बताया गया कि पूरा भारत यहाँ उपस्थित था लेकिन वास्तव में कवि की चिंता है कि क्या यह पूरा भारत है? नहीं पूरा भारत तो बसता है- आत्महत्या ग्रस्त किसान के परिवार में, कुपोषण की बलि चढ़े बालकों में ,सड़क के किनारे जिंदगी बिता रहे लोगों में, झोपडपट्टी में आदि इन सब के बिना क्या भारत का पूरा चित्र उपस्थित हो सकता है। शायद नहीं । ‘पैसा बह रहा है’ कविता में  व्यंग्य की धार पैनी है। यहाँ पैसे की बाढ़ आ गई है हर जगह- मेल मुलाकातों में, कोर्ट-कचहरी में, प्यार की बातों में, आचरण में, रिश्तों में आदि हर जगह और हद तो तब हो जाती है जब यह पैसा ‘दुर्लभ प्रजाति के विषधर की भांति उड़कर’ वहाँ छलांग लगा देता है जहाँ सांत्वना या संवेदना पहुंचा करती थी । राजनीति में चुनाव की बात हो तो यह पैसा विकराल बाढ़ को भी मात दे देता है –

पैसे का तांडव, सब बहने लगता है उसमें

सत्य, चरित्र, मित्रता, नैतिकता

विश्वास के पौधे उखड़ जाते हैं जड़ से

निष्ठा, आत्मीयता की लाशें

बहती दिखाई देती हैं।

कवि पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी काफी सतर्क है। संग्रह की कई कविताएं इसका उदाहरण हैं- ‘नदी’, ‘ धरती अवसर चाहती है’, ‘इंद्रधनुष’, ‘पेड़ और इंसान’,‘किताबें’, ‘बूढ़ा तालाब’ आदि । ‘नदी’ कविता एक बिम्बधर्मी कविता है। एक ऐसी स्त्री से उसकी तुलना की गई है जिसके साथ जबरन अकरणीय किया गया हो। पहले उसकी शिराओं में जहर भरा गया, फिर उसे अखाद्य खिलाया गया, उसका गला दबोचा गया। नदी अपनी अस्मिता बचाने के लिए चीखी-चिल्लाई भी लेकिन उसके हाथ-पैर बांध दिए गए। जिससे जो बना, जिसके हाथ जो लगा वह नदी से लूट कर ले गया और धीरे-धीरे एक दिन उसका छटपटाना बंद हो गया। और आज वह एक छिपकली की भांति दिखाई देती है -‘लोग कहते हैं, कभी ‘नदी’ नाम था उसका, हां, एक जीवित नदी थी वह’ ऐसी कविताएं आक्रांत करती हैं। हमारा भविष्य पर्यावरण के संरक्षण पर ही टिका हुआ है और हम अपने जीवित रहने के साधनों को ही नष्ट करते जा रहे हेैं । प्रकृति के इस दोहन के भयंकर परिणाम हमें भुगतने होंगे। कवि अपनी इन कविताओं द्वारा हमें चेताता हुआ चलता है। तालाब, नदियां सूखती जा रहीं है और मानव बस्तियां बढ़ती चली जा रही  हैं। तालाब अब मगरमच्छ की आंख-सा दिखाई देता है और दृश्य इतना भयावह हो गया है कि-

चारों ओर से कूड़ा, झुग्गियां, मलबा और

शहर की गंदगी से पटा पड़ा है तालाब

उसकी आयु का

कोई साथी शेष नहीं है, उसके इर्दगिर्द

न कोई पौधा, न कोई इमारत

यहाँ तक कि पुराना शमशान भी

बढ़ती बस्ती निगल गई

इस काव्य संग्रह की शीर्षक कविता ‘रस्सी पर चलती लड़की’ अपनी संवेदना में बेमिसाल है। स्त्री संवेदना के जितने भी पक्ष हो सकते हैं वे सारे यहाँ मौजूद हैं। घर और बाहर हर जगह स्त्री शोषित है। समाज के तथाकथित वर्ग चाहे वे उच्च हों या निम्न या अति निम्न वर्ग सभी स्त्री हो एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस कविता में लड़की एक वस्तु या कहें एक विज्ञापन की तरह इस्तेमाल की गई है। समाज का यह वर्ग जो खेल दिखाकर अपनी जीवनयापन करता है वह भी भली भांति जानता है कि स्त्री को सामने रखकर ही समाज की संवेदना को पाया जा सकता है। लोगों की रूचि इस खेल में तभी बनेगी जब पुरूष के स्थान पर स्त्री उस जानलेवा खेल में हिस्सा लेगी। पिता के हाथ में कोड़ा उसे भयभीत करता है कि अगर वह इस रस्सी को पार नहीं करेगी तो हश्र बुरा होगा । पिता द्वारा उसके खुद के शरीर पर बरसाए गए कोड़े उसे भीतर तक हिला कर रख देते हैं उसे लगता है कि यह कोड़े पिता अपने शरीर पर नहीं बल्कि उसके खुद के शरीर पर बरसा रहे हैं और लड़की इस भय के चलते रस्सी के दूसरे छोर पर पहुंच जाती है। खेल खत्म होने पर तालियां मिलती हैं पर लड़की सोचती है कि भाई के होते हुए उसे ही क्यों इस रस्सी पर चढ़ा दिया जाता है? ‘मां की गोद में सहमी लड़की सोच रही है, इस खेल में, हर बार उसे ही क्यों चढ़ाया जाता है रस्सी पर!’ लड़की के इस प्रश्न का जवाब तो माँ के पास भी नहीं है। इस प्रश्न का जवाब तो इस व्यवस्था के पास है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें स्त्री के हिस्से आता है केवल जिम्मेदारी, कर्तव्य और त्याग। कवि ने बहुत ही बेबाक ढंग से और सधी हुई भाषा में इस व्यवस्था पर कुठाराघात किया है। इसके अतिरिक्त ‘उम्रदराज’ जैसी अनूठी कविता इस संग्रह का हिस्सा है जो उन बुजर्गां को समर्पित है जो अपनी जड़ों से दूर हैं और अपनी संतानों के पास रहने को मजबूर हैं। ये फै्रक्चर्ड उम्रदराज, रिपेअर्ड उम्रदराज, जर्जर उम्रदराज, ऑपरेटड उम्रदराज अपने गाँव, कस्बों से दूर टू-थ्री-फोर बीएच की बालकनियों की पुरानी कुर्सियों पर अपनी बिखरती यादों के सहारे धीरे-धीरे काल के गाल की तरफ बढ़ रहे हैं।

काव्य संग्रह-रस्सी पर चलती लड़की, कवि- भगवान वैद्य ‘प्रखर’, बोधि प्रकाशन, एफ-77,सेक्टर 9, रोड न0 11, करतापुरा इंडस्टियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006, प्रथम संस्करण, जुलाई 2017, मूल्य-150, पृष्ठ – 152

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *