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मोहन राणा की पॉंच कविताएँ

(1.)
कि पहचान लूँ उसे
नया भी था इसी तरह वह बिका कहीं
और हमेशा ख़रीदारों के बीच शानदार दुकानों में
कुछ खोजती आँखों की पकड़ में अदृश्य
जब स्मृति में नहीं था

इस तरह जब इस पर
चमकदार रोशनी गिरती थी
आकर्षक कीमतें और रिआयती किश्तों पर पुरस्कार
और वह खुशी अभी
फिर जल्द ही
बिक जाएगी
बिक गई है

कि अनुपस्थित मैं ही देर से पहुँचा बटुआ घर भूल कर,
वायदों की सूची लेकर जैसे फिर ख़रीदने
ख़ुद अपना ही बिका हुआ समय
मेरी घड़ी की सुई में वह घूमता और मैं उसके पीछे

पर वह दिखता कैसा है बाज़ार में कि पहचान लूँ उसे

(2.)
पुराना फुटनोट नई धूप में
यह अब हरा होगा
दीवारों पर पत्थरों पर
बची हुई हर उन जगहों पर
जहाँ समय अपने को ही भूल चुका

छह महीने कब बीत गए मैं याद करना भी नहीं चाहता
क्योंकि भूलने की चिंता नहीं है मुझे अपने दुख की
उत्साह भी नहीं पहचान उस खुशी की
जो अचानक चकित करती हो एक पुराने फ़ुटनोट को एक शब्दकोश में पा कर
जैसे सहेज कर रखा  हो फिर उसे पढ़ने के लिए

जो मैं भूल गया था
जो मैं भूल जाऊँगा

जहाँ धूल  का अर्थ तब मुझे खोजना पड़े फिर कभी
बेमानी हड़बड़ लिखावट में  लिखा जो रह गया वहीं
पुरानी जिल्द में फँसा अब तक
कमरे में गुमसी धूप के एक कतरे में,
गिर पड़ा वह काग़ज़ का पीला टुकड़ा  वहीं याद से फिर रख देने
कि अब उसकी ज़रूरत नहीं
ना मैं उसे कभी फिर खोजूँगा

कि था कभी प्रेम हमारे बीच
जो पहले तय नहीं

(3.)
बहुत दूर है आसान
धुली हुई सफ़ेद संगमरमर की गलियों में
देर रात नींद करती पहरेदारी ज़ादार में उनींदे पहर

दो बात होंगी एक में हम अदल बदलेंगे
कुछ दिनों के लिए अपना साथ तय कर
बहुत दूर है आसान भूलना चुनकर एक छोर
चलते चलते  छू कर कनखियों की ओट
उस सच को छुपा कर

मैं वहीं हूँ तुम्हारे शब्दों की अनुगूँज के भँवर में
बूझता कोई बात इतने पास कि
जो व्यक्त नहीं कर पाता
बहुत दूर है आसान

नीम अँधेरे में झरते हैं जलवाद्य के सुदूर स्वर
समुंदर फूँकता है अपनी साँस,
मैंने तुम्हें फिर देखा
थकी सलवटों में करवट बदलते

* ज़ादार क्रोएशिया में एड्रियाटिक समुंदर के किनारे एक शहर है।

(4.)
अंतराल
हम रुक गए वहीं, जीवन संसार रुक गया
रुक गए हमारे पीछे दिन अनगिन
एक दूसरे को पहचान

बहुत दिनों बाद वहीं खड़े एक लम्बी बात
जोड़ती पिछले अधूरे को,
बढ़ गए बहुत आगे हम कही बीती कहानी में
कुछ खाली साथ ले खोजते कोई अबूझ अंत

(5.)
बारम्बार
मैंने मुड़कर देखा
जहाँ मैं नहीं था पर दृश्य वहीं
जिसके बीच मैं मुड़कर नहीं देख पाया
सिवा आगे बढ़ कर फिर

मैंने मुड़कर देखा सीमाओं को बनते उखड़ते
जहाँ सब अपनी स्वीकृतियों का लेन देन करते
जीवन के अर्थ पर सहमत हो कर
पर कुछ लड़ भी थे आस्थाओं को अपने अपने रंग में बदल कर

पर सबका आकाश नीला था
अपलक आमने सामने
वही सांस का रंग फिर भी पहचान नहीं हो पाती
तुम्हें छू कर भी

वह क्षितिज  जिसके सामने कोई इमारत आ जाती शहरों में
बाहर पेड़ जंगल पहाड़ और दृष्टि की दूरियाँ
सूरज  का आरोह अवरोह वही फिर कहीं बादलों के परे
कहीं दोपहर की चौंधियाहट के घूमिल को बात मन में,
कि हज़ारों साल की स्मृति पत्थर और मिट्टी
बारम्बार जन्म लेती मृत्यु प्रेम के आलिंगन में

मैंने मुड़कर देखा पीछे इतिहास नहीं था
मैं उसके भीतर था घट चुका भविष्य
जो किसी को याद नहीं रहता अभी

1 Comment

  1. असाधारण कविताएँ ???
    इन कविताओं की गहराई और ऊँचाई को एकसाथ महसूसना नामुमकिन तो नहीं पर मुश्किल बहुत है।

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