आपका हार्दिक स्वागत है

वचनबद्ध

प्रतीक्षा करो तुम …..तब तक,
प्रकृति की अनुराग 
मंत्रणा के निमित्त
प्रेम कोंपलो को पुलकित 
हर्षित होने दो
जब मन की प्रवाहिनी 
कलकल बहेगी 
और चन्द्रमा की चाँदनी 
झिलमिल फिसलती
रपटती दिखेगी 
उर्मियों पर खेलती हुई
सरिता पहनेगी जब 
चाँदी की सी दुशाला 
पल्लवों संग चंचल
पवन करेगा अठखेलियाँ
चाँद का आव्हान कर 
बुलायेगा उसे शिखर
जीमने के लिये 
पावनी हरी धरा की चादर पर
ऊँघती सी अलसायी 
बालियों पर खेतों की जब
ओस की ठंडी बूँदें 
गिर कर जगायेंगी उन्हें 
पत्तियों के साज़ों पर 
लतायें बन के बंदनवार
झूमेंगी और करेंगी नृत्य,
चकोरी स्वर लगायेगी
तब तुम प्रकृति की वो
मंत्रणा संपूर्ण समझना
कलरव संग भोर की मंजुषा 
दूर्वा और पुष्पों के महकते
रंगबिरंगे शगुन लायेंगे 
प्रेम के मंगल कारज के लिये
तब तुम आना निकट मेरे 
शैलजा के तीरे प्रतीक्षारत
मैं आत्मा की आचमनी से
नेह की गंगाजली ले
अंजुरी भर अक्षत
केशर संकल्प करूँगी 
तब तुम्हें स्वीकार 
ओंकार गूंजेगा चहुँदिश
उस क्षण प्रीत के वचनबद्ध 
आलिंगन में जकड़ लुंगी तुम्हें,
अधरों से अधरों का 
स्वीकृत कर पंचामृत
करूँगी आत्मसात तुम्हें
प्रेमरत सौभाग्य बेला में
प्रतीक्षा करो तुम …..तब तक ।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *