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हिंदी लेखन, विचारधारा और इतिहास बोध

सत्यमित्र दुबे* 1. पिछले दो तीन दशकों के हिंदी लेखन पर नजर दौड़ाने से यह बात स्पष्ट होती है कि…

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‘विश्वगुरु भारत’ की स्वप्नद्रष्टा : एनी बेसेंट

सन् 1893 में एनी बेसेंट ने थियोसाफिकल सोसाइटी का नेतृत्व अपने हाथों में लिया। उन्होंने सन् 1898 में काशी में…

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एक भारतीय कम्युनिस्ट की आत्मकथा

किसी पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है, हम सहसा इतिहास के ऐसे ‘चौराहे’ पर चले आए हैं, जहाँ से हमारी…

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प्रेमचंद साहित्य को समग्रता में ग्रहण करें

लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि (8 अक्टूबर) पर विशेष आलेख किसी भी उदार, गतिशील एवं जागरूक समाज में विमर्श…

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भाषा पर हावी क्षेत्रीयता का ऐतिहासिक सच

भारत एक बहु भाषा-भाषी देश है जहाँ चार सौ से भी अधिक भाषाएँ बोली जाती है लेकिन सबसे ज्यादा बोली…

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साहित्य की आत्म-सत्ता

साहित्य को लेकर चिंताएं फिर बढ़ने लगीं हैं। भूमंडलीकरण और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के कुहरीले घटाटोप में उसके स्वरूप के दबने,…

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भारतीय राष्ट्र के बोध का स्वरूप

राष्ट्र – राज्य की अवधारणा में मुख्य बात है भूमि की पवित्रता का भाव और वहां पर रहने वाली जनता…

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प्रौद्योगिकी ने दी है हिंदी लेखन को शक्ति

साहित्य और मीडिया की दुनिया में जिस तरह की बेचैनी इन दिनों देखी जा रही है। वैसी पहले कभी नहीं…

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हिंदी कविता की दुर्दशा के दोषी हैं वामपंथी साहित्यकार

आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक अपनी विकास-यात्रा की सहस्त्राब्दी पूरी कर चुकी हिंदी कविता के भाव, भाषा और शिल्प…

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