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वृहत्त कैनवास के शिल्पकार : नागर

अमृतलाल नागर हिन्दी के विशिष्ट कथाकार हैं। उन्होंने व्यक्ति के जीवन और सामाजिक ताने-बाने को जिस विशिष्टता के साथ प्रस्तुत किया है वह उन्हें प्रेमचन्द की परम्परा से जोड़ता है। वैसे तो हर लेखक की अपनी अलग शैली और शिल्प होता है जिस पर वह अपने अनुभव को रेखांकित करता है, लेकिन नागर का लेखन इस दृष्टि से विलक्षण है। वह किसी भी प्लॉट पर काम शुरू करने से पहले बहुत हद तक भीतरी रूप से उस पर काम कर लेते हैं। उन्होंने एक स्थान पर कहा भी है कि ‘अपनी आँखों के आगे एक स्क्रीन पर मै जो कुछ देखता हूं, उसी का वर्णित करता जाता हूँ।’ मतलब चित्र पहले उनके मानस पटल पर अंकित होते हैं उसके बाद शब्दों का आकार लेते हैं, तब कथा का विन्यास प्रारम्भ होता है।

जिस प्रकार कोई चित्रकार किसी भी चित्र को बनाने के पहले अपने मन में एक काल्पनिक चित्र का निर्माण कर लेता है और काल्पनिक चित्र को यथार्थ भूमि पर उतारने के लिए योजनाबद्ध रूप से अपने कार्य संचालित करता है। उसी के अनुसार ही कैनवास, कूची, रंग आादि की व्यवस्था करता है, और रंग भी कैसे, जो उसकी कल्पनाओं को सजीव करने की क्षमता रखने वालें हों, तब कहीं जा कर वह अपनी कल्पना को कैनवास पर प्रतिमूर्त कर पाता है, ऐसा ही हिन्दी के कथा शिल्पी नागर जी के साथ भी है। वह कथा कहन के ही नहीं बल्कि कलम के शिल्पी हैं। उन्होंने जिस भी विषय का चयन किया उसे पूरी लगन, इमानदारी और कठिन परिश्रम से उसकी अन्तिम परिणति तक पहुंचाया। उन्होंने स्वयं यह बात स्वीकार की है कि उनके उपन्यासों के कथानक और उनके पात्रों का सृजन किसी कल्पना लोक में नहीं हुआ है। वह उनके आस-पास ही बिखरे हुए होते हैं। चाहे वह ‘सेठ बांकेमल’ का बांकेमल हो जो वास्तव में सेठ घुर्रेमल हैं, या कि ‘बूँद और समुद्र’ की ताई हों जो उनके बचपन में उन्हीं के मोहल्ले की एक बेढ़ींया दादी का ही दूसरा रूप हैं। ‘अमृत और विष’ का अरविन्द शंकर नामक उपन्यासकार कौन है ? वास्तव में वह नागर के लेखकीय संघर्ष का ही सृजनात्मक प्रतिमान है।

नागर अपनी कथा के सन्दर्भ भले ही ऐतिहासिक लेते पर वह उसे इतिहास मात्र नहीं रहने देते हैं।  ‘महाकाल’ (1946) से लेकर ‘पीढियां’ (1990) तक, लगभग पांच दशक तक का उनका लेखन इसका जीता जागता प्रमाण है। इस पांच दशक में उन्होंने महाकाल, सेठ बांकेमल, बूंद और समुद्र, शतरंज के मोहरें, सुहाग के नुपुर, अमृत और विष, सात घूँघट वाला मुखड़ा, एकदा नैमिषारण्ये, नाच्यौ बहुत गोपाल, खंजन नयन, बिखरे तिनके, अग्निगर्भा, करवट और पीढियां जैसे वृहत्तकाय उपन्यासों की रचना की।

 ‘बूंद और समुद्र’ का कथा संसार अत्यंत व्यापक और विविधता से भरा हुआ है। इस उपन्यास में ‘बूंद और समुद्र’ क्रमशः व्यक्ति और समुद्र समाज का प्रतीक है। लखनऊ के चौक के रूप में इसमें भारतीय समाज के विभिन्न रूपों, रीति-रिवाजों, आचार-विचारों, जीवन-दृष्टियों, मर्यादाओं, टूटती और निर्मित होती हुयी व्यवस्थाओं के अनगिनत चित्र हैं। इस उफनते हुये समुद्र में व्यक्ति-बूंद की क्या स्थिति है, यह उपन्यास का मुख्य प्रतिपाद्य है।’ इस उपन्यास के लिखे जाने के सात आठ वर्ष पहले ही उन्होंने आगरा और लखनऊ के गली मोहल्लों की संस्कृति, वहाँ के बच्चे, बूढ़े और जवानों के संवाद को अपने मन में बसा लिया था। जहां एक ओर उसमें गली मोहल्लों में रहने वाले माध्यम वर्गीय परिवार हैं, तो दूसरी ओर उच्च वर्ग के संपन्न व्यक्ति भी है। जहाँ एक तरफ रुढियों और अंधविश्वासों से ग्रस्त पुरानी पीढ़ी है तो दूसरी तरफ उनके विरोध में कड़ी युवा पीढ़ी भी है। इस उपन्यास का जो समाज है, वह यही समाज है जो हमारे आस-पास फैला हुआ है, हमारी गलियां हमारे मोहल्ले उसमें सजीव हो उठे हैं। नागर ने ‘केवल समाज में व्याप्त दुःख, शोषण, बेकारी, घुटन, अंधविश्वास, अशिक्षा, नारी-विवशता, राजनीति क्षेत्र की मूल्यहीनता, बुद्धिजीवियों की स्वार्थ परकता आदि का ही चित्रण नहीं किया है बल्कि मानवीय मूल्यों को भी परखा हैं।’

जहां एक ओर नागर के असीमित पात्रो का सृजन विस्मित करता है वही दूसरी ओर उपन्यास के वृहत घटनाक्रम है। यही कारण है कि गोपाल राय नें लिखा है उनमें ’चुनाव की राजनीति, सत्ताप्राप्ति के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडो, राजनीतिक दलों की आपसी खींच-तान, पुलिस की धांधली, न्यायालयों की न्याय देने में असमर्थता, मंदिरों में फैले प्रपंच और भ्रष्टाचार, संस्कृति के नाम पर रीति रिवाजों के पाखण्ड, झूठी शान और आडम्बर से ग्रस्त मध्यवर्ग, प्रकाशको की बेईमानी, साहित्यकार की विविशता’ का व्यापक चित्रण हुआ है। इतने सारे घटनाक्रम, इतना सारा कार्य व्यापार एक ही कथानक में सुगुंफित करना और हर सिरे को कस कर पकड़ रखना नागर की अपनी विशेषता है। इन्हीं सन्दर्भों में ‘बूँद और समुद’ उपन्यास को महाकाव्यात्मक उपन्यास कहा जाता है।

‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ कुछ विशेष सन्दर्भों में अपना अलग स्थान रखता है। इससे पहले भंगी जीवन पर इतना वृहत स्तरीय लेखन साहित्य में नहीं हुआ था। जिस समय यह उपन्यास लिखा गया है उस समय भारतीय हिन्दू समाज के भीतर वर्णाश्रम की जड़ता व्याप्त थी। ऐसे समय में निर्गुनिया के रूप में एक ऐसे पात्र की कल्पना करना जो जन्म से ब्राह्मण होकर भी एक भंगी युवक से न केवल प्रेम करती है बल्कि सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ते हुए उसके साथ भाग भी जाती है। उसके ब्राह्मण से भंगी बनाने की परिस्थितियों का भयावह वर्णन हुआ है।

‘ग़दर के फूल’ एक उपन्यास होने के साथ ही साथ इतिहास, संस्मरण, सर्वेक्षण, रिपोतार्ज के साथ ही एक विस्तृत कलेवर को अपने में समेटे है। नागर  ने 1857 के संघर्ष को इतिहास की पुस्तकों में खंगाला, कई पुस्तकालयों में उपलब्ध ग़दर सम्बन्धी सभी पुस्तकों को पढ़ डाला। घूम घूम कर अवध क्षेत्र की ख़ाक छानते रहे। लखनऊ ही नहीं उसके आस-पास सभी क्षेत्रों से भी सामग्री इकट्ठा करते रहे। बाराबंकी, गोंडा, सीतापुर, बहराइच, रायबरेली, सुल्तानपुर आदि जगह जाकर हज़ारों लोगो से बात-चीत की। इस तरह नोट्स लेकर यह उपन्यास रचा गया।

‘अमृत और विष’ उपन्यास की पृष्ठभूमि नेहरु युग की है। यह भी उनका वृहत्त्काय उपन्यास है। अमृत राय लिखते हैं कि ‘इस के विजन में भारतीय गणतंत्र के प्रथम पंद्रह वर्षों का पूरा परिदृश्य साकार हो गया है। इस के कथा संसार की एक विशेषता यह भी है कि यह लखनऊ के चौक तक सिमित न रहकर पुरे लखनऊ शहर में फैला हुआ है। लखनऊ की गलियों, चौराहों, मुहल्लों, नवाबी कोठियों बारादरियों आदि का ऐसा सजीव वर्णन और कहीं नहीं मिल सकता। लखनऊ में आई एतिहासिक बाढ़ का वर्णन पढ़ते हुए पाठक रोमांचित हो उठता है। बाढ़ पीड़ित लोगों की सहायता के लिए नवयुवक दल के साहस भरे प्रयत्नों का चित्रण भी बहुत जीवंत है। इसी प्रकार साम्पदायिक दंगों के वर्णन में भी उपन्यासकार नें गहरी संवेदना और अवलोकन क्षमता का परिचय दिया है। इस पृष्ठभूमि में एक बिगड़े नवाब के दयनीय और वीभत्स जीवन का चित्रण भी बेजोड़ है। नागर जी नें इस उपन्यास में एक साथ लखनऊ के शहरी मध्यवर्गीय जीवन और देश की समकालीन मूल्यहीन राजनीति का चित्रण किया है। सारस लेक की कथा की कल्पना इसी उद्देश्य से की गयी है। इससे उपन्यास का फलक बहुत व्यापक हो गया है।’

नागर का एक महत्वपूर्ण उपन्यास ‘खंजन नयन’ है। यह मध्यकालीन भारतीय इतिहास की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है, लेकिन फिर भी यह विशुद्ध एतिहासिक उपन्यास नहीं है। इसके साथ ही यह सूरदास के जीवन-चरित पर केन्द्रित होते हुए भी जीवन-वृत्त (बायोग्राफी या जीवनी) नहीं है। क्योकि नागर यह मानते है- ’एतिहासिक उपन्यास को विशुद्ध इतिहास माद लेना ठीक नहीं है। उपन्यास एतिहासिक, सामाजिक, नैतिक-अनैतिक भले ही किसी भी विशेषण से युक्त हो वस्तुतः वह उपन्यास ही होता है, केवल उपन्यास। यह दूसरी बात है कि किसी एतिहासिक काल-विशेष के चरित्रों का चित्रण करते समय लेखक उस काल की प्रमुख घटनाओं और नैतिक, राजनैतिक तथा सामाजिक, धार्मिक संस्कारों को भी चरित्रों के मनोनिर्माण में आवश्यक मानकर उन्हें समाहित कर लेता है।’  

खंजन नयन लिखने से पहले भी वैसी ही उथल पुथल और संघर्ष उनके मन में था। एक विराट कल्पना के सूत्र इधर-उधर बिखरे हुए थे। उनके भीतर ही भीतर विषय पक रहा था। जब लिखने का समय आया तो महीनों मथुरा और वृंदावन गलियों में घूमते रहे। उनकी पुत्री अचला नागर नें अपने संस्मरण ‘मेरे बाबू जीः यादों की पुरवाई’ में लिखा है कि ‘मथुरा आकर वह रास्ते की धूल लपेटते फिरते.. उनके बृज की रज में अंटे, मटियाले हो चुके कपडे दिखे  धूल-भरे सूजे पाँव, लेकिन जैसे ही मेरी आँखें उनके खिले-खिले मुख, चमकती, सुनहरी पुतलियों से मिली, लगा उनसे मुझ तक कुछ तरंगे आ रही है। वह नीचे से बोले ‘बुड्ढो मिली गयौ बेटा, हवै कृष्ण जन्म-स्थान माँ म्हारो लिखवा नो प्रबंध करी दै। (बूढा यानी सूर मुझे मिल गया है। अब जन्म स्थान में लिखने का इंतजाम कर दो)’ फिर श्रीकृष्ण जन्म स्थान के अतिथि गृह में उन्होंने डेरा जमा लिया। अब वह थे और उनके साथ ‘झुर्रियों भरे मुख वाले सूर बाबा’ थे।

नागर की कृतियों की विशेष बात होती थी उसकी विषय वस्तु पर उनके द्वारा किया गया शोध। एक तरह से वो उपन्यासों के माध्यम से हमारे कई सौ सालों का सामाजिक इतिहास लिख रहे थे। प्रोफेसर एस पी दीक्षित नें कहा है कि- ‘मैंने ये पाया कि वो होमवर्क बहुत करते थे। किसी भी ऐतिहासिक कथा को लिखने से पूर्व वो पचासों पुस्तकें पढ़ते थे। उनसे नोट्स बनाते थे और इससे भी बड़ी बात जिस घटना को वो लिख रहे होते थे, वहीं जा कर वो बस जाते थे।’ उदाहरण के लिए जब वो खंजन नयन लिख रहे थे तो ढ़ाई तीन महीने वो मथुरा में, वृंदावन में, पारसौली में किराए का मकान ले कर रहे। एक बार जब वो बृज से लौट कर आए तो मैंने उनसे पूछा बाबूजी इन दिनों क्या चल रहा है तो उन्होंने कहा डाक्टर अंधा उंगली नहीं पकड़ने दे रहा है। उनका कहने का तात्पर्य था कि जब तक पात्र भीतर स्पंदित न हो, खुद न बोले तब तक वो चरित्र जीवित नहीं होता है।’

इस सन्दर्भ में पूरे इतिहास और संस्कृतियों को खंगालना आसान नहीं था। ‘खंजन नयन’ की पृष्ठभूमि बताते हुए वह स्वयं कहते हैं- एक बार खंजन नयन की रचना से पहले सारा इतिहास पढ़ा। उसके नोट्स बनाए। सूरसागर भी पढ़ाद्य उससे सूर के चित्र मन में आने लगे, कैसे वे वर्णन कर रहे हैं, कैसे वे कहते हैं कि  मै जूझुंगा, टरुंगा नहीं। इससे उनके मन के विभिन्न मूड कुछ खुलते हैं। यह देखते हुए जब इतिहास को और उनके निजी चरित्र को एक साथ में लेता हूँ तब कहीं कहानी बनने लगती है। तो इसमें यह ज़रूर हुआ कि पहले इतिहास को मुझे जमकर पढ़ना पड़ा, नहीं तो रास्ता ही नहीं मिल रहा था। उस बहाने खूब पढ़ाई हुयी सत्रह अट्ठारह बरस तक उस सब्जेक्ट के पीछे रहे, लिखा बहुत बाद में।’ (अज्ञेय से साक्षात्कार में)

कहने का मतलब यह कि जिस भी प्लाट को वह चुन लेते थे उसे विभिन्न दृष्टियों से निरखते-परखते और शोध करते थे। चाहे वह ‘खंजन नयन’ हो या ‘मानस का हंस’। ‘मानस का हंस’ लिखना भी उनके लिए भी उनके लिए बहुत आसान नहीं रहा। महीनों अयोध्या में ही चिंतन-मनन करते रहे तुलसी की सभी रचनाओं को आत्मसात कर लिया तब उस कथानक उपन्यास का रूप दे पाए। यह रचना भी वृहत्त्त शोध के बाद ही लिखी जा सकी।

वह स्वयं इस बात को ‘मानस का  हंस’ की भूमिका स्वीकार करते हुए कहते हैं कि ‘मानस का हंस’ उपन्यास को लिखने से पहले मैंने ‘कवितावली’ और ‘विनयपत्रिका’ को ख़ास तौर से पढ़ा। ‘विनयपत्रिका’ को ख़ास तौर से पढ़ा। ‘विनयपत्रिका’ में तुलसी के अन्तास्संघर्ष के ऐसे अनमोल क्षण संजोये हुए है की उसके अनुसार ही तुलसी के मनोव्यक्तित्व का ढांचा खड़ा करना मुझे श्रेयस्कर लगा। ‘रामचरित मानस’ की पृष्ठभूमि में मानसकार की मनो छवि निहारने में भी मुझे ‘पत्रिका’ के तुलसी ही से सहायता मिली। ‘कवितावली’ और ‘हनुमान बाहुक’ में ख़ास तौर से और ‘दोहावली’ तथा ‘गीतावली’ में कहीं-कहीं तुलसी के जीवन की झांकी मिलती है।’

इसी प्रकार उनके उपन्यास ‘करवट’ और ‘पीढियां’ के प्लाट भी बहुत विस्तृत हैं। इनका कथा क्षेत्र भी व्यापकता लिए हुए है जो कलकत्ता से बम्बई तक फैला हुआ है। ‘करवट’ में एक परिवार की तीन पीढ़ियों की कथा के माध्यम से लगभग 1805 से 1905 तक के इतिहास और समाज को कलात्मक रूप से संजोया गया है। इसमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद के परिणामस्वरूप तत्कालीन सामंती व्यवस्था का नग्न यथार्थ तो है ही साथ ही सामाजिक परिवर्तन की रूपरेखा भी दिखाई देती है। ‘पीढियां इसका अगला भाग है, इसमें भी एक लम्बी समयावधि को कथा में बांधा गया है।

एक ओर ‘सुहाग के नुपुर’ दक्षिण भारत की प्रेम कथा पर आधारित है वहीँ दूसरी ओर ‘ग़दर के फूल’ है जो 1857 के ग़दर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। ‘शतरंज की मोहरें’  भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की पूर्वपीठिका पर लिखा गया है। इसे ‘ग़दर के फूल के पहले की कड़ी माना जा सकता है क्योकि इसमें ग़दर के लगभग दो दशक पहले की घटनाओं को सूत्रबद्ध कर कथा में पिरोया गया है। ‘सात घूँघट वाला मुखड़ा’ में एक एतिहासिक कथानक है जिसमें अवध के नवाबी सामंतवाद का एतिहासिक यथार्थ चित्रित है। यह उपन्यास भारतीय नवाबों की नवाबशाही का यथार्थ चित्रण करता है। इसका फलक भी वृहत्त है। ‘एकदा नैमिषारण्ये’ पौराणिक कथानक पर आधारित उपन्यास है जिसमें चन्द्रगुप्त प्रथम और उनके पुत्र समुद्रगुप्त की तत्कालीन सांस्कृतिक प्रसंगों को कथा का केंद्र बिंदु बनाया गया है। नागर का समग्र उपन्यास साहित्य इस बात का गवाह है कि कथा के सूत्र चाहे किसी भी पृष्ठभूमि के हो नागर की कलम रूपी कूची उसे भली-भांति उकेरना जानती है। उनका सम्पूर्ण लेखन इसका प्रमाण है। ज्योतिष जोशी ने नागर के उपन्यासों की पड़ताल करते हुए लिखा है कि- ‘नागर नें हिंदी उपन्यास को भारतीय शिल्प में विकसित किया और उसके विन्यास में सामाजिक तथा मानवीय विमर्शों को संभव किया। आख्यान के देसी ढब को देखें या चरित्रों के सहज भारतीय बाना को, नागर जी नें अपने उपन्यासों को भारतीय शिल्प के ताने-बाने में ढाल कर पश्चिमी ढ़ंग के औपन्यासिक ठाठ को चुनौती दी। यह अलग बात है कि इसके बाद भी उपन्यास में ‘पश्चिमी फॉर्म’ की बहस चलती रही और अधिकतर विमर्शकारों नें नागर जी के उपन्यासों के देसी रूप को समझने की चेष्टा नहीं की। कथानक, किस्सागोई और संस्कारों में ढले भारतीय मन का निरूपण तथा हार्दिकता के भावों का समंजन जैसा और जिस तरह का नागर जी नें अपने उपन्यासों में किया, उसकी मिसाल कम-से-कम हिंदी में खोजना मुश्किल है। नागर के लेखन का विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उन्होंने विषय का कभी भी दोहराव नहीं किया। इतना वृहत्त स्तरीय लेखन, लेकिन हर बार विषय की परिवर्तनशीलता उनकी अनूठी विशेषता है।

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