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रवि शंकर सिंह की सात कविताएँ

कर्ज़
रोम के भगोड़े गुलाम ने
जंगल में दर्द से बेज़ार खूॅंखार
शेर के पँजों से निकाला था गहरे धँसा काँटा

पकड़ा गया कुछ अरसा बाद गुलाम
सजा-ए-मौत के तहत
भूखे शेर के पिंजरे में डाला गया उसे
प्यार से पूँछ हिलाते उसे चाटने लगा शेर
वह वही था शेर
जिसके पंजे से क़ैदी ने निकाला था काँटा
हैरतजदा बादशाह ने रिहा
कर दिया था क़ैदी को

ऐसा ही वाक़या है एक क़ैदी का
हमलावरों की गिरफ्त से निकला
न जाने कैसे नीम बेहोशी में
खजूर के दरख्तों के बीच
रेत पर पड़ा कराह रहा था क़ैदी
कसी हुई रस्सी से बॅंधे थे हाथ
पैरों में जंजीर, चलने से लाचार
कुंदों की चोटों से लहूलुहान बदन

बुलबुलों की चहक, सुबह का आग़ाज़
बूटों की धमक क़ैदी चौंका
कोई उसकी तलाश में था
वह करीब होता गया रफ्ता-रफ्ता
क़ैदी का हलक सूखने लगा
साँसें अटकने लगीं

वह आया, सामने बैठा
डबडबायी आँखों से घूरता रहा क़ैदी को
उसके हाथों की रस्सी खोली
पैरों की जंजीर
ताबड़तोड़ पत्थरों से टूटने तक कूटता रहा
उसके हाथों में फफोले उभर आए
क़ैदी फफोलों पर फूंके मारने लगा
यह अजनबी ने कहा
मैं यतीम तुम्हारे खानदान
की परवरिश में पला-बढ़ा
मैं तुम्हारे दुश्मन दस्ते का सिपाही हूँ
अब तुम आज़ाद हो अपने मुल्क में
कर्ज़ तो आखिर चुकाना ही होता है!

रोटी की तलाश
सुनो दिल्ली
थके हुए मुसाफिर की तरह
आसमान छूती इमारतों के साये को
गाँव के पीपल का पेड़ समझ
चाहता हूँ सुस्ताना

बदन पर फटे-पुराने कपड़े
पैबंद लगा गमछा
कुछ जरूरत का सामान
बॅंधी पोटली में
क्या ये सब कम हैं
बतलाने के लिए
कि मैं कई दिनों से भूखा
भटक रहा शहर की गलियों में?

अरे! दिल्ली
तुम्हें तो बतलाना भूल ही गया
कि मैं कहाँ से आया हूँ
जहाँ सूखे खेत छोड़ती हैं पपड़ियां
जहाँ अन्न का हो गया है अभाव
जहाँ बेरोजगार हैं बेशुमार
जहाँ धैर्य के नाम पर होता खून खराबा
मैं वहीं से आया हूँ
एक अभागे गाँव से

वही गाँव
जहाँ मेरी माँ
मेरी भूखी बेटी को
सुलाते वक़्त
सुनाती होगी किसी परी की कहानी तो
हुँकारी भरने के साथ-साथ
पूछ ही लेती होगी बेटी
कि पापा कब आएँगे
मेरे लिए लेकर गुड़िया
तब कुछ देर के लिए
माँ हो जाती होगी निःशब्द

मैं बहुत कुछ छोड़ आए हूँ
माँ के हाथों बनी रोटियाँ
बौर लदे आम के पेड़
पुश्तैनी खेत
वर्षों के गहरे रिश्ते
और न जाने क्या-क्या

दिल्ली, ओ दिल्ली
मैं आया हूँ
तुमसे मिलने नहीं
तुमसे रोटी माँगने
काम माँगने!

शब्द हमें राहत देते हैं
बिखरे हुए हैं शब्द
मोती की भाँति
धरती पर

ये शब्द
कुछ लोगों के
गर्वीले बोलों से
फिसल गये उनकी जुबान से
वही तो दिख रहे
जैसे मुझे लगता
आसमान में
तारे टिमटिमाते हों
देखते ही तारों
पल भर में मैं
बन जाता बच्चा

और इंतिज़ार करता
तारों के टूटने का
कि माँग लेता उनसे
रास्ते में पड़े
पत्थरों के बीच
छुपे बिच्छुओं के डंक से
राहत पाने की कला!

उम्मीदबर नहीं आती
मुझे अच्छे लगते हैं
लहलहाते गेहूँ के खेत में
झूमती बालियों के गुच्छे
और सरसों के पीले-पीले फूल

शाम तक
लौटना नहीं चाहता घर
सो जाना चाहता हूँ
माँ की गोद समझ
पगडंडियों पर सर रख
लेने चैन की नींद

गेहूँ की सुनहरी हो चली बालियों को
देखकर लगता कि
इन विकट परिस्थितियों में
किसी ने काँधे पर
रख दिया हो हाथ

इस एहसास ने
मेरे पाँवों में
उतार दी है द्रुतगति
उतुंग ही गया है सीना
दमक उठी है पगड़ी
पत्नी की बढ़ आई है खूबसूरती
बच्चे किलकने लगे हैं

फुट पड़ी है खेत में
उम्मीद की किरण
जैसे अँधेरे कमरे में
उतर आती है छप्पर से रोशनी

धीरे-धीरे पट रहा है खेत
पिलो रंगों से
सोने की भाँति
खलिहान से उठे गेहूँ के दाने
हाय! मेरे घर नहीं आते हैं
बढ़ते जाते हैं
बाज़ार की ओर
पिछले कर्ज़ के एवज में

छितिज से उतर रहा है
शाम का सूरज
उतर रहा है मेरे चेहरे का रंग

नियति
कोई आएगा
किसी अजाने लोक से
और मुझ से पूछेगा हठात
सामने टंगे कैनवास के बारे में
जिस पर अभी तक
रंग नहीं चढ़े हैं

उसके आने पर
तन्द्रा भंग होगी मेरी
तब अनेक रंगों से भरी डिबिया
लाल, पीली, हरी, गुलाबी
सजेंगी थाली में
साथ-ही-साथ
ब्रह्मांड के अंतिम छोर से
उतर आएगा वह दृश्य
जिसे कभी मैं
देखता था ख्यालों में

थाली के रंग
आकृति लेने लगेंगे
कैनवास पर
पेड़ों की डाकियों पर
खिल जाएंगे
रंग-बिरंगे फूल बनकर रंग
गौरैया के बच्चे
निकल आएंगे घोंसले से
वह सुनहरी किरण
घास के ओस कणों को
बना देगी मोती
नदी की धाराओं के खिलाफ
लड़ता रहेगा मछुआरा

अंततः एक प्रदीप्त छायांकन सामने होगा
और चेतनशील होता मैं
गर्व से झूम उठूँगा

और उसके जाने पर
धीरे-धीरे उड़ने लगेंगे रंग
फिर से कैनवास
सुना होता जाएगा
धूमिल होते जाएँगे
थाली के रंग
जैसे उदास होते जाते हैं
हमारे जीवन के क्रमिक क्षण!

डर
गहरी रात में
दूर कहीं से
आती लावारिश कुत्तों की आवाजें
बेहद डरावनी लगती हैं
फिर भी डरो नहीं
सो जाओ बच्चों

बचपन से ही
परिचित हूँ मैं ऐसी आवाजों से
कभी डरावनी रस्मयी
कभी फफक-फफककर रोने की
कभी झुंड में ठहाकों की गूॅंज
कभी अपने में लड़ने-झगड़ने की
ये सब सुन-सुनकर ऊब गया हूँ
मेरे कान पक गए हैं

इसी तरह
जो जानते-समझते हैं उन्हें
वे डरते नहीं, घबराते नहीं
मुकाबला करते है रूबरू
तोड़ देते है
उनके नुकीले दाँत…

चलो सो जाओ
तुम्हारे कहने के बावजूद
नहीं सुनाऊॅंगा कोई कहानी
नहीं दोहराऊॅंगा दादी का कहा
कि एक था राजा
एक थी रानी
तुम जानो, तुम समझो
ना राजा था, ना रानी
वे दरिन्दे थे
ख़ून चूसने वाले थे
उनकी भूख मिटाने के लिए
मज़लूमों के मांस के लोथड़े नित
पेश करते थे उनके सेनापति

जिनका इतिहास बनाना चाहिए था
वही तो उनके निवाले थे
सिर्फ उनकी हड्डियाँ
अवशेष के रूप में
ढही पुरानी इमारतों के ज़मीदोज़
मकबरे से निकल रही

उनको शर्तिया मालूम होगा कि
जो हम डर के महल बना रहे है
उसे एक दिन वह मुफलिस
पत्थर मारेगा काँच की खिड़की पर
तोड़ देगा सजाए हुए डर को!

हिफाज़त
बीहड़ जंगलों में
खूँखार जानवरों की घात में लगीं आँखों से
महफूज रखना होगा
नन्ही जान खरगोश के कुनबे को
मारे जाने या विस्थापित होने से

अभी-अभी
मॉंद से निकलते ही उनकी
आगवानी में खड़ी हैं सूरज की चमकीली किरणें
चिड़िया गा रही हैं स्वागत गान
बंदर बजा रहे हैं तालियाँ
पेड़ों से झर रहे हैं पत्ते
बिछ रहे हैं रास्ते में
मखमली कालीन की मानिंद
हाथी बरसा रहे फुहारें

उन मासूमों के लिए
ऐसा करना है
कि उनके कोमल पांव
पत्तों में छुपे काँटों पर
ना पड़े

नरम-नरम
घासों की हरियाली से
पाटनी होगी जंगल की खुरदुरी ज़मीन
कि टुंग सकें वे कमजोर जीव
अपनी जीवन की जरूरी खुराक

सबसे अहम है
उनके घर लौटने के कबल लड़ना
उन बहेलियों के खिलाफ
कि उनके खौफनाक इरादों
से बुझे तीर
खरगोश की सीने को
चाक ना कर दे!

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