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शालिनी मोहन की दस कविताएँ

(1.) मौन
मौन
सघन वन में
अनाम वनस्पति होता है

शब्द
न ओस बनते हैं
न फूल

(2.) टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
कुछ टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें दीवार पर
उस बच्चे ने खींची हैं
रंगों का सारा इन्तज़ाम
उम्र भर का
वो दीवार कभी बेरंग नहीं होगी
न लकीरें टूटेंगी न उलझेंगी
एक पगडंडी होगी
कई सालों बाद

(3.) तुम जरूर रोना

जब पहाड़ जैसा दुख
कलेजे पर आ बैठता है
अंधकार धूप सोख-सोख
दुख को हरा रखता है

पहाड़ जैसे दुख को कलेजे पर उठाये
तुम रोना, जरूर रोना
वैसे ही रोना
जिस तरह भी तुम चाहो, तुम्हें अच्छा लगे
छाती पीट-पीट, दहाड़-दहाड़
सबके सामने, अकेले में छुप-छुप
हाथ-पैर पटक-पटक, देह को छोड़
तुम रोना, जरूर रोना

दुख को व्यक्त करने की
उतनी ही आजादी है
जितनी कि खुशी को
इसलिए अपने कठोर दुख, असह्य पीड़ा को
एक छोर से दूसरी छोर तक नाप
तुम रोना, संतुष्टि भर रोना
और जब रोते-रोते तुम्हारी आँखें सूनी हो जाये
सारे खारे पानी को
उलीचना अपने कलेजे पर
कि गीला रह सके कलेजा
और दुख बना रहे हरा
तुम रोना, जरूर रोना

किसी भी दिन जब टाँगना
अपना कलेजा खूँटी पर
अपनी सूनी आँखों से
कहना सावन भादो को
कि जब आये
दे जाये तुम्हारी आँखों में
एक बूँद पानी

तुम रोना, जरूर रोना

(4.) किसान
एक ज़मीन को
कितने टुकड़ों में बाँटा जा सकता है
जानता है वह
वह किसान है
दरारें अब नहीं खटकतीं
उसकी आँखों में
हर बीज लोहे से टकरा
जब बजता है
तब धरती केे कलेजे को
झाँक सकता है वह
पूरी नाव बन जाती है
उसकी टोकरी
बहुत चिल्लाते हैं फसल
उसकी आशा और आँसू
टक गये हैं इन्द्रधनुष पर
घर, कर्ज़ और बेटी पर
बहुत रोता है
सरकार को नहीं जानता
इसीलिए आंदोलन की लाठी लिए
कोसता है खुद को
कि वह, किसान क्यों है

(5.) सड़कें
सड़कें कितनी लावारिस होती हैं
बिल्कुल आवारा सी दिखती हैं

बिछी रहती हैं, पसरी रहती हैं, चलती रहती हैं
कभी सीधी, कभी टेढ़ी-मेढ़ी तो कभी टूटी-फूटी
कहीं जाकर घूम जाती हैं, कहीं-कहीं पर
जाकर तो बिल्कुल ख़त्म हो जाती हैं
चौराहे पर आपस में मिल जाती हैं सड़कें

कौन होता है इन सड़कों का
कोई भी तो नहीं होता है
कोई होता है क्या
रोज़ाना कुचली जाती हैं पैरों और गाड़ियों से
देखती हैं कितने जुलूस, भीड़, आतंक
सहती हैं खून-खराबा और कर्फ्यू
खाँसती हैं धुएँ में और खाँसते-खाँसते
सड़कें बूढ़ी हो जाती हैं, तपती हैं तेज़ धूप में
बारिश कर देती है पूरी तरह तरबतर
ठिठुरती हैं ठंड में और गुम हो जाती हैं कोहरे में

सुबह से शाम, शाम से रात और फिर रात से सुबह
सड़कें होती हैं, अकेली, चुपचाप, ख़ामोश
सच तो यह है कि
यही सड़कें कितने ही बेघर लोगों का घर बन जाती हैं
सड़कें कभी सुस्ताती नहीं
भीड़ में और भीड़ के बाद भी रहती हैं ये सड़कें

(6.) सादगी
सादगी को
जब छुओगे तुम
तुम्हारे हाथ आएँगे ढेर सारे रंग
सब अलग-अलग

टेढ़ी-मेढ़ी, टूटी-फूटी रेखाएँ
उभर कर, स्पष्ट दिखने लगेंगी

किसी एक दिन
जब तुम्हारा दिमाग़ बिल्कुल ऊब चुका होगा
सोचने, पहचानने और समझने की अधिकता से
सादगी, तुम्हारे पीछे खड़ी होगी
नंगे पैर

(7.) पिता
पिता को
बूढ़ा होते देखना
उदास करता है, दु:ख देता है

एक पिता
कभी बूढ़ा नहीं होता

पिता
आसमान होता है
जिसके नीचे बैठ
हम तारे देखते हैं

(8.) मंदबुद्धि
किताबों की ढेर के
बीच से खींची हुई
एक मनपसंद किताब
और ढेर से गिरी, फैली
कुछ किताबें
कविता और कहानी के मध्य
महीन रेखा को
दर्शाती ​हैं
उनके आवरण पर
ऋतुएँ अपना नाम
लिख जाती हैं

(9.) रोटी
आदमी
हमेशा भीड़ के पीछे
नहीं भाग सकता
रोटी के पीछे
भागता है
क्योंकि दुनिया नहीं
रोटी गोल है

(10.) सुनो वक़्त
सुनो वक़्त
एक दिन तुम्हारे जवान दिल को
निकाल कर फेंक दूँगी समन्दर में
फिर क़ैद कर के तुम्हें
एक शीशी में
गिनूँगी तुम्हारी छोटी-छोटी साँसें
और बड़े-बड़े अहसास
बोलो, मंज़ूर है

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