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क्षणिकाएँ

1. आंखों में दिख जाएगा छुप नहीं सकते तुम खुद अपने आप से, निगाहें तो मिलाओ दर्पण में जनाब से!…

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कविता—दस्तावेज

दबे पांव तृष्णाएं घेर लेती हैं एकांत पा, विचारों की बंदिनी बन असहाय हो जाती है चेतना। अवचेतन मन घुमड़ने…

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