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डॉ. उर्वशी भट्ट की चार कविताएँ

बोध
मैं बहुत रोना चाहती हूँ
उन तमाम गलतियों के लिए
जिनकी अपराधी
मैं स्वयं हूँ

हालाँकि,
आक्षेप मुझे कुछ देर मुक्त कर देते हैं
स्वयं के अपराधबोध से
पर कहीं ना कहीं
बहुत गहरे
कचोटती है अंतर अनुभूति कि
मैं निष्पक्ष नहीं रह सकी
स्वयं के साथ

मेरी ग्लानि की परिणति
आत्महत्या नहीं हो सकती
कोई प्रार्थना मुझे
मुक्त नहीं कर सकती
सभ्य विक्षिप्तों की
खिंची परिधि में
मेरा आत्म क्षत-विक्षत हो गया,और
लक्ष्य शून्य हो गया

मैं जीवन तलाशती रहती हूँ
पीड़ा की तीव्रता मेरे हृदय में
किसी कीड़े की मानिंद
रेंगती है
जिससे घायल
मेरा चैतन्य सुप्त पड़ा है
और इस तरह
मेरी मृत्यु
और मुक्ति
के बीच
फासला बढ़ गया है…!!

अपमान
जब प्रथम बार
तमाचा लगा था
मेरे गाल पर
मेरे चेहरे का दायाँ हिस्सा
दर्द की हरारत से भर गया , और
आँखों के आगे
क्षणिक अँधेरा पसर गया…

मैंने हिकारत से अपनी
परवरिश की तरफ दृष्टि घुमाई
मुझे समझ आया कि
एक स्त्री संस्कारों के नाम पर
किस तरह तैयार की जाती है
ऐसे अप्रत्याशित अपमान को
निगलने के लिए

दुर्भाग्य है ,
जब किसी स्त्री को पीटा जाता है
तो घरों में
इतनी ही हलचल होती है, जितनी
पानी में बुलबुले उठने पर होती है

मैं घंटों बंद दरवाज़े से सट कर
बैठी रही
उन असंख्य स्त्रियों की चीखें
मेरी चेतना में गूँजती रही
जो जला दी गयी
अथवा
मार दी गयी थी

मुझे मेरा अपराध ज्ञात न था ,पर
अपराधी ज्ञात था
मैं हतप्रभ थी
किसी भी पवित्र पुस्तक में
इस कृत्य को
जघन्य अपराध नहीं माना गया

मेरे अपमान की तीक्ष्णता बहुत गहरी है
पर, मेरा किसी से कोई प्रश्न नहीं है
यह पात्रहीनों का
श्रापित समाज है
जहाँ असंख्य नपुंसक
‘पुरुष’ शब्द से
संबोधित किये जाते हैं

प्रेम
मैं नहीं जानना चाहती
कैसा होता है प्रेम
तुम्हारे शब्दों से
तुम्हारी अनुभूतियों से
इसीलिए जब कभी तुम
कहना शुरू करते हो
‘प्रेम’
मैं तुम्हारे मुख पर
अपनी हथेली
ढाँप देती हूँ

मैं नहीं पढ़ती हूँ कभी
‘प्रेम’
किताबों, कहानियों
अथवा जीवनवृत्त के
पन्नों पर
किसी भाव पर
कोई क्षणिक आवेग
उद्वेलित करता है, फिर
मैं भूल जाती हूँ शब्द

मैं नहीं पार करती हूँ
प्रेम रस से भीगी
सत्य घटनाएँ , मिथकों की
आड़ी-टेढ़ी गलियाँ
इन पर सोचते हुए
अक्सर राह
भटक जाती हूँ

मुझे करने दो
स्व अनुभूतियों के
विलक्षण सौंदर्य से भरपूर
हिमशिखरों की यात्रा
मुझे देखने दो
देह में उतरती
चेरी के गुलाबी फूलों की
रक्तिम आभा
और मुझे ही
निवेदित करने दो
कि मैं तुमसे

प्रेम करती हूँ
अगाध!

शुभेच्छा
रोज़ तुम्हारी प्रतीक्षा के पल
गुज़र जाते हैं मेरे भीतर
एक उम्र बिताकर

मुझे रंज नहीं है तनिक भी
समिधातुल्य आहूत होती
मेरी अभिलाषाओं का
मुझे मोह भी नहीं है
उतप्त तरल सी
पल पल पिघलती देह का

पर प्रिय!

मेरी अंजुरीभर प्रार्थना का क्या होगा
कि मेरे ललाट का सौन्दर्य
तुम्हारे चरण रज से विभूषित हो
तुम्हारी प्रदीप्त प्रज्ञाग्नि के आलोक में
मेरा अभीष्ट मुझे प्राप्त हो
इस पुनीत शुभेच्छा का क्या होगा

तुम आओगे ना!

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