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ग़ज़ल—यहाँ आदमी मुक़म्मल कहाँ मिलता है

कभी ख़ाक तो कभी धुआँ मिलता है यहाँ आदमी मुक़म्मल कहाँ मिलता है चारासाजों की बातों में बहुत पहले था,…

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