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समीक्षा : बोल रहा हूँ (काव्य संग्रह)

‘बोल रहा हूँ’ कवि अमित कुमार मल्ल का तीसरा काव्य संग्रह है। इस काव्य संग्रह की अधिकांश रचनाएँ वर्ष 2015 से लेकर अभी तक की हैं। बक़ौल लेखक समाज युवाओं के साथ दौड़ते-दौड़ते हाँफ रहा है और कवितायें प्रौढ़ता की उम्र में रची जा रही हैं। जो कवितायें युवाओं के साथ दौड़ती हैं वे निश्चित ही प्रौढ़ मानकों से भिन्न होती हैं – कहकर कवि ने भूमिका में ही इस काव्य संग्रह के विषय को स्पष्ट कर दिया है। वर्तमान समय तेजी से भागता हुआ समय है, इस समय को कोई जी नहीं रहा है, किसी के पास इतना समय नहीं कि कुछ पल ठहरकर इन लम्हों को जी लिया जाए, यह बस बीत रहा है, संवेदनशून्य लोगों के हाथ से निकलकर यह अपने आप को समाप्त किए जा रहा है, व्यर्थ की अंधी दौड़ में हम कहीं नहीं पहुँच रहे, इन सुनहरे पलों को खोकर हम अंत में कुछ पाते भी हैं तो तब तक हम संवेदना के तमाम मानकों को खोकर अवशेष हो चुके होते हैं, बस स्मृतियाँ शेष रह जाती हैं। कवि इन्ही स्मृतियों मे जीता हुआ अपने ‘मैं’ की तलाश में है।

अक्सर किसी भी कविता को पढ़ते हुए यह अनुभूति होती है की कवि अपना सच बयां कर रहा है, यह शत प्रतिशत सही भी है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कवि की कविता में ‘मैं’ तो सम्मिलित है ही साथ ही वह अपने परिवेश, अपने समय, अपने आस-पास के लोगों को भी उसमें शामिल करता चलता है। वह केंद्र में खुद को रखता है लेकिन उस ‘मैं’ के माध्यम से अपने समय को अपने पाठकों के समक्ष रखता है – यह संग्रह इसी तथ्य का दिग्दर्शन कराता है। संग्रह की अधिकांश कवितायें ‘नोस्टेलजिआ’ से प्रेरित हैं। कवि की अतीत के प्रति ललक, उसका घर, गाँव, बचपन के खेल, माँ के हाथों का स्पंदन आदि को कवि आज भी महसूस करता है। महानगरों में रहने के बावजूद, यहाँ के उजालों में चौधियानें के बावजूद और शहरों के उजालों में रहकर भी गाँव की वह कीचड़ वाली मिट्टी कवि आज भी नहीं भूला, उन खेतों की मिट्टी की महक आज भी कवि की साँसों में भरी हुई है।वह गाँव चाहे हरा-भरा नहीं है, उसके बांगर,कछार,ताल, नाव, डोंगी, त्योहार, खेत, खलिहान, लोग सब कुछ कवि की स्मृति में ज्यों का त्यों है –

वहाँ की

फुलवारी

बारी

नौरंगा

नौरंगी

बगीचा को

जहां गर्मी की

दोपहरी गुजरती थी

‘मेरा गाँव’ में कवि ने बहुत ही विवरणात्मक शैली में गाँव की उस एक-एक गतिविधि का वर्णन किया है जिसे वह अब मिस करता है। यह कविता लेकिन एक वर्णन भर नहीं है, कविता में कवि का समय एक ‘राग’ के साथ व्यक्त हुआ है। वह ‘राग’ कवि का समय के साथ अपने गाँव के प्रति और भी गहरा होता गया है।जीविका के लिए अपने गाँव को छोड़ना पड़ा, इस अपराध बोध से कवि ग्रस्त है। जिस गाँव को कवि ने शहर जाते समय भरे हुए मन से छोड़ा था, आज उसके रास्ते भले ही पक्के हो गए हों पर उस गाँव की संवेदना भी शहरों के समान तारकोल की तरह जल गयी है। गाँव का वो अपनापन कहीं खो गया है। गाँव के खेतों के बटवारें के साथ-साथ लोगों के दिलों का भी बंटवारा हो गया है। गाँव धीरे-धीरे शहर में तब्दील होता चला गया, ओद्योगिक कंपनियों के लिए गाँव नए-नए बाज़ार के रूप में उभरकर आए, शहरों की तरह ही तकनीक का प्रसार यहाँ हुआ। गाँवों में विकास तो बहुत हुआ लेकिन गाँव धीरे-धीरे मानवीय संवेदना से तिरोहित होता चला गया, कवि उन्ही मानवीय संवेदनाओं की तलाश में हैं। यही भाव इस काव्य संग्रह की एक अन्य कविता ‘रेल्वे स्टेशन की पीली रोशनी’ में भी व्यापत है। कवि स्टेशन की सिग्नल लाईटस की पीली रोशनी में अपने घर – परिवार को याद कर उदास है। इस पीली रोशनी को देखना कवि को  हमेशा उदासीन कर जाता है क्योकि –

तू

दर्द ही देती है

लेकिन

रोजी-रोटी के लिए

जीवन चलाने के लिए

तुझे देखना पड़ता है

तुझे सहना पड़ता है

‘पड़ता है’ जैसे शब्दों की पुनराव्रति में कवि के मन का भाव छलक-छलक पड़ता है। अपने जीवन में आगे बढ़ने के  सुख में भी कवि अपने घर-आँगन के पीछे छूट जाने की कसक को जीता हुआ चलता है। कवि की अपने अतीत के प्रति गहन रागात्मक भावना ऐसी कविताओं में देखते ही बनती है।

संग्रह की शीर्षक कविता ‘बोल रहा हूँ’ अपने कथ्य में बेजोड़ है। वीर महाराणा प्रताप के माध्यम से कवि ने वर्तमान विसंगतियों को दूर करने का संदेश दिया है। समय और परिसतिथियाँ चाहे बदल गयी हों पर परंतु संदर्भ आज रूप बदलकर हमारे सामने हैं अपने स्वाभिमान की लड़ाई जिस तरह से महाराणा प्रताप ने विकट और विपरीत परिसतिथियों में लड़ी थी आज वैसी ही लड़ाई प्रत्येक को लड़ने की आवश्यकता है। चुनौतियाँ हमारे मुंह बाए खड़ी है। प्रताप के समय की चुनौतियाँ- साम्राज्यवाद, संसाधन, उन्नत हथियार—ये सब प्रतीक है। आज ये संघर्ष बाहरी से अधिक भीतरी हो गया है। यह अंतर्द्वंद प्रत्येक मेवाड़ी के हृदय से निकलकर आज सबका हो गया है। महाराणा प्रताप को आज हमें वर्तमान संदर्भों में एक व्यक्ति नहीं बल्कि विचार की तरह ग्रहण करना चाहिए। इतिहास गवाह रहा है की अपने समाज और अस्मिता को बचाने का संघर्ष हर युग में रहा है  और समय के साथ यह संघर्ष विभिन्न रूपों में हमारे सामने आ रहा है, आवश्यकता है इतिहास से प्रेरणा लेने की—

यह जंग नहीं है

यह

उपाय है

बचाव का ,

अपनी अस्मिता के

अपने समाज के

अपने स्वाभिमान के

प्रशासनिक तंत्र की खराबियाँ इस कविता संग्रह में भी कवि अपने पाठकों के सम्मुख रखता है। कवि स्वयं इस व्यवस्था का हिस्सा है परंतु इसमे रहते हुए भी वह उस व्यवस्था की कमियों की ओर संकेत करने से नहीं चूकता। यह व्यवस्था ऐसे दोरंगे चरित्र के लोगों से भरी पड़ी है। संग्रह में कई प्रेम कवितायें भी हैं – ‘तुमसे कहने के लिए’, ’दिल की बातें’, ’शहर’, ’जुल्फें’, ’तेरा प्यार’, ’प्रिय’, ’तुम्हें’ आदि ऐसी ही कवितायें हैं। प्रेम के रस से पगी हुई ये कवितायें संग्रह में एक नया रस घोलती हैं। वास्तव में सृष्टि का आधार तो प्रेम ही है और व्यक्तिगत प्रेम को दरकिनार कर समस्त सृष्टि के साथ तदाकार भी नहीं हुआ जा सकता। व्यक्तिगत प्रेम की यही संवेदना कवि की संवेदना का विस्तार करती है और कवि मुक्तिबोध की तरह ‘जन-जन की उस पीड़ा को अपनी कविता में व्यक्त कर पाता है।

‘उरी में शहीद हुए सैनिकों की ओर से’ जैसी कविता लिखकर कवि ने उरी में शहीद हुए सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। हम अपने आप में और अपने आस पास की समस्याओं में ही उलझे रहते हैं लेकिन उन सैनिकों के कठिन जीवन को भूलाकर हम आरोप- प्रत्यारोप की एक नयी संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं। हमारी रक्षा के लिए अपने परिवारों से दूर रहकर, अपने प्राणों की परवाह किए बगैर दिन-रात सीमा की चौकसी करते ये सैनिक शहीद होने के बाद केवल कुछ दिन बीबी की सिसकियों और बच्चों की उदासी में ही जीवित रहते हैं और ये देश उनकी शहादत को जल्द ही भूला देता है। कवि ने इस कविता द्वारा अपनी रचनाधर्मिता के विस्तार  के साथ –साथ उसका निर्वाह भी किया है। समसामयिक परिस्‍थितियों पर यह कविता और भी अधिक सटीक बैठती है। जब चारों तरफ ‘असहिष्‍णुता’ का शोर है ऐसे में सैनिकों की भावनाओं के आहत होने की परवाह कोई नहीं करता। कवि कटाक्ष करते हुए लिखता है—

हमे

अधिकार नहीं

भावनाओं के आहत होने का

विश्लेषण का

उलाहने का

आपत्ती का

क्योंकि

हमने देश की रक्षा का

वचन जो लिया है

संग्रह की कवितायें केवल यथार्थ का बयान करके ही नहीं रह जाती बल्कि वे चुपचाप एक उम्मीद जगाती कवितायें हैं। व्यर्थ का शोर और जुमलेबाजी से कवि कोसों दूर हैं। वास्तव में एक आदर्श कविता वही होती है जो सीधे,सरल शब्दों में कवि की बात पाठक तक पहुंचा दे। कवि अमित कुमार मल्ल की कवितायें शिल्प की दृष्टि से भी अनूठी हैं। कथ्य की अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का व्यर्थ आडंबर, अलंकार, प्रतीक की व्यर्थ बोझिलता से कवि कोसों दूर हैं। हाँ कुछ कवितायें अवश्य की लोकरंग में पगी हुई हैं जिनमे शब्द-चयन देखते ही बनता है –‘माई रे’, ’रंग दे रसिया’ आदि ऐसी ही कवितायें हैं जिनकी संरचना गेयात्मक है।

(बोल रहा हूँ – कविता संग्रह, लेखक – अमित कुमार मल्ल, प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, जयपुर, प्रथम संस्कारण – 2018, पृ.-112, मूल्य-120)

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