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कहानी—घिरनी दादी

“हम नौ साल में बिहा गये थे बेटा. तुम्हारे दादाजी का तब सतरहवाँ साल शुरू हुआ था. हमारी छटपटाहट, हमारा…

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ऐसा क्यूं होता है!

ऐसा क्यूं होता है! जब भी मन उदास होता है तुम कहीं आस-पास होते हो कभी तन्हाइयों में तुम्हारी मौजूदगी…

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कहानी—तेतर

तेतर दास को मैं बचपन से ही देख रहा था. कभी नदी किनारे की गाछी (बाग) में आम तोड़ते हुए…

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राम किंकर की पाँच कविताएँ

(1) जानकी वो जो करुणानिधान कहलाते हैं… अन्तस में जिन्हें… शिव पाते हैं…! जिनके चरणों की महिमा को… वेद पुराण…

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कल्पना सिंह की तीन कविताएं

सर्दियों की धूप चाय के प्याले में गुनगुनी धूप बचपन का आंगन। महीन धागों सी उठती भाप की लकीरें उड़ाती…

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ज्योति शोभा की पॉंच कविताएँ

1) खालीपन के बिल में स्त्री नहीं भरती खालीपन को मित्र नहीं भरते दुनिया में चलतीं इतनी साँसें एक खाली…

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वंदना वात्स्यायन की दो कविताएँ

गंगा की कल-कल धारा कहती तू रूक जा रे मैं कहती गंगा तू बहती जा रे। तट है, तेरा बड़ा…

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सीमा गुप्ता की दो कविताएँ

पहचान पशु पक्षी अपनी बोली बोलते हैं प्रेम करते हैं प्रकृति से नदियों के बहते जल में अठखेलियाँ करते हैं…

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भारतीय आभा से दीप्त लेखन

भारतीय मनीषा अपने सांगोपांग समुच्चय के साथ कुबेरनाथ राय की रचनाओं में प्रतिफलित हुई है। उनके लिखे का पारायण भी…

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गरिमा सक्सेना के चार नवगीत

१) रंग सारे उड़ गये शायद हवा में जिंदगी फिर श्वेत श्यामल हो गई है राह अब कैसे मिले घनघोर…

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सुलभा कोरे की तीन कविताएं

खेलती है बारिश खेलती है बारिश पहाड़ों, पेड़ों, नदी, नहरों के साथ खेलती है बारिश सड़कों, घरों, दरों-दीवारों के साथ…

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कितने दुःख सिरहाने आ कर बैठ गए

नरेश सक्सेना जैसी जिजीविषा और कविता तो सब को मिले पर उन के जैसा दुःख और यह कथा किसी भी…

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जाना धरती के कवि का

(मंगलेश डबराल के लिए…)      १. धरती के कवि का जाना कुछ यूं है जैसे भाषा में छा गई…

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कल्याणी की चार कविताएँ

धूप का कतरा रेशा रेशा पिघलती हूं मैं तेरे नशे में, मानो एक कतरा धूप का मिला, बरसों के अंधेरे…

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कहानी—बकरी

वाल्मी पहाड़ी पर पहुँचकर अनीता ने अपनी बकरी चरने छोड़ दी और ख़ुद पत्थरों के टीले पर एक बड़े पत्थर…

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संध्या यादव की तीन कविताएँ

1) सिंड्रेला खो चुका है चमचमाता जूता, टूट चुका है अर्द्धरात्रि का जगमगाता दिवा स्वप्न, इच्छाओं की लड़ियाँ टूटी बिखरी…

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प्रियंका चौहान की पॉंच कविताएँ

■ सैनिक का खत सीमा की निगरानी में हूँ मैं थका नहीं तुम सुनो अभी मैं राग अलापा करता हूँ…

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योगिता शर्मा ‘ज़ीनत’ की तीन ग़ज़लें

(1) तेरी महफ़िल में गर ठहर जाते हम तिरी बेरुख़ी से मर जाते तेरा हर ज़ुल्म सह लिया हँसकर छोड़…

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नरेश शांडिल्य के दोहे

दोहा प्राचीनतम एवं लोकप्रिय काव्य विधा है. भारतीय कवियों और संतों ने इस शैली में लिखकर ज्ञान-आलोक फैलाया. एक दोहाकार…

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क्षणिकाएँ

1. आंखों में दिख जाएगा छुप नहीं सकते तुम खुद अपने आप से, निगाहें तो मिलाओ दर्पण में जनाब से!…

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कविता—तुलना

बादलों को देखकर हमेशा ही अच्छा लगता है कभी रूई से लगते हैं कभी बूढ़े बाबा की दाढ़ी जैसे कभी…

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