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प्रज्ञा मिश्र की तीन कविताएँ

भीष्म प्रतिज्ञा सोचा एक प्रतिज्ञा कर के अब मैं उसको भीष्म करूँ जग चाहे मनुहार करे कुल प्रतिज्ञा की रक्षा…

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