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रूठी कविता

भारत माँ का शीर्ष हिमालय

मानव सोच मस्तिष्क शिवालय

शिव संग नीर बसा रहता है

जीवन बन नीर बहा करता है

भीतर ज्योत जला करती है

तभी हिमालय से बर्फ पिघलती है

एक बार मेरी सोच अटक गयी

मेरी कविता से ठन गयी  

मैं उसे रचना चाहूँ मगर वह रूठ गयी 

कहती ना बनूँगी मैं एक कविता 

बहा लो चाहे अपने विचारों के सागर में

तुम कितनी भी सरिता  

मैं तो अटकी रहूँगी हिमालय की घूँटी से  

नहीं उतरूँगी तेरी धरा की जमी पे

मैंने प्यार से पूछा क्यों हो तुम इतनी उदास

देखो तो जरा जमीं पर तुम्हारी है कितनी प्यास

बिना उतरे धरा पर सागर से कैसे मिलोगी

अगर ना मिली तो अस्तित्वविहीन रहोगी

बोली—मेरी कई हैं बहना

बह गयी हिमालय से बन झरना

मानव बाँध बनाता रहा

और वो बँधती रही

लौकिक सुख मानव जीवन में

बन नदी रचती रही

कभी था उनका श्वेत रंग

हो गयी हैं अब वो सब बदरंग

टूट गयी है कविता

मैली हो गयी है सरिता

निश्छल हर पल

पल-पल वो चला करती थी

तटिनी के कल

कल-कल वो बहा करती थी

पाप सारा भर दिया है उनके जीवन में

गंदा कर दिया है उसे अपने चमन में  

मैं अगर उतर गयी तो मेरा भी वही हाल होगा  

तोड़-मोड़कर रचोगे मेरी रचना  

छोड़ दोगे मेरे भीतर बहने गंदे नाले का कचरा

साम, दाम, दण्ड, भेद का पाठ ना पठाओ मुझे

मैं नहीं उतरूंगी

इसी हिमालय की घूँटी पे मैं अटकी रहूँगी….

13 Comments

  1. बहुत ही सुंदर कविता और जिस तरह नदी की स्थिति को लेते हुए कविता में पिरोया है आपने वह आज की हकीकत है।

  2. कहानीकार महोदया जी बधाई व शुभकामनाएं,
    प्रेरणा से परिपूर्ण काव्यों, कहानियों का संग्रह,👍

    शुभ मंगल आशीष
    दूरगामी शुभकामनाएं
    शुभ दिवस

  3. बहुत खूब संगीता जी, आपने तो कविता-सरिता को एकाकार कर डाला…। प्रस्फुटित भावों को कलकल बहाती बेहतरीन रचना। बधाई!🌺

  4. कितना कुछ कह गए, कितना कुछ बह गया।
    हां एक सुंदर रचना भी रच गयी 💐

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