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गौरव पाण्डेय की दस कविताएँ

वापसी
माँ.!
उतारो मेरी बलाएँ
चाचियों को सूचना दो
बनाओ आज रात मीठे पकवान

बहन.!
आओ मेरी छाती से लग जाओ
अपने आँसुओं से मुझे जुड़ाओ

भौजाइयों.!
कनखियों से न निहारो मुझे
तुम्हारा दुलारा आँचर-छोर ही हूँ

भाई.!
संभालो मेरी भुजाएँ
तुम्हारी जरूरत है मुझे

पिता.!
मुझे माफ कर दो
अभी झुकूँगा तो गिर पड़ूँगा

घर.! नीम.! तुलसी.!
मुझे छाँव दो
सहेज के रखी थी जो
इसी दिन के लिए

यारों! गली-गली जुलूस निकालो मिलन के
कि मैं ठीक-ठाक लौट आया हूँ
नहीं हुआ किसी हादसे का शिकार
रोज़गार की तलाश में भटका दिन-दिन भर
लेकिन किसी गलत रास्ते पर नहीं गया मैं
मैने नहीं छीनी किसी की रोटी
और भूखा भी नहीं मरा

ओ माँ.!
पुनर्जन्म हो रहा मेरा
नाऊँन चाची को बुलवाओ
पड़ोस से दूध मंगवाओ
सोहर गवाओ
उत्सव मनाओ
कि ठीक-ठाक लौटा हूँ मैं

और मुझे याद हैं घर-खेत-परिवार-पड़ोसी
मुझे याद हैं सारे रिश्ते अभी भी!
*
गाँव से निकले लोग
गाँव से निकले बहुत लोग
कुछ न कुछ करने
और लौटे भी
जो कुछ बन पड़ा वो करके

लौटे कुछ ईंटा-गारा करके
बोझा ढोकर लौटे कुछ
देर शाम तक
नमक-तेल-तरकारी लिए बहुत लौटे

कुछ ऐसे थे
जो लौटे बहुत दिनों बाद
बड़ा सा बैग, रुपया, कपड़ा और सपने लेकर

लेकिन कुछ ऐसे भी थे
जो नहीं लौटे
खो गए

जो नहीं लौटे
उनमें अधिकतर ऐसे थे
जो कुछ हो गए
वे डॉक्टर, वे प्रोफेसर, वे वकील
वे पत्रकार, वे थानेदार
ये जहाँ गये वहीं के होकर रह गये थे

इधर जिनके लौटने की उम्मीद
खो चुका था गाँव
वे मृतकों के बीच से उठकर लौटे…
……………………………………

ये नायक
गाँव के बेटे थे
अब दामाद की तरह लौटते थे

गाँव बीमार था
डाँक्टर इलाज करने नहीं आया
और निरक्षर गांव ने
प्रोफेसर से एक अक्षर नहीं पाया
वकील ने गांव को नहीं दिया कोई न्याय
और पत्रकार क्या जाने गांव का हाल-चाल
दरोगा ने रौब दिखाया उल्टे गांव को ही

अलबत्ता जब कभी
दिया गया इन्हें कोई सम्मान
तब जरूर चर्चा में रहा गांव का नाम………
*
माँ गौरैया होती है
माँ भोर में उठती है
कि माँ के उठने से भोर होती है
ये हम कभी नहीं जान पाये

बरामदे के घोसले में
बच्चों संग चहचहाती गौरैया
माँ को जगाती होगी
या कि माँ की जगने की आहट से
शायद भोर का संकेत देती हो गौरैया

हम लगातार सोते हैं
माँ के हिस्से की आधी नींद
माँ लगातार जागती है
हमारे हिस्से की आधी रात

हमारे उठने से पहले
बर्तन धुल गये होते हैं
आँगन बुहारा जा चुका होता है
गाय चारा खा रही होती है
गौरैया के बच्चे चोंच खोले चिल्ला रहे होते हैं
और माँ चूल्हा फूॅंक रही होती है

जब हम खोलते हैं अपनी पलकें
माँ का चेहरा हमारे सामने होता है
कि माँ सुबह का सूरज होती है
चोंच में दाना लिये गौरैया होती है।
*
पिता इंतजार कर रहे हैं
पिता आकाश देखते
और हमें हिदायत देते कब तक लौट आना है
वो हवाओं को सोखते और तमाम परिवर्तनों को
भाप लेते

पिता को बादलों पर भरोसा नहीं है
जैसे लोगों को पट्टीदारों और पड़ोसियों पर नहीं होता
फिर भी उनका मानना है
कि हमारा कोई न कोई तो नाता है ही
इसलिए जरूरी है मौसम दर मौसम एक चिट्ठी का लिखा जाना

बादलों के रंग और रफ्तार
पिता खूब समझते हैं
उन्होंने बता दिया था
धान की फसल कमजोर रहेगी इस बार
हाँ, तिल और बाजरे से जरूर उम्मीद रहेगी

पिता चिंतित हैं
आम के बौर अब पहले की तरह नहीं आते
महुआ से कहाँ फूटती है अब वह गंध
जामुन का पुश्तैनी पेड़ अर-अरा के गिर पड़ा
और सूख गया तालाब इस बार कुछ और जल्दी

पिता प्रतिदिन पड़ रही दरारों से जूझते हैं
और लगातार कम हो रही नमी से चिंतित रहते हैं

हम जानते हैं
पिता के मना करने के बावजूद
दर्जनों बार मोल लगा चुके हैं व्यापारी
आँगन की नीम का
जबकि पिता इंतजार कर रहे हैं
कि एक दिन हम सभी समस्याओं का हल लेकर
लौटे आएंगे शहर से
और उस दिन पुरानी शाखाओं पर
एक बार फिर खिल उठेंगें नये-नये पत्ते।
*
काँच के पीछे
स्त्रियों के अंग झॉंक रहे हैं
साड़ियॉं सजी हुई हैं
कॉंच के पीछे
परियों वाली फ्रॉक पहने लुभा रही हैं
रबर और प्लास्टिक की गुड़िया
ललचाई नजरों से टुक-टुक देख रही हैं बच्चियॉं

कॉंच के उस पार से
लगातार उठ रही है व्यंजनों की खुशबू
भूखे बच्चे मचल उठते हैं कॉंच के इस पार

ये ख़ानाबदोश लोग बॉंस को
छील-काट बनाते हैं
कुछ घरेलू उपयोग चीजें
और कॉंच के पीछे से निकल कर
आने वाले ग्राहकों का इंतज़ार करते हैं
दौड़-दौड़ ग्राहकों से करते हैं चीजों को खरीद लेने की गुहार

ये चुपचाप देखते हैं
दुनिया को कॉंच के पीछे सिमटते हुए
काँच से बाहर आते हुए लोगों के ठहाके सुनते हैं
रात के अंधेरे में अपने तंबुओं से लेटे हुए वे देखते हैं
कांच के पीछे की चमक रही चीजों को

ये जानते हैं उनकी पहुँच से बाहर है
कॉंच के पीछे की दुनिया
लेकिन यह भी जानते हैं कि
उम्मीद बची रहेगी कॉंच के बाहर भी
जब तक मजबूत हैं उनके हाथ
और हाथों में हैं धारदार छूरे और बॉंस…
*
मजदूर औरतें
मजदूर औरतें
आती हैं दूर-सुदूर के गाँवों से
दिन-दिन भर खेतों में काम करती हैं
रोपती हैं धान खर-पतवार साफ़ करती हैं

अकेली नहीं आती ये
बहू, बेटी और पोतियाँ साथ लाती हैं
साथ होती हैं पड़ोस की तमाम मजदूर औरतें

पानी से भरे लबालब खेत में
सकेल कर साड़ी, कमर में बॉंधकर दुपट्टा
मारकर कछोटा छप्प-छप्प कूद जाती हैं

ये अलग-अलग उम्र की औरतें
मिट्टी-पानी के मिलन रंग में रंग जाती हैं
दादी-चाची-माँ-बेटी-नन्द-भउजाई
जब खेत में ही होने लगती है झमा-झम बारिस
बच्चियों संग बच्चियाँ बन लोटती-पोटती हैं
शगुन मनाते रोपनी के गीत गाती हैं

इस तरह कब रोप देती हैं ये दस-दस बीघे धान
पता ही नहीं चलता
पता ही नहीं चलता दिन के अंत का
और ये अपनी हंसी-किलकारी खेतों में छोड़कर
रोपी गयी फसलों के प्रति निःस्पृह होकर
लौटने लगती हैं

कुछ रुपया मुट्ठी में दबाये, आँचर में गठियाए
कल कहीं और रोपनी की बात करते हुए
लौट जाती हैं
ये मजदूर औरतें।
*
एक पेड़ का गिरना
जब गिरा नीम का पेड़ द्वार पर
तब जाना
पेड़ का गिरना केवल पेड़ का गिरना नहीं है
एक हरे-भरे संसार का उजड़ना है
जड़ों का उखड़ना है

द्वार को दौड़ी थी माँ अदहन छोड़ चूल्हे पर
पड़ोस भागा इस ओर
कहीं रो उठा था एक शिशु चौंककर
दीवार के सहारे लुढ़ुक गए दादा जी दर पर
जगह से आठ कदम पिछिल-भागा कुत्ता
बिसूर रहें
कभी पेड़- कभी चिड़ियों के घोसले
(हाय दई देख रे!)

चीं- ~चीं ~ चूं ~चूं ~की ध्वनियों के बीच
उड़ती-उतरती है चिड़िया
घोसले के आस-पास बार-बार
बार-बार
हवा में तिरता है दुःख अबूझ स्वर-लिपि में
हम मूक-बधिर से खड़े चुप इसे कब समझ पाते

हम कहाँ समझ पाते
वह
जो समझ पाते हैं बच्चे
जो खड़े हैं देखो मुँह लटकाएं-रुआंसे

झूला पड़ता था इसी पेड़ पर
इसी पेड़ की छाती पर फुदकते थे वे भूखे-प्यासे।
*
ऋणग्रस्त किसान का एकालाप
गेहूँ की बालियों और मकई के दानों में
गढ़ा रहा है दूध
घर की बेटियों का गढ़ा रहा है खून
अब हम सरसों में फूल नहीं फलियाँ चाहते हैं।

बर्तन-टकराने और सूनी थालियां बजाने के
अलावा भी कोई संगीत है
हमें नहीं पता
बर्तनों के माँजन के साथ मंज गई है
हमारी देह भी
अब हमें दर्पण की कोई जरूरत नहीं है।

जरूरतें शाखों सी फैल पत्तों-सी फूट रही हैं
जरा सी हवा से तना कांप उठता है
पत्नी के बालों में गढ़ा गई है धूप
हाथ की रेखाएँ चेहरे पर उभर आई हैं
हमारी कमर भी पुराने पीपल की तरह
छाल छोड़ने लगी है।

परिवार का भविष्य नाज़ुक रस्सी से बॅंधा
छूँछ बाल्टी-सा कुँए में लटक रहा है
हम चाहते हैं हमारे बच्चे भी
कुछ पढ़ें-लिखें
हम हमेशा हारे जुआरी की तरह
कुछ और पैसों के जुगाड़ में लगे रहते हैं ।

हम जानते हैं रोशनी कुछ लोगों की मुठ्ठियों में कैद है
बिजलियां खेलती हैं उनकी मुस्कान में
जिस ओर देखते हैं हँसकर बारिश होती है उधर ही
जिधर तने भृकुटि पड़ जाता है सूखा
हमारे हिस्से का सूरज अंधा है
धरती दिनों-दिन हो रही ऊसर
पुराने हुए हमारे बीज

जिसे ईश्वर कहते हैं उसका कोई
पता नहीं !

ओ! गणतंत्र देश के उत्सवी लोगो!
हमें समझाओ स्वतंत्रता-गणतंत्रता का अर्थ?
हमारे लिए यह उस जुआ की तरह है
जो हमारे कंधों पर रखा है
और हम देश के मानचित्र पर
बीचो-बीच जुते हुए हैं।
*
खेत सब जानते हैं
किसके घर है दो वक्त की रोटी
कौन एक जून पानी पीकर काटता है
किसके यहाँ पकते हैं व्यजंनों के प्रकार
और कौन पेट से घुटने सटाकर सोता है

खेत जानते हैं

किसान के घर कितनी औरतें हैं
कितने हैं बूढ़े और कितने बच्चे
जवान लड़कियाँ कितनी हैं
खेत जानते हैं
गांव के सारे शोहदों को
खेत भली-भाँति पहचानते हैं

खेत जानते रहते हैं
किस कंधे पर कितना कर्ज है
किसकी मेहरारू को कौन-सा मर्ज है
किसकी बिटिया कब ब्याही जाने वाली है
हाड़-तोड़ मेहनत के बावजूद बखारी क्यों खाली है ?

बहुत मजबूरी में खेत विदा लेते हैं किसान से
कुछ कर्ज के लिए तो कुछ मर्ज के लिए
तो कुछ फर्ज के लिए
मसलन बिटिया की विदाई के पहले
विदा ले लेते है किसान के सबसे अच्छे खेत

इस तरह किसान का बचपन यौवन ज़रा
उसने की है आत्महत्या
अथवा कैसे मरा?
खेत जानते हैं!

जी हाँ! हमारी ही नहीं आपकी पीढ़ियों का भी
इतिहास, खेत भली-भांति जानते है!
*
अशर्फी और मृत्यु
पलकें सूख चुकी हैं मटर की फलियों की तरह
और पुतलियाँ कभी-कभी हिलती महसूस होती हैं
जरा सी; बीच-बीच में रह-रह कर
गले से फूटने लगती है–”घों-घों” की आवाज
अकड़ रहे हैं
मृत्यु से लड़ रहे हैं
–अशर्फी!

संभव है मृत्यु चढ़ बैठी हो छाती पर
दबा लिया हो गला और अशर्फी
बुलाना चाह रहे हों किसी को
मदद के लिए
लेकिन ये आवाज अशर्फी की नहीं
ऐसे कभी नहीं बोले वे नहीं चित्त हुए कभी इस तरह
उन्होंने अखाड़े में चार-चार पहलवान पटके हैं एक साथ
उनके एक-एक दांव का कोई तोड़ नहीं
चुस्ती-फुर्ती का जोड़ नहीं
अब तक गाँव-गिरांव में अपराजेय रहे हैं अशर्फी

जब वे गाँव से निकल कर दहाड़ते
बाग-बगीचे, कुँए-तालाब एक साथ गूँज उठते
गूँज उठती फसलें
चीं ~चीं ~चूं ~चूं ~चेहेंव ~चेहेंव~
खर-खर खर-भर सर्र सरर-सरर
खाली हो जाता एक दहाड़ में पूरा का पूरा मैदान
खेत-खलिहान

जाड़े की रातों में पहरा लगाते
‘सोअवत जागत राह्ह्हेएव…. सोवत जागत~~
यह आवाज सुनकर आश्वस्ति भरी नींद में डूब जाता गाँव
लोग कहते हैं यही है असली देशी घी का दम
गुड़ और गन्ना अशर्फी की पहली पसंद
आल्हा उनका प्रिय राग
अशर्फी की आवाज
आवाज नहीं एक ललकार है

फिर उनके गले से फूटती “घों-घों” की
आवाज किसकी है??

संभव है मृत्यु किसी पछी का रूप धरकर आई हो
और चुंगने लगी हो जीवन के बचे आखरी दाने
और अशर्फी पूरा जोर लगाकर उसे
हड़ाना चाहते हों
किसी जंगली पशु की तरह
वे मृत्यु को खदेड़ चुके हैं पहले भी कई बार

लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही ऐंठ रही है देह
पैर चल रहे हैं ज्यादा ही
शायद आखिरी दॉंव लगा रहे हैं
एक बार और चित्त करने के लिए
एक पटकनी देने के लिए
मृत्यु से लड़ रहे हैं
अशर्फी

ऐंठन और आवाज कम हो रही रही है
कम हो रही है पैरों की चाल
हम मौन खड़े हैं गुड़-पानी लिए
यह सोचकर कि अशर्फी अपराजेय हैं
और ये “घों-घों” की आवाज
अशर्फी की नहीं
मृत्यु की है।

4 Comments

  1. आप की कलम दिन रात यू ही लिखती रहें और आप उचे sikher पर जाए यही मेरी दुआ होगी….

  2. The words are quite general but the thought behind the poetry is so deep. I loved it??????
    You are really a great poet…. Gaurav Sir??

  3. सर्वहारा का अंतस इन कविताओं में झलकता है।

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