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सूरज सरस्वती की पाँच कविताएँ

1.
दुःख का दोआब
हमारी पीढ़ी
लोक देवताओं से माँगी मनौती से जन्मी है
जब दुनिया की रूप-रेखा बदल रही थी तब
हमारे माता-पिता किसी पहाड़ी पर विराजित
प्रतिमा को स्पर्श करने के लिए
सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे

दुःख के दोआब पर खड़े हम
कभी अपने हिस्से की प्यास नहीं बुझा सकते
तपाक से बोलने वाली क्रिया
हमारी जीभ ने सीखी ही नहीं
हमें तो माँ के गर्भ से ही
धैर्य की खड़ीपाई सिखाई जाती रही

हमने नहीं माँगी अपरिमित प्रसिद्धि
ना ही धन कुबेर होने की इच्छा पली हमारे भीतर
हम शतरंज में शह और मात से
पहले हारने वाले लोग
हमने हमेशा अपने प्रतिद्वंद्वी को
अपना हितैषी माना

दुःख के दोआब पर खड़े होकर
हमने जीवनभर बस यही चाहा कि
अपनी माता-पिता की आँखों का प्रेम बचा सके
और बचा सकें माँगी जाने वाली मनौतियाँ
पहाड़ी पर बैठे उस लोकदेवता से

2.
स्मृतिलोप
उम्र के चौबीसवें साल में
दुनिया देखने की इच्छा नहीं हुई
जिन्होंने जी भर के प्रेम दिया
उन्हें लौटाने के समय तक मेरा स्वयं का हृदय
शोकागार बन चुका था
तो कुछ नहीं किया
बस खाली हाथों को जोड़े
मैं खड़ा रहा निर्लज्ज-सा
उनके उपहारों के समक्ष

महीने से कलम बन्द पड़ी थी
कहीं किसी आधी पढ़ी किताब के बीच
उस पन्ने पर कवि भूलने की बीमारी से मर जाता है
और ‘अम्नेशिया’ शब्द के नीचे
एक महीने लकीर थी
जैसे मेरे हथेली की प्रसिद्धि वाली रेखा हो

अपनी ही उपस्थिति काटने को यूॅं दौड़ती जैसे
देह अमलतास से नागफनी में बदल गयी हो
खुद की पीड़ाओं को सींचने का पानी
मेरे पास कभी कम नहीं हुआ

होंठ जो प्रेम कविताएँ जानते थे
वो भूल आये थे अपनी नर्माहट किसी
पूर्व प्रेमिका की नग्न पीठ पर
शीतलहर जब भी चलती
एक कॉंपती हुई बेचैनी महसूस होने लगती

कितना कठिन था
एक अतृप्त कम्पन को इसलिए बचाये रखना
क्योंकि बस वही स्मृति बची हुई है
प्रेम की, कविता की और कवि की
बाकी सबका लोप हो चुका था

3.
समय यात्रा
बीते कुछ वर्ष में ऋतुओं से अधिक तीव्रता से
मनःस्थिति में परिवर्तन हुआ
पानी पीने से पूर्व यह स्मरण करने लगा
इसे पीने योग्य बनाने में
कितने पुरखों की अस्थियाँ गंगा में
विसर्जित हुई होंगी कितनी
बच गयी होंगी शेष

किसी के नाम की ध्वनि से
इतना स्नेह हो जाता है कि यदि पीछे मुड़ा
तो वह नहीं दिखेगा
बस उसका नाम दिख जाएगा
किसी कार या किसी होर्डिंग पर लिखा हुआ
फिर दिखेगा उसका चेहरा
इस देह से दूर जाता हुआ

समय से थोड़ा पीछे जाता हूँ
तो पाता हूँ हाथ में एक गुब्बारा और
दूसरे हाथ में पिता की उॅंगली है
गुब्बारा हवा में उड़कर चला जाता है
हाथ में उसके धागे की स्मृति
और पसीने की कुछ बूॅंदे रह जाती हैं
और पिता की आंखों में मेरी स्मृति है
गुब्बारा लिए हुए

आईने में स्वयं को देखता हूँ तो आंखों में
पार्क में वाकिंग स्टिक लिए
टहलने जाते हुए बाबा
काम पर जाते हुए पिता
स्कूल जाता हुआ भाई और
पूजाघर के भीतर
सबके सकुशल लौटने की प्रार्थना करती
माँ दिखाई पड़ती है

4.
शोकाकुल पीड़ाएँ
पीड़ाएँ, शोक से व्याकुल दासियॉं हैं
हमारे सोने के बाद
वे आती हैं दबाने पैर, करने आगाह
और कदम-कदम पर
लिख जाती हैं
कंकड़-पत्थर और शूलदंश

वह आती हैं
हमें पारंगत करती हैं
कि हम गिरें, उठें और लड़खड़ाकर
फिर गिरें
जबतक हमें खून की अंतिम बूंद का
मानवीय मूल्य
ना पता चल जाये

चन्द्रमाँ सूर्य से किरणें उधार लेकर
रातभर गिनता रहता है
अपने तारों का परिवार
अकस्मात टूटकर गिरते
तारे को देखकर
वह भी काट देता है एकांत की अमावस

मैं मात्र इस उम्मीद में कविताएँ
लिखता हूँ कि
प्रेम का सत्व बचा रहे
बचा रहे जीवन धरती के किसी कोने में
बची रहे कोई स्मृति
किसी मृत हो चुके हृदय में

मेरे या किसी अन्य के बचने से
अधिक आवश्यक है
कि बची रहें
हमें पीड़ाओं से अवगत कराती
शोकाकुल दासियॉं

5.
अहं ब्रह्मस्वरूपिणी
वैराग्य के आभूषणों से विभूषित
संतप्त हृदय कहाँ कुछ जानता था
तुमसे मिलने पर आभास हुआ
एकेश्वरवाद की परिभाषा का उद्भव
तुम्हारे जन्म के उपरांत हुआ होगा

वांछाएँ इतनी सुकोमल थीं कि
मात्र स्पर्शन का स्पर्श पाकर
मौलसिरी के पुष्पों-सी झर जाती थीं
जग में इतना औदार्य कहाँ था
जो वे टिकी रहती विटप-वल्लरियों पर

दर्शनाभिलाषी नेत्र दिग् दिगन्त
बारहमासी बसन्त की बाट जोहते रहते
किन्तु मलिन मन का कोई कलुष
वंचित रह गया था नर्मदा के अनुराग से

वाणी में कषाय शब्दों की कर्कशता
तुम्हारे आंगिक लावण्य की उपस्थिति में
कण्ठ वैखरी पुनः माधुर्य पा लेती थी
इतनी ऊर्जा थी तुम्हारी निकटता में

जैसे-जैसे तुम मेरे निकट आती
देवालयों में निरन्तर होते शङ्खनाद
अन्तस में तिरोहित अनुराग को
सुषुप्तावस्था से बाहर खींच लाते
जैसे मर्त्य देह में जान फूंक दी हो किसी ने

हे देवी!
आओ और कहो
मेरे श्रवण द्वार के भीतर
उन्हीं मद्धिम स्वरों में
अहं ब्रह्मस्वरूपिणी
कि जिजीविषा शेष रहे

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