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नरेश गुर्जर की छह कविताएँ

(1) सुनो सुनो… चुप न रहो मेरी बात के हाथ पर अपनी हथेली रख दो और छू लेने के सुख…

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मोहन राणा की पॉंच कविताएँ

(1.) कि पहचान लूँ उसे नया भी था इसी तरह वह बिका कहीं और हमेशा ख़रीदारों के बीच शानदार दुकानों…

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डॉ. उर्वशी भट्ट की चार कविताएँ

बोध मैं बहुत रोना चाहती हूँ उन तमाम गलतियों के लिए जिनकी अपराधी मैं स्वयं हूँ हालाँकि, आक्षेप मुझे कुछ…

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ऋचा की तीन कविताएँ

01. वक्त वही है, लम्हें वही है ठहरे सब ख्यालात वही है कहते हैं कुछ हुआ नया है हम कहते…

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नरेश शांडिल्य की पाँच ग़ज़लें

(१) टूटे ख़्वाबों को यूँ तामीर किया है उसने चूम कर दर्द, मुझे मीर किया है उसने तोड़ कर आज…

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अनिला राखेचा की पाँच कविताएँ

1. मेरी बातें कफन मत पहनाना अभी, दफन नहीं होना चाहती मेरी बातें… जीनी है उसे तुम संग जाने, कितने…

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उल्लास पाण्डेय की चार कविताएँ

1. वह चेहरा नहीं! मुझे अब देखने दो आँखों में आँखें डालकर इस एकाकीपन को मुझे देखने दो कि मैं…

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विभव भूषण की चार ग़ज़लें

1. क्यों ये सूखे हुए पत्ते मुझी से लगते हैं पाँव की ज़ेर, खरकती जमीं से लगते हैं वो इशारे,…

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अन्नपूर्णा गुप्ता की पाँच कविताएँ

1. प्रकृति का प्रेमपत्र प्रकृति ने लिखा था एक प्रेमपत्र और चाहती थी प्रतिउत्तर। पत्र से प्राप्त आंनद में तुम…

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सूरज सरस्वती की पाँच कविताएँ

1. दुःख का दोआब हमारी पीढ़ी लोक देवताओं से माँगी मनौती से जन्मी है जब दुनिया की रूप-रेखा बदल रही…

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अंचित की तीन कविताएँ

सफ़ूरा के लिए कोई अख़बार की चर्चा करता है तो खाने में क्या बना है देख लेता हूँ. कोई मज़दूरों…

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शालिनी मोहन की दस कविताएँ

(1.) मौन मौन सघन वन में अनाम वनस्पति होता है शब्द न ओस बनते हैं न फूल (2.) टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें…

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प्रज्ञा मिश्र की तीन कविताएँ

भीष्म प्रतिज्ञा सोचा एक प्रतिज्ञा कर के अब मैं उसको भीष्म करूँ जग चाहे मनुहार करे कुल प्रतिज्ञा की रक्षा…

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रवि शंकर सिंह की सात कविताएँ

कर्ज़ रोम के भगोड़े गुलाम ने जंगल में दर्द से बेज़ार खूॅंखार शेर के पँजों से निकाला था गहरे धँसा…

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गौरव पाण्डेय की दस कविताएँ

वापसी माँ.! उतारो मेरी बलाएँ चाचियों को सूचना दो बनाओ आज रात मीठे पकवान बहन.! आओ मेरी छाती से लग…

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छह प्रेम कविताएं

(१) सखि आओ तुम अलि आओ तुम, काली आंखों में ढेर सारा काजल डालकर, जैसे हर दिन के बाद चली…

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ऐसा क्यूं होता है!

ऐसा क्यूं होता है! जब भी मन उदास होता है तुम कहीं आस-पास होते हो कभी तन्हाइयों में तुम्हारी मौजूदगी…

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राम किंकर की पाँच कविताएँ

(1) जानकी वो जो करुणानिधान कहलाते हैं… अन्तस में जिन्हें… शिव पाते हैं…! जिनके चरणों की महिमा को… वेद पुराण…

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कल्पना सिंह की तीन कविताएं

सर्दियों की धूप चाय के प्याले में गुनगुनी धूप बचपन का आंगन। महीन धागों सी उठती भाप की लकीरें उड़ाती…

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ज्योति शोभा की पॉंच कविताएँ

1) खालीपन के बिल में स्त्री नहीं भरती खालीपन को मित्र नहीं भरते दुनिया में चलतीं इतनी साँसें एक खाली…

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वंदना वात्स्यायन की दो कविताएँ

गंगा की कल-कल धारा कहती तू रूक जा रे मैं कहती गंगा तू बहती जा रे। तट है, तेरा बड़ा…

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