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उल्लास पाण्डेय की चार कविताएँ

1.
वह चेहरा नहीं!

मुझे अब देखने दो
आँखों में आँखें डालकर
इस एकाकीपन को

मुझे देखने दो कि
मैं कितना रिक्त हो सकता हूँ
कितना कुछ खो सकता हूँ
खो-खोकर ,
खोने के अर्थ से भी
क्या मुक्त हो सकता हूँ?

वह सही कहती थी
संसार का अक्लांत संतुलन
बस एक लतिका पर
टिका हो सकता है

बस एक क्षण में
सारा आनंत्य पलट सकता है!

2.
टहनी से टूटकर गिरता हुआ पर्ण
उस गाँठ की स्मृति में लीन है
जैसे छूट गया एक उदास लड़का
हँसती हुई लड़की की
ठिठोली में…

भविष्य सदा ही एक नियति को तड़पता है
जैसे सुरंग में प्रतीक्षित अंधेरा
आती हुई गाड़ी की आवाज़ को

आकाश की अनभ्रता में
एक गहरी आस है भरने की
जैसे शून्यता में जनने की

मुझे मालूम है
एक दिन तुम फिर आओगे
किसी बवंडर की तरह
मेरी उदासी को तिनके की तरह उठा ले जाओगे।

3.
समय वह है जो प्रतीक्षा में अधीर है
मैं इस अधीरता में समय काटूँगा
कि जब तक तुम लौट ना आओ
मेरे पास!

मैं इसका आदी हूँ
और अभ्यस्त भी
कि विदा के बाद का सीमान्त
भरता हूँ सायास ही मगर
करुणा से…

मुझे भीति है तो केवल
आगमन की
उसके संस्पर्श की
उसकी आकस्मिकता की
उन क्षणों की जड़ता की
क्या वह भरे जाने का बोझ सह पाएंगे?

4.
यह पहली बार हुआ है कि
हम आँखें पहचानने लगे हैं
और उसकी तलहटी में बैठी उदासी भी
जैसे अंधकार से ठीक पहले आकाश के आखिर में
खींची रहती है रोशनी की कोई लकीर

वह कमज़ोर थे कितने कि चेहरा ढकते ही
उनकी असलियत झांकने लगी बाहर
मैं देख रहा हूँ
मगर खाई में गिरा हुआ आदमी नहीं

बल्कि उसके चारों ओर ऊँची दीवारों पर जमी काई का हरापन
जो उसके रगों में रेंगते लहू के रंग से अधिक गाढ़ा है…

कोई खाली शहर सा अकेला पड़ता जा रहा है
जिसके लिए जीना संदिग्ध है
और बचे रहना बस
एक घातक अविश्वास

वह जिन्हें नर्म हथेलियों से घिरी एक जगह चाहिए
अपने दु:खों की निजता के लिए
और पापों के प्रायश्चित के लिए
उसके बीचों बीच जलती एक लौ
वह कहाँ जाएँ

वह कहाँ जाएँ
जो रोना नहीं जानते
मगर रोने की सारी दहलीज लाँघ चुके हैं

समय के तख़्त पर
कोई सन्तुलन बना रहा है
एक हठात् सन्तुलन!
क्योंकि ऊपर गले में फंदा है।

2 Comments

  1. अद्भुत। आशीष और बधाई भी।

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