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ऋचा की तीन कविताएँ

01.
वक्त वही है, लम्हें वही है
ठहरे सब ख्यालात वही है
कहते हैं कुछ हुआ नया है
हम कहते हैं हालात वही है

मौसम का रुख पहले जैसा है
हवा का जायका भी नहीं बदला
हाँ बेशक तारीखों का कुछ
पन्ना जरूर है पलटा

चेहरे वही पुराने हैं
बस खुशियाँ नई सी आई हैं
बढ़ गया न जाने ज़माना कहाँ
जहाँ रुके हैं हम, वो किरदार वही है

बिखर गया सब पर साथ वही है
बिन बोले समझे वो बात वही है
कहते हैं बदल गया है नज़रिया, हाँ
बेबाकपन है, पर ज़ज्बात वही है

02.
तेरे इस मुस्कान के पीछे की उदासी देखी है मैंने
तेरी इस खुशी के पीछे आँखों की नमी देखी है मैंने
तेरे इस शांत चेहरे के पीछे आवारगी देखी है मैंने
तेरे अश्कों के लफ़्ज़ों में दिल की खामोशी देखी है मैंने
तेरे घर को टूटकर फिर से मकान बनती जिंदगी देखी है मैंने
इन उड़ते हुए लम्हों के पीछे यादों की बदिंशे देखी है मैंने…

तेरे इस बैचेनी के पीछे, चैन की आहट देखी है मैंने
तेरे खामोश अल्फ़ाज़ों में, शब्दों की सुगबुगाहट देखी है मैंने
तेरे तमस के दरवाजे के पीछे, प्रभा की खिड़की देखी है मैंने
इन धुधँले नयन में, आशा की चमक देखी है मैंने
यकीनन आसान नहीं है पार कर जाना, तू बस कदम तो बढ़ा
इन शिथिल हाथों में, जीतने की ललक देखी है मैंने
इस नफ़रत की ज्वाला में, प्रणय की शीतलता देखी है मैंने…

03.
दो मुठ्ठी चावल को
माँ के आँचल में सिमटते देखा
बाहर खाना देखकर
बच्चों के पेट को तपते देखा
आँखों में बेचैनी लेकर
झोंपड़ी में माँ को आते देखा
हाथों में चावल की थैली से
बच्चों को संतुष्ट होते देखा
चूल्हे के धुँए से आज
खुशी के अश्क को छलकते देखा
कौन कहता है कि पिता
ही सर पर रखते हैं छत
आज एक माँ की हथेली
को ढाल बनते देखा
माँ के नक्शे कदम पर
बच्चों को है चलते देखा
थाली में आया उबला चावल
सबको आपस में नज़रे मिलाते देखा
कौर उठाकर बढ़ाया माँ की ओर
आज परवरिश को रूप लेते देखा।

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