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अनिला राखेचा की पाँच कविताएँ

1.
मेरी बातें
कफन मत पहनाना अभी, दफन नहीं होना चाहती मेरी बातें…
जीनी है उसे तुम संग जाने, कितने दिन और कितनी रातें…!

कभी अमावस कभी पूनम कभी तारों की बारात हैं बातें,
हरी घास पर ओस की बूँदें, इन्द्रधनुषी सतरंगी बातें…!
कभी थमी कभी जमी कभी दरिया सी बहती हैं बातें,
पलकों की कोरों से गिरकर, किस सागर से मिलती हैं बातें…!

फूलों सी खिल जाती है जब होठों पे सज जाती है,
मन की खुशबू बन कर ये जीवन को महकाती हैं…!
कभी लगे नवजात शिशु सी, कभी यौवन अपना छलकाती है,
कभी बेबस लाचार बन ये, किसी अबला की याद दिलाती है…!

बाणों की औकात कहा जब, तानों में तब्दील हो जाती हैं बातें,
शब्दों का लावा बन कर, ज्वालामुखी बन जाती है बातें…!
तपते रेगिस्तानी तन पर, सावन-सुकून बन बरसती हैं बातें,
दिल पर पड़े हुए जो छाले, कभी उनका मरहम बनती है बातें…!

यहाँ-वहाँ, इधर-उधर की, कुछ नई-पुरानी बीती बातें,
हाँ-तुमसे करनी है मुझको, अपने ख्वाबों की हर बातें…!
तभी तुम्हीं से कहती हूँ कफन मत पहनाओ
दफन नहीं होना चाहती मेरी बातें,
जीनी है उसे तुम संग जाने, कितने दिन और कितनी रातें..!!

2.
रेखांकन
खुली किताब
और
खुली कलम
रचते रहे रात भर
प्रेम के अशआर
नज़्में
और उसे
रेखांकित करती
मेरी कलम
रात भर…!

मगर मैं तो सो गयी थी
आँखों में ख्वाब भर!

हुई भोर जगी तमन्ना
एक आस, एक उम्मीद…!

बस…
इसी तरह तुम भी
रेखांकित कर जाओ
कभी
ज़िंदगी मेरी भी!

3.
आओ के पास बैठे
आओ के पास बैठे
सौंपे एक दूजे को हाथ
और साँझा कर ले हम अपने
दिन वार महीने ग्रह नक्षत्र
तारे सितारे तीज त्यौहार
ताकि फिर कोई सत्तारूढ़
खुद का अस्तित्व बचाने को
न चिनवा पाए बीच हमारे चीन की दीवार।

आओ के पास बैठे
दे सहारा एक दूजे के हाथ
और बाँट ले हम अपनी
वो रोटियाँ जो दबी है काँख में
वो नमक जो छिपा है आँख में
और चखे मिलकर उनका स्वाद
ताकि फिर कोई मज़बूरी
न ओढ़ा पाये कत्ल कर
धरा को लाल उत्तरीय हार।

आओ के पास बैठे
थामे एक दूजे का हाथ
और ताके हम दूर उफक के पार
जहाँ प्रस्फुटित हो रहा है हमारे
स्पदंन का अंकुर
घुलमिल रहे हैं हर रंग जहाँ जीवन के
गहरे बहुत गहरे किसी असमानी पैल्इट में
ताकि फिर किसी प्रेमिल पर
कोई संस्कार कर न पाये प्रहार।

आओ के पास आओ
ऐसा कोई कुदाल चलाओ
कि बोये हम एक दूजे के अधरों पर
मुस्कानों के बीज
और उगाये फसल खुशियों की
फिर परचम सा लहराये उसे सारे जहान में
और सौंप दें नवांकुर को हम एक नव विहान रे
आओ के पास बैठे
आओ के पास बैठे
आओ के…

4.
शब्दों का  रुदन
क्या तुमने शब्दों का रुदन सुना
दु:ख ने शब्दों को कारागार में डाल दिया है
और नजरों को नजरबंद कर दिया है
ताकि वे आँसुओं के सैलाब से न मिल सके
लबों की हालात पर मुस्कान भी
आज हँसी उड़ा रही है
यह देखो जिंदगी किस दिशा में बह रही थी
आज यह किस दिशा में बहे जा रही है

कर्फ्यू लग गया है बीती यादों पर भी
उनका दिले-आँगन से
बाहर निकलना है मना
खोज-खोज कर मार रही है उन्हें
तुम्हारी बेरुखी की सेना
जज्बातों के जिस्म जो हमने
अपने दिल में खड़े किए थे
उनके सपनों के धागों में देखो
जिंदगी उलझती जा रही है
किस दिशा में बह रही थी जिंदगी
आज यह किस दिशा में बहे जा रही है

आज व्यथित बहुत तो है मेरा मन
फिर भी उठा ली है देखो कलम
पर कहाँ कुछ भी रच पा रही हूँ
ऐसा क्यूँ हो रहा है कहाँ समझ पा रही हूँ
व्यथा की गाथा लिखते-लिखते
आज कलम भी खुद का सर
कलम कर आ रही है
ये जिंदगी किस दिशा में बह रही थी
आज किस दिशा में बहे जा रही है?

5.
नहीं खिले आज
फ़्लावर पॉट में फूल
सो भेज दी अपनी तस्वीर?!
तुम्हीं ने तो कहा था एक रोज़
कि मेरा चेहरा फूल सा खिला रहता है!

इसी तरह आ जाऊँगी
मैं ख़ुद भी
किसी रोज़ तुम्हारी ज़िंदगी में
संघमित्रा की तरह प्रेम का अशोक वृक्ष लिए!

1 Comment

  1. हार्दिक धन्यवाद संदीप जी.. सहित्यकी डॉट कॉम पर हमारी कविताओं को मान देने के लिए। साहित्यकी डॉट कॉम के सुधी पाठकों से हमें रूबरू कराने के लिये। ??

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