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अंचित की तीन कविताएँ

सफ़ूरा के लिए
कोई अख़बार की चर्चा करता है तो
खाने में क्या बना है देख लेता हूँ.
कोई मज़दूरों की चर्चा करता है तो
सोचता हूँ घर में रोगन करा लेना चाहिए
कोई सरकार की चर्चा करता है तो
फ़ेसबुक पर लिखता हूँ कि
हमें ख़ुश रहने पर ध्यान देना चाहिए
कोई कहता है कि देश में महामारी है
मैं राजेश खन्ना को याद करता हूँ
—ज़िंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है
कोई कहता है
इसका फ़ायदा उठा कर
वो लोग आवाज़ उठाने वाले लोगों
को जेलों में भरवा रहे हैं
मैं कुछ नहीं कहता.
मैं जानता हूँ.
जो बोलेगा,
इस लोकतंत्र में वही अपराधी होगा.

सब चुप रहें
अच्छा यही होगा.
कोई एक अपंगता चुन लें कम से कम—
और सरकारी रेखा से एक फ़ुट अन्दर रहें.

कानून अँधा है
ये सत्तर की फिल्में सिखा गयीं हैं,
झंडे शोर करते हैं ये हम सन बानबे से जानते हैं
संविधान दरअसल लूडो के बोर्ड पर पटका हुआ पासा है
ये किसी के सिखाने बताने की चीज़ नहीं है.
सो, चुप रहें.

बिलावजह सही को सही ना बोलें
बहुत बोलना हो, तो देश की जय बोलें
चुप रहें और खैर मनाएँ कि आप ऐसे बकरे हैं
जिसकी माँ अभी तक सुरक्षित है.

कविता
क्योंकि रातों के पास
नींद घट गयी थी
क्योंकि एक लड़की ने
मेरे लिए दुआएँ पढ़नी शुरू कर दीं

क्योंकि पैदल चलते हुए
अकेलापन खटकने लगा था बहुत ज़्यादा
क्योंकि बहुत जमा हो गया था
यादों में मवाद
क्योंकि भूख भी रहने
आ गयी मेरे देस
क्योंकि मेरी क़मीज़
पर भी ख़ून के छींटे मुझे दिखने लगे
क्योंकि मुझे लगा कि
अँधेरे रुकेंगे मेरे पास

इसीलिए
जब कविता आई मेरे पास
मैंने कहा, ठहरो!

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