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विभव भूषण की चार ग़ज़लें

1.
क्यों ये सूखे हुए पत्ते मुझी से लगते हैं
पाँव की ज़ेर, खरकती जमीं से लगते हैं

वो इशारे, वो भुलावे, वो सादगी, वो फरेब
मेरे दिल को, दुआ की दवा से लगते हैं

फासले हैं, एक हद तक तो उन्हें रहने दो
प्यार या मौत मुझे एक ही से लगते हैं

ये सितारे, चाँद-सूरज और सुलगते जुगनू
जब भी देखूँ तो मुझे आप ही से लगते हैं

क्या कहें आपको ये कौन बताए मुझको
कुछ भी कहने को, अल्फ़ाज़ कम से लगते हैं।

2.
यार शहरों में कहाँ उनका मकाँ रहता है
जिनके पैरों तले ही सारा जहाँ रहता है

आँधियाँ जब कभी महलों से हार जाती हैं
जीतने के लिए झुग्गी का पता रहता है

अपने कंधे पे उठा लेता है, घर अपना
कोई मजदूर किसी घर में कहाँ रहता है

मैंने रोते हुए लोगों के लबों से जाना
भूख का लाम कलेजे में धँसा रहता है

एक शायर ने कहा लोग मुनासिब हैं बहुत
मैं ये कहता हूँ सफर किसका भला रहता है

वो जो बच्चे को आँसू पिला के पाल रहा
उसे न कहना कोई, उसमें खुदा रहता है।

3.
बुरा क्या जो कुछ भी सनम पूछते हैं
वो आलिम हैं अहले करम पूछते हैं

उन्हें हमसे दरकार क्या जानने की
जो सब जानते हैं वो कम पूछते हैं

क़फारा हमारा भला क्या हो साहिब
मोहब्बत से अक़्सर ये हम पूछते हैं

वो क्यों मुझसे पूछें, मैं क्या कुछ बताऊँ
मेरा ग़म है, क्योंकर वो ग़म पूछते हैं

बहुत नागवारा है उनका ये कहना
मिलोगे मुझे किस जनम? पूछते हैं

अगर जाँ छुड़ाने को चुप हो के बैठूँ
तो देकर के अपनी कसम पूछते हैं

मेरी जान उलझन सी अटकी हलक में
वो मुझसे मेरा सब भरम पूछते हैं।

4.
दिल में कोई लावा दहके आंखों में जब पानी है
तब लगती है दुनिया झूठी और ग़ज़ल बेमानी है

फिक्र की कितनी ही दीवारें बन जाती थीं माथे पर
अब तो रंग फकीरी कायम बाकी बात पुरानी है

भूख की सूरत किसने देखी, कोई तो बतलाओ ना
मैं कहता हूँ आग के जैसी, इसमें क्या हैरानी है

कौन मोहब्बत में अब जाकर, चंदा, तारे लाएगा
पलकों से अंगार उठाने में खालिस नादानी है

फूँक दो पालें, फेंक दो चप्पू, जब धारा ना चीर सको
पार की दुनिया सागर से भी कहीं अधिक तूफानी है

उनसे हाथ मिलाओ जिनको कोई झूठा खौफ नहीं
दूर रहो उन सब से जिनकी, फितरत ना-फरमानी है

दीवाना हूँ मैं उनका जो मुश्किल को आसान कहें
जो सूली को बिस्तर कहते, उनपर फिदा जवानी है।

5.

फिर तिरे इश्क़ में हम ख़ता कर गए
तुम हुए बेवफा, हम वफ़ा कर गए

दे गए प्यार से, कुछ नज़ाकत से वो
और हम उस ज़हर को दवा कर गए

दिल की उम्मीद की आग बुझ सी गई
अश्क़ भी अपने हक़ सब अदा कर गए

वो सर-ए-राह सर पर बरसने लगे
हम जो इन पत्थरों को खुदा कर गए

फर्क था एक ही इश्क़ के दरमयाँ
रह गए ख़ाक हम, तुम हवा कर गए

6.
आपकी रुसवाईयाँ क्या जान लेकर जाएँगी
ये कोई आँधी हैं क्या जो सब उड़ाकर जाएँगी

पाँव मेरे इस मोहब्बत की जमीं में जम गए
हिज्र की वो दरातियाँ, दम आजमा कर जाएँगी

इश्क़ की दहलीज पर ही धर दिया है मैंने सर
अब तो सब बेमोल है वो क्या ही लेकर जाएँगी

मुझको मेरी हद बताने आ रही हैं तो सुनें
मेरी हद अनहद सी है, वो क्या बताकर जाएँगी

हैं अगर सैयाद वह तो मैं कोई बुलबुल नहीं
कैद करने की खलिश, पिंजरा उठाकर जाएँगी

हम नहीं हैं आपके यह भी हमें मालूम है
हम नहीं वो दाग जिससे जाँ छुड़ाकर जाएँगी

एक कतरे की तरह ही मेरा सब सैलाब है
आपकी लहरें उठीं तो सब मिटाकर जाएँगी।

1 Comment

  1. आदरणीय संजीव जी को हृदय से आभार ? आपने मुझे इस मंच पर अवसर दिया इसके लिये मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ।

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